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सोचिए अगर दुनिया का सबसे ताकतवर AI अब ज़मीन पर बने डेटा सेंटर्स में नहीं, बल्कि पृथ्वी के चक्कर काटते हुए अंतरिक्ष में प्रोसेस हो तो? सुनने में किसी हॉलीवुड साइ-फाइ मूवी का प्लॉट लगता है न? लेकिन टेक दिग्गज गूगल ने इसे हकीकत बनाने के लिए अपना नया क्रेजी प्रोजेक्ट शुरू कर दिया है, जिसका नाम है Project Suncatcher (प्रोजेक्ट सनकैचर).
गूगल का मानना है कि जैसे हमने कभी सेल्फ-ड्राइविंग कारों और क्वांटम कंप्यूटिंग पर सालों तक रिसर्च की थी, वैसे ही अब स्पेस में AI कंप्यूटिंग की ताकत को टेस्ट करने का टाइम आ गया है. इस प्रोजेक्ट का सिंपल सा गोल यह देखना है कि क्या हम फ्यूचर में AI के बड़े-बड़े डेटा सेंटर्स को स्पेस में शिफ्ट कर सकते हैं? SpaceX और Planet जैसी कंपनियों के साथ हाथ मिलाकर गूगल अपने Trillium TPU चिप्स को लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में भेजने की तैयारी कर चुका है. आइए बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि ये पूरा मामला क्या है और गूगल स्पेस में क्या नया करने जा रहा है.
प्रोजेक्ट सनकैचर आखिर है क्या?
गूगल का 'प्रोजेक्ट सनकैचर' एक लॉन्ग-टर्म रिसर्च मूनशॉट है. आसान शब्दों में कहें तो मूनशॉट ऐसे बड़े और निडर आइडिया को कहते हैं जो पहली नजर में नामुमकिन लगता है, लेकिन अगर कामयाब हो जाए तो पूरी दुनिया का फ्यूचर बदल देता है.
इस प्रोजेक्ट के जरिए गूगल यह चेक कर रहा है कि क्या स्पेस में बड़ा AI इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया जा सकता है. हमारी धरती के निचले ऑर्बिट (Low Earth Orbit) में घूम रहे सैटेलाइट्स को लगभग लगातार सूरज की रोशनी मिलती रहती है. इसका सीधा फायदा यह है कि स्पेस में धरती के मुकाबले 8 गुना ज्यादा सोलर पावर बनाई जा सकती है. अगर भविष्य में कई सैटेलाइट्स को आपस में कनेक्ट कर दिया जाए, तो AI के बड़े से बड़े काम स्पेस में ही बिना किसी बिजली की कमी के पूरे हो सकेंगे.
स्पेस में AI भेजने का सबसे बड़ा चैलेंज
किसी भी बड़े विचार को सच करने से पहले एक बेसिक सवाल का जवाब खोजना होता है. क्या हमारा AI हार्डवेयर स्पेस के भयानक और मुश्किल माहौल में टिका रह सकता है?
गूगल ने अपने इस मिशन के लिए Planet नाम की कंपनी के साथ हाथ मिलाया है. यह पहला टेस्ट मिशन SpaceX के Transporter-18 राइडशेयर मिशन के साथ अंतरिक्ष में जा रहा है. इसका मेन काम यह डेटा जुटाना है कि गूगल के TPU (Tensor Processing Unit) चिप्स स्पेसफ्लाइट के तगड़े झटकों, खतरनाक रेडिएशन और वहां के तापमान के उतार-चढ़ाव को झेल पाते हैं या नहीं.
रॉकेट की खतरनाक वाइब्रेशन और TPU का टेस्ट
अंतरिक्ष तक पहुंचना आसान काम नहीं है. लो अर्थ ऑर्बिट तक पहुंचने में एक रॉकेट को करीब 10 मिनट का समय लगता है. इस दौरान स्पेसक्राफ्ट बहुत ही भयंकर वाइब्रेशन और प्रेशर से गुजरता है. यह प्रेशर सामान्य गुरुत्वाकर्षण बल यानी g-force से 10 गुना तक ज्यादा होता है.
इतना ही नहीं, सैटेलाइट के अंदर लगे छोटे कंपोनेंट्स और TPU चिप्स पर 50 से 100 G तक का झटका लगता है. इस सिचुएशन को चेक करने के लिए गूगल की टीम ने सैटेलाइट को हर तरफ से बहुत तेजी से हिलाकर वाइब्रेशन टेस्ट किया. आमतौर पर ऐसे मुश्किल टेस्ट पहली बार में फेल हो जाते हैं, लेकिन गूगल की टीम यह देखकर हैरान रह गई कि उनका हार्डवेयर इस भयंकर झटके को आसानी से झेल गया.
स्पेस रेडिएशन से निपटने की तैयारी
रॉकेट की लॉन्चिंग के झटकों से बचना तो बस पहला कदम था. असली चुनौती तब शुरू होती है जब TPU चिप्स धरती के एटमॉस्फियर से बाहर निकलते हैं. स्पेस में सूरज की तीखी किरणों और कॉस्मिक रेज़ (Cosmic Rays) का रेडिएशन बहुत खतरनाक होता है, जो किसी भी नॉर्मल इलेक्ट्रॉनिक्स को सेकंडों में खराब कर सकता है.
इस खतरे को चेक करने के लिए गूगल की टीम UC Davis की क्रॉकर न्यूक्लियर लैबोरेटरी पहुंची. वहां उन्होंने प्रोटॉन बीम मशीन के सामने TPU चिप्स को रखा और उस पर AI वर्कलोड चलाते हुए रेडिएशन की बौछार की. टीम यह देख रही थी कि क्या रेडिएशन की वजह से डेटा में कोई खराबी या 'बिटफ्लिप' (Bitflip) होती है. टेस्ट के रिजल्ट्स काफी शानदार रहे. गूगल के ट्रिलियम TPUs ने रेडिएशन के उस लेवल को आसानी से पार कर लिया, जो उन्हें 5 साल के स्पेस मिशन में मिलने वाला था.
बिना हवा के स्पेस में AI चिप्स को ठंडा कैसे रखेंगे?
धरती पर जब कंप्यूटर या सर्वर गर्म होते हैं, तो हम कूलिंग फैंस या लिक्विड कूलिंग का इस्तेमाल करते हैं. हवा बहती है और गर्मी बाहर निकल जाती है. लेकिन स्पेस में हवा बिल्कुल नहीं होती. इस वैक्यूम (Vacuum) में गर्मी को बाहर निकालने का इकलौता तरीका रेडिएटर्स (Radiators) होते हैं.
AI चिप्स एक छोटी सी जगह में बहुत ज्यादा गर्मी पैदा करते हैं. अगर इस गर्मी को तुरंत बाहर न निकाला जाए, तो चिप्स जलकर खराब हो सकते हैं. गूगल की टीम ने इसके लिए स्पेशल हीट पाइप्स (Heat Pipes) और रेडिएटर्स का एक नया कॉम्बिनेशन तैयार किया है. इसे धरती पर एक 'थर्मल वैक्यूम चैंबर' में टेस्ट किया जा चुका है, जो बिल्कुल स्पेस जैसा माहौल बनाता है. अब इस कूलिंग सिस्टम का असली टेस्ट स्पेस में होने जा रहा है.
लेजर से आपस में बात करेंगे AI सैटेलाइट्स
भविष्य में गूगल का प्लान सिर्फ एक-दो सैटेलाइट भेजने का नहीं है. गूगल का विज़न यह है कि एक साथ दर्जनों TPU चिप्स ले जाने वाले सैटेलाइट्स के बड़े-बड़े ग्रुप्स (Clusters) पृथ्वी के चक्कर लगाएंगे.
अब सवाल यह उठता है कि ये सैटेलाइट्स आपस में हाई-स्पीड डेटा कैसे ट्रांसफर करेंगे? इसके लिए गूगल लेजर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहा है. स्पेस में लेजर का यूज पहले भी हुआ है, लेकिन वे बहुत दूर स्थित सैटेलाइट्स के बीच धीमे डेटा ट्रांसफर के लिए होते हैं. गूगल को बहुत कम दूरी पर बेहद हाई-स्पीड डेटा चाहिए.
यह काम बिल्कुल वैसा ही है जैसे कई किलोमीटर दूर से एक हिलते हुए छोटे से सिक्के पर निशाना लगाना, जबकि आप खुद भी एक चलती हुई कार में बैठे हों. गूगल इस लेजर कनेक्टिविटी का सबसे बड़ा टेस्ट साल 2027 में करने वाला है, जब वे दो सैटेलाइट्स को एक साथ ऑर्बिट में लॉन्च करेंगे.