'हैलो! मैं कौआ बोल रहा हूं...' AI की मदद से जानवर करेंगे आपसे बात, मगर ये 1 गलती पड़ेगी भारी!
क्या AI की मदद से इंसान अब जानवरों और पक्षियों से बात कर सकेंगे? वैज्ञानिकों ने डिकोड की इनकी भाषा, लेकिन साथ ही उठ रहे हैं बेजुबानों की प्राइवेसी और गलत इस्तेमाल के बड़े सवाल.
सोचिए अगर एक दिन आपकी खिड़की पर बैठी चिड़िया आपसे कहे, "यार, आज बहुत गर्मी है!" या फिर आपका पेट डॉग आपसे साफ-साफ कह दे कि उसे खाना पसंद नहीं आया. जो बात अब तक सिर्फ साइंस-फिक्शन फिल्मों या सुपरहीरो कॉमिक्स में दिखती थी, वो अब बहुत जल्द हकीकत बनने वाली है. वैज्ञानिकों का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की मदद से बहुत जल्द इंसान जानवरों और पक्षियों की भाषा समझ सकेंगे और उनसे बात भी कर पाएंगे.
लेकिन रुकिए! यह जितना कूल और एक्साइटिंग लग रहा है, इसके पीछे उतना ही बड़ा खतरा भी छुपा हुआ है. रिसर्चर्स ने चेतावनी दी है कि इस टेक्नोलॉजी के आने से जानवरों की प्राइवेसी छिन सकती है और लोग इसका गलत फायदा उठाकर उन्हें बेवकूफ या परेशान भी बना सकते हैं. आइए आसान शब्दों में समझते हैं कि यह पूरा मामला क्या है और टेक्नोलॉजी की दुनिया में इसको लेकर क्या बवाल मचा हुआ है.
AI कैसे सीख रहा है जानवरों की 'लैंग्वेज'?
वैज्ञानिक सालों से जानवरों और पक्षियों की आवाजों को रिकॉर्ड कर रहे हैं. पहले इंसानों के लिए हजारों घंटों की रिकॉर्डिंग्स को सुनना और उनमें कोई पैटर्न ढूंढना बहुत मुश्किल काम था. लेकिन अब इस काम में एंट्री हुई है AI यानी मशीन लर्निंग की.
AI मॉडल्स पलक झपकत ही हजारों रिकॉर्डिंग्स को स्कैन कर लेते हैं. वे यह पता लगा लेते हैं कि किस सिचुएशन में जानवर कौन सी खास आवाज निकालता है. यानी AI अब बेजुबानों की एक तरह से 'डिक्शनरी' तैयार कर रहा है.
कौवे ने AI से बोला - "दोस्त, मदद करो!"
इस रिसर्च में शामिल बायोलॉजिस्ट विटोरियो बैग्लियोने (Vittorio Baglione) काफी समय से कौवों की आवाज पर स्टडी कर रहे हैं. जब उन्होंने अपने रिकॉर्डेड डेटा को AI मॉडल में डाला, तो वो खुद हैरान रह गए.
AI ने कौवों की अलग-अलग आवाजों को छांटकर अलग कर दिया. उसमें एक खास आवाज ऐसी थी, जिसका मतलब लगभग यह निकलता था - "अरे दोस्त! जल्दी आओ, घोंसले को बचाना है!" यानी जब कौवे किसी खतरे में होते हैं और अपने ग्रुप को मदद के लिए बुलाते हैं, तो वो एक खास सिग्नल देते हैं. AI ने इस सिग्नल को बड़ी आसानी से पहचान लिया.
क्या जानवरों की भी 'प्राइवेसी' होती है?
जैसे हम इंसान नहीं चाहते कि कोई हमारी पर्सनल बातें चुपके से सुने या हमारी जासूसी करे, ठीक वैसे ही वैज्ञानिकों का मानना है कि जानवरों की भी अपनी प्राइवेसी होती है. स्प्रिंगर नेचर (Springer Nature) जर्नल में लिखते हुए वैज्ञानिकों ने एक नया मुद्दा उठाया है.
उनका कहना है कि हम इंसानों को लगता है कि रिसर्च के नाम पर हम जंगलों में माइक और कैमरे लगाकर जानवरों की हर हरकत रिकॉर्ड कर सकते हैं. लेकिन जानवरों की अपनी एक कॉम्प्लेक्स सोशल लाइफ होती है. बिना उनकी मर्जी के उनकी हर बात सुनना और डिकोड करना उनकी प्राइवेसी का हनन (Violate) करना हो सकता है.
बातचीत या खतरनाक खेल
जानवरों की भाषा समझने के बाद सबसे बड़ा रिस्क है 'प्लेबैक' (Playback) टेक्नोलॉजी का. इसका मतलब है जानवरों की ही रिकॉर्डेड आवाज को स्पीकर पर बजाकर उन्हें रिस्पॉन्स करने पर मजबूर करना.
वैज्ञानिकों का कहना है कि शिकारी या गलत इरादे रखने वाले लोग इसका गलत इस्तेमाल कर सकते हैं. जैसे - किसी चिड़िया या जानवर की साथी वाली आवाज बजाकर उसे झांसे में बुलाना और फिर उसका शिकार करना. अगर हम बिना सोचे-समझे उनकी आवाजों को नकली रूप में दोहराएंगे, तो जानवरों में भारी तनाव (Stress) पैदा हो जाएगा और उनका सोशल सिस्टम पूरी तरह बिगड़ सकता है.
हाथी और मरे हुए दादाजी की रुला देने वाली कहानी
जानवरों से झूठी बातचीत करना कितना खतरनाक हो सकता है, इसका एक इमोशनल और डरावना उदाहरण 2007 में सामने आया था. जोलॉजिस्ट केटी पेन (Katy Payne) ने एक प्रयोग के दौरान एक हाथी को उसके मरे हुए दादाजी की रिकॉर्डेड आवाज सुनाई.
आवाज सुनते ही वो हाथी बेहद परेशान और दुखी हो गया. वो अपनी फैमिली के उस मरे हुए मेंबर को ढूंढने लगा जो अब दुनिया में था ही नहीं. इस घटना से साफ हुआ कि अगर हम टेक्नोलॉजी के दम पर आवाजें कॉपी तो कर लेंगे, लेकिन अगर हमें उसके इमोशनल इम्पैक्ट का अंदाजा नहीं हुआ, तो हम बेजुबानों को बहुत बड़ा मेंटल ट्रॉमा दे सकते हैं.
2030 तक पूरा होगा सपना? $10 Million का इनाम!तमाम खतरों के बावजूद, इंसानों की बेजुबानों से बात करने की रेस बहुत तेज हो चुकी है. दुनिया भर में इसके लिए बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स पर पैसा लगाया जा रहा है. एक प्रोजेक्ट तो ऐसा भी है जिसमें पूरे 10 मिलियन डॉलर (लगभग 83 करोड़ रुपये) का इनाम रखा गया है. शर्त यह है कि AI के जरिए किसी जानवर से ऐसी बातचीत की जाए कि जानवर को पता भी न चले कि वो किसी इंसान या मशीन से बात कर रहा है. 'कॉलेर डूलिटल चैलेंज' को फंड करने वाले बिजनेसमैन जेरेमी कॉलेर का दावा है कि AI की स्पीड को देखते हुए 2030 तक हम जानवरों का यह 'सीक्रेट कोड' पूरी तरह क्रैक कर लेंगे.