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Meta ने अपनी शर्तों में ऐसा बदलाव किया है जिससे वह बिना कोई पैसा दिए न्यूज वेबसाइट्स का डेटा चुराकर अपने AI को ट्रेन कर सकता है. इसका सीधा मतलब यह है कि पब्लिशर्स के पास अब कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है.
30 अक्टूबर से लागू होगा Meta का नया नियम
मार्क जुकरबर्ग की कंपनी Meta अपनी कमर्शियल शर्तों में बड़ा बदलाव करने जा रही है. यह नया नियम 30 अक्टूबर 2026 से लागू हो जाएगा. इस नए अपडेट के बाद Meta ऑटोमेटेड टूल्स जैसे वेब स्क्रैपर्स, बॉट्स और क्राउलर्स का इस्तेमाल करेगा. इन टूल्स के जरिए Meta उन सभी वेबसाइट्स का डेटा उठाएगा जो किसी न किसी तरह उनके प्लेटफॉर्म से जुड़ी हैं. यानी अगर आपका बिजनेस या न्यूज चैनल फेसबुक या इंस्टाग्राम पर है तो आपकी वेबसाइट का कंटेंट Meta बिना किसी रोक-टोक के इस्तेमाल कर सकता है.
बिना पैसे दिए ट्रेन होगा AI मॉडल
कंपनी का कहना है कि वह इस इकट्ठा किए गए डेटा का इस्तेमाल अपने प्रोडक्ट्स और AI फीचर्स को बेहतर बनाने के लिए करेगी. यहीं से असली चिंता शुरू होती है. आज के समय में लगभग हर छोटी-बड़ी न्यूज कंपनी का पेज फेसबुक और इंस्टाग्राम पर बना हुआ है. पब्लिशर्स इन पेज का इस्तेमाल अपने आर्टिकल शेयर करने और पाठकों तक पहुंचने के लिए करते हैं. लेकिन अब Meta इसी बात का फायदा उठाकर उनके पूरे डेटा से अपने AI मॉडल को तैयार करने वाला है.
एक्सपर्ट्स ने दी बड़ी चेतावनी
कानूनी मामलों के जानकारों ने इस नए नियम पर गंभीर सवाल उठाए हैं. कॉर्नेल लॉ स्कूल के प्रोफेसर जेम्स ग्रिमेलमैन का कहना है कि यह नियम Meta को हर तरह का न्यूज कंटेंट इस्तेमाल करने की खुली छूट देता है. उनके मुताबिक सबसे डरावनी बात यह है कि Meta इस डेटा से जो AI बनाएगा, वह बाद में खुद पब्लिशर्स के मुकाबले में खड़ा हो जाएगा. यानी पब्लिशर्स की मेहनत का इस्तेमाल करके कंपनी उन्हीं का धंधा चौपट कर सकती है.
बड़ी टेक कंपनियों की मनमानी
AI बनाने वाली कंपनियों को अपना टूल चालाक बनाने के लिए बहुत सारे डेटा की जरूरत होती है. न्यूज वेबसाइट्स पर हर दिन नई जानकारी, इंटरव्यू और ग्राउंड रिपोर्टिंग छपती है. यह डेटा AI के लिए सबसे ज्यादा कीमती होता है. लेकिन सवाल यह उठता है कि जब रिपोर्टर दिन-रात मेहनत करके खबर निकालते हैं तो टेक कंपनियां उसे फ्री में क्यों इस्तेमाल करें. बड़ी कंपनियां मुफ्त का डेटा लेकर अरबों डॉलर कमा रही हैं लेकिन असली काम करने वालों को कुछ नहीं मिल रहा है.
गूगल और ओपन AI भी हैं इसी दौड़ में
यह कोई पहली बार नहीं है जब किसी टेक कंपनी ने ऐसा किया है. गूगल पहले से ही अपने सर्च इंजन में AI समरी दिखा रहा है. इसकी वजह से लोग अब मूल वेबसाइट पर क्लिक ही नहीं करते हैं. सैम आल्टमैन की कंपनी OpenAI पर भी कई मीडिया हाउस केस कर चुके हैं. OpenAI पर आरोप है कि उसने बिना इजाजत पब्लिशर्स का कॉपीराइट कंटेंट चुराया. अब Meta ने भी इसी रास्ते पर चलकर पूरी बहस को फिर से गर्म कर दिया है.
न्यूज मीडिया की कमाई पर सीधा हमला
डिजिटल न्यूज कंपनियां चलने के लिए ट्रैफिक और विज्ञापनों पर निर्भर होती हैं. जब कोई यूजर वेबसाइट पर आता है तभी कंपनी को विज्ञापन से कमाई होती है. लेकिन अगर AI टूल खुद ही यूजर को पूरी खबर का निचोड़ दे देगा तो कोई वेबसाइट पर क्यों जाएगा. इससे पब्लिशर्स का ट्रैफिक कम हो जाएगा और उनकी कमाई बंद हो जाएगी. अगर पब्लिशर्स के पास पैसा नहीं होगा तो वे पत्रकारों को सैलरी कैसे देंगे.
असली रिपोर्टिंग करेगा कौन
AI पुरानी जानकारी को समेट कर दिखा तो सकता है लेकिन वह खुद जाकर नई खबर नहीं ढूंढ सकता. ग्राउंड पर जाकर जांच करना, सवाल पूछना और सच सामने लाना इंसानों का ही काम है. अगर पब्लिशर्स बर्बाद हो गए तो इंटरनेट पर नई जानकारी आना ही बंद हो जाएगी. जब नई जानकारी ही नहीं होगी तो AI टूल भी गलत और पुरानी बातें ही दोहराते रहेंगे.