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जरा सोचिए कि आप किसी बहुत ही जरूरी बिजनेस मीटिंग के लिए जूम कॉल पर जुड़े हैं. सामने बैठा बंदा आपके बॉस जैसा ही दिख रहा है और बिल्कुल उन्हीं की आवाज में बातें भी कर रहा है. आप उस पर भरोसा करके करोड़ों रुपये ट्रांसफर कर देते हैं, लेकिन बाद में पता चलता है कि वो आपका बॉस नहीं बल्कि एआई का बनाया हुआ एक नकली डीपफेक अवतार था. चौंकिए मत, ऐसा ही एक खौफनाक कांड पहले भी हो चुका है जिसमें एक कंपनी को $25.6 मिलियन का चूना लग गया था. इसी फर्जीवाड़े और एआई बोट्स की धांधली को रोकने के लिए OpenAI के चीफ सैम अल्टमैन एक ऐसा अनोखा आई-स्कैनिंग सिस्टम लेकर आए हैं जो मिनटों में बता देगा कि स्क्रीन के पीछे असली इंसान है या कोई नकली रोबोट.
इंटरनेट की दुनिया में असली और नकली का नया खेल
आजकल इंटरनेट पर जो कुछ भी हम देखते हैं या जिससे भी बात करते हैं, उस पर आंख बंद करके भरोसा करना बहुत मुश्किल हो गया है. एआई टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस हो चुकी है कि असली इंसान और एआई बोट्स के बीच का फर्क लगभग खत्म सा हो गया है. इसी समस्या का पक्का इलाज ढूंढने के लिए OpenAI के CEO सैम अल्टमैन ने अपने बायोमेट्रिक स्टार्टअप 'वर्ल्ड' (World) के जरिए एक बहुत बड़ा कदम उठाया है. कंपनी अपने 'प्रूफ ऑफ ह्यूमन' टूल को जूम और दुनिया की कई बड़ी वित्तीय और बैंकिंग कंपनियों के साथ जोड़ रही है ताकि फर्जी एआई रोबोट्स को सिस्टम से बाहर रखा जा सके.
क्या है यह अजीब सा दिखने वाला 'ऑर्ब' डिवाइस?
इस पूरी टेक्नोलॉजी का असली हीरो एक गोल आकार का चमकता हुआ डिवाइस है जिसे 'ऑर्ब' कहा जाता है. यह डिवाइस किसी साइंस-फिक्शन फिल्म के जादुई गोले जैसा दिखता है. इसका काम इंसान की आंख की पुतली यानी आइरिस की फोटो खींचना है. फोटो खींचने के बाद यह उस पहचान का एक एनक्रिप्टेड और सुरक्षित डिजिटल रिकॉर्ड तैयार कर देता है. इस पूरे सेटअप और उससे जुड़ी सेवाओं के नेटवर्क को 'वर्ल्ड आईडी' (World ID) का नाम दिया गया है. इसका सीधा मकसद कंपनियों और आम लोगों को यह भरोसा दिलाना है कि उनके साथ काम करने वाला बंदा कोई फेक AI नहीं बल्कि एक सच्चा इंसान है.
जूम मीटिंग्स में कैसे मिलेगी नीली टिक?
वर्ल्ड आईडी ने हाल ही में जूम के साथ पार्टनरशिप का ऐलान किया है. इस नए सिस्टम के तहत जब आप किसी जूम कॉल में शामिल होंगे, तो आपके नाम के आगे एक खास 'ब्लू बैज' या नीली टिक बनकर आएगी. यह नीली टिक सामने वाले को तुरंत बता देगी कि आप वही असली इंसान हैं जो इस अकाउंट से जुड़ा हुआ है. कंपनियों को यह चुनने का हक होगा कि कौन सी मीटिंग इतनी संवेदनशील है जहां यह ह्यूमन वेरिफिकेशन जरूरी होगा. इसके लिए यूजर को हर बार आंख स्कैन कराने की जरूरत नहीं पड़ेगी, वे अपने स्मार्टफोन कैमरे और ऐप की मदद से पहले से स्कैन किए गए डेटा से अपनी पहचान वेरीफाई कर सकेंगे.
तीन लेवल की सुरक्षा व्यवस्था
आपको बता दें कि इस ऐप में सुरक्षा और सुविधा के हिसाब से तीन अलग-अलग लेवल्स बनाए गए हैं.
Proof of Attributes: इसमें यूजर अपने सरकारी पहचान पत्रों के जरिए अपनी प्राथमिक वेरिफिकेशन पूरी करता है.
Proof of Presence: इसमें पहचान साबित करने के लिए यूजर को अपनी एक लाइव सेल्फी देनी होती है.
Proof of Human/Orb: यह सबसे हाई-सुरक्षा वाला लेवल है जहां ऑर्ब डिवाइस से आंखों का आइरिस स्कैन किया जाता है.
बैंक और फाइनेंशियल कंपनियां क्यों ले रही हैं इसमें दिलचस्पी?
सैम अल्टमैन की कंपनी ने बेन कैपिटल, ओपनएक्सचेंज, पैंटेरा कैपिटल जैसी बड़ी दिग्गज वित्तीय कंपनियों के साथ हाथ मिलाया है. इस नई सेवा को 'वर्ल्ड आईडी फॉर एजेंट्स' नाम दिया गया है. इसके जरिए बैंक और वित्तीय संस्थान यह पता लगा सकेंगे कि अगर कोई ऑटोमेटेड एआई एजेंट कोई वित्तीय ट्रांजैक्शन कर रहा है, तो उस एआई को किस इंसान ने ऑथराइज किया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक कई बड़े वित्तीय संस्थान अपने कर्मचारियों की आंखों को स्कैन कराने के लिए अपने दफ्तरों में खुद ये ऑर्ब डिवाइसेज लगाने जा रहे हैं ताकि बैंकिंग सिस्टम में किसी भी तरह की सेंध न लग सके.
डीपफेक फ्रॉड का खौफनाक सच
कंपनी ने इस कदम के पीछे 2024 में हुए एक डरावने हादसे का जिक्र किया है. उस घटना में एक कंपनी के सॉफ्टवेयर इंजीनियर को जूम वीडियो कॉल पर उसके ही कंपनी के सीनियर अधिकारियों के डीपफेक अवतारों ने ठग लिया था. उस फर्जी वीडियो कॉल के जरिए इंजीनियर से लगभग $25.6 मिलियन (अरबों रुपये) एक अनजान अकाउंट में ट्रांसफर करवा लिए गए थे. इसके अलावा क्लाउडफ्लेयर जैसी बड़ी टेक कंपनियों का मानना है कि 2027 तक इंटरनेट पर इंसानों से ज्यादा एक्टिविटी AI बोट्स की होने लगेगी. ऐसे में यह तय करना बहुत जरूरी हो गया है कि कौन सा काम इंसान कर रहा है और कौन सा काम कोई रोबोट.
प्राइवेसी और सुरक्षा का कितना रखा गया है ख्याल?
शुरुआत में इस प्रोजेक्ट को 'वर्ल्डकॉइन' के नाम से जाना जाता था और लोगों के मन में अपनी आंखों का डेटा शेयर करने को लेकर काफी डर भी था. लेकिन कंपनी का कहना है कि उनकी टेक्नोलॉजी प्राइवेसी का पूरा ध्यान रखती है. यह टेक्नोलॉजी किसी एक केंद्रीय डेटाबेस में लोगों का पर्सनल डेटा जमा नहीं करती. ऑर्ब डिवाइस आपकी आंखों के स्कैन को इस तरह एनक्रिप्ट कर देता है कि खुद कंपनी भी उसे दोबारा नहीं पढ़ सकती. इसके अलावा यह एक ओपन-सोर्स प्रोटोकॉल पर बना है जिसे कोई भी इस्तेमाल कर सकता है. जूम के अलावा कंपनी ने डिजिटल सिग्नेचर के लिए 'डॉक्यूसाइन' और डेटिंग ऐप्स पर होने वाले स्कैम रोकने के लिए 'टिंडर' के साथ भी हाथ मिलाया है.