Gen Z के पास नौकरी है, बैंक बैलेंस है... लेकिन फिर भी है अकेलापन! क्यों स्क्रीन के पीछे रो रही है आज की पीढ़ी? इस 'देसी' लड़की ने ढूंढ निकाला इलाज
नौकरियों और हजारों ऑनलाइन फॉलोअर्स के बावजूद Gen Z अकेलेपन का शिकार क्यों हो रही है. इस गंभीर समस्या को हल करने के लिए न्यू यॉर्क की कृष्णा दोसापति ने 'Clockout' ऐप बनाया है जिसने 3.5 मिलियन डॉलर की फंडिंग हासिल की है. जानिए पूरी इनसाइड स्टोरी.
आज की युवा पीढ़ी यानी Gen Z के पास सब कुछ है. बढ़िया नौकरियां हैं, हाई-स्पीड इंटरनेट है, इंस्टाग्राम पर हजारों फॉलोअर्स हैं और लिंक्डइन पर बड़ा प्रोफेशनल नेटवर्क है. लेकिन इस चमक-धमक वाली डिजिटल दुनिया के पीछे एक कड़वा सच छिपा हुआ है. आज का युवा अंदर से बेहद अकेला और अलग-थलग महसूस कर रहा है. स्क्रीन के सामने बैठकर दिनभर काम करना और ऑनलाइन चैटिंग करना तो आसान हो गया है, लेकिन किसी से आमने-सामने बैठकर बात करना या असली दोस्त बनाना मुश्किल होता जा रहा है. इसी अकेलेपन को दूर करने और डिजिटल दुनिया को असली दुनिया से जोड़ने के लिए एक नया स्टार्टअप 'Clockout' मैदान में उतरा है जिसने पूरे टेक वर्ल्ड का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है.
ऑनलाइन दुनिया का असली सच
आजकल की Gen Z लाइफस्टाइल को देखकर ऐसा लगता है कि युवाओं के पास सब कुछ मौजूद है. वे बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम कर रहे हैं, घर बैठे लैपटॉप से लाखों रुपये कमा रहे हैं और सोशल मीडिया पर 24 घंटे एक्टिव रहते हैं. लेकिन जैसे ही लैपटॉप की स्क्रीन बंद होती है, कमरे में सिर्फ सन्नाटा और अकेलापन बच जाता है. लिंक्डइन पर किसी को कनेक्शन रिक्वेस्ट भेजना या ईमेल पर बात करना असली दोस्ती नहीं बना पाता. युवाओं को करियर में आगे बढ़ने के मौके तो मिल रहे हैं, लेकिन सुख-दुख बांटने के लिए असली इंसान नहीं मिल पा रहे हैं.
जब न्यू यॉर्क में एक लड़की को महसूस हुआ अकेलापन
इस समस्या को गहराई से समझा कृष्णा दोसापति ने, जो कि इस नए ऐप 'Clockout' की फाउंडर और सीईओ हैं. जब कृष्णा ने एनवायू (NYU) से अपनी पढ़ाई पूरी की और न्यू यॉर्क शहर में नौकरी शुरू की, तो उन्हें एक अजीब अनुभव हुआ. शहर में उनके जान-पहचान के लोग तो थे, लेकिन नए लोगों से मिलना और अपना दायरा बढ़ाना नामुमकिन सा लग रहा था. उन्होंने देखा कि जॉब तो मिल जाती है, लेकिन ऑफिस के बाहर असली कम्युनिटी या दोस्तों का ग्रुप बनाना बेहद कठिन है. उन्होंने सोचा कि जब उन्हें यह परेशानी हो रही है, तो दूसरे शहरों में शिफ्ट होने वाले नए युवाओं का क्या हाल होता होगा. इसी सोच से Clockout ऐप का जन्म हुआ.
क्या है यह नया ऐप 'Clockout'?
Clockout एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो डिजिटल दुनिया के इंट्रोडक्शंस को असली दुनिया की मुलाकातों में बदलने का काम करता है. आसान भाषा में कहें तो यह ऐप LinkedIn और Meetup के बीच की कड़ी है. यह ऐप आपके लोकेशन, इंटरेस्ट, काम और म्यूच्यूअल कनेक्शंस के हिसाब से आपको आसपास के पेशेवरों, क्लब्स और इवेंट्स से जोड़ता है. यानी आप सिर्फ स्क्रीन पर बातें नहीं करेंगे, बल्कि अपने आसपास रहने वाले लोगों के साथ चाय-कॉफी पी सकते हैं या किसी इवेंट में मिल सकते हैं.
स्टार्टअप को मिली 30 करोड़ रुपये से ज्यादा की फंडिंग
Clockout के इस अनोखे आइडिया ने निवेशकों को काफी प्रभावित किया है. कंपनी ने हाल ही में घोषणा की है कि उसने अपने लॉन्च के बाद से अब तक 3.5 मिलियन डॉलर (लगभग 30 करोड़ रुपये) की फंडिंग जुटा ली है. इस फंडिंग राउंड की अगुवाई 114 वेंचर्स ने की है, जबकि इवाइट वेंचर्स, अलाइड वेंचर्स, शेर वेंचर्स, गैनगेल्स और बीएमपीबी वीसी जैसे बड़े निवेशकों ने भी इसमें पैसा लगाया है. इतने बड़े निवेशकों का भरोसा यह दिखाता है कि अकेलापन अब एक बहुत बड़ा मार्केट और गंभीर मुद्दा बन चुका है.
आंकड़ों में छुपा अकेलापन का भयानक सच
गैलप (Gallup) के हालिया डेटा के मुताबिक 35 साल से कम उम्र के लगभग 22% कर्मचारियों ने माना कि वे अपने काम के दौरान भारी अकेलापन महसूस करते हैं. रिमोट वर्क यानी घर से काम करने वाले युवाओं में यह समस्या और भी ज्यादा देखी गई है. वहीं 18 से 29 साल के युवाओं में से लगभग 29% लोग रोजाना गंभीर अकेलेपन से गुजरते हैं. यानी हर तीसरा युवा अंदर ही अंदर घुट रहा है और अपने दिल की बात कहने के लिए किसी साथी की तलाश में है.
अकेलेपन का सेहत पर पड़ता है जानलेवा असर
अकेलेपन को सिर्फ एक दिमागी या सामाजिक समस्या समझना बहुत बड़ी भूल होगी. अमेरिकी सर्जन जनरल विवेक मूर्ति ने अकेलेपन और सामाजिक अलगाव को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा घोषित किया था. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि अकेले रहने से दिल की बीमारी, स्ट्रोक, डिमेंशिया, डिप्रेशन और कम उम्र में मौत का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. डॉक्टरों का तो यहां तक कहना है कि अकेलापन एक दिन में 15 सिगरेट पीने जितना नुकसान पहुंचा सकता है.
नए शहर और रिमोट वर्क ने बढ़ाई मुश्किलें
जब कोई युवा अपना घर छोड़कर नए शहर में नौकरी करने जाता है, तो उसे सबसे पहले रहने और काम करने की जगह तो मिल जाती है, लेकिन बात करने के लिए दोस्त नहीं मिलते. रिमोट वर्क यानी वर्क फ्रॉम होम ने इस दूरी को और बढ़ा दिया है. पूरे दिन जूम मीटिंग्स करने के बाद भी इंसान खुद को अकेला महसूस करता है. करियर ग्रोथ तो ऑनलाइन हो जाती है, लेकिन सोशल लाइफ पूरी तरह ठप पड़ जाती है. Clockout इसी दूरी को मिटाने की कोशिश कर रहा है.
6 लाख से ज्यादा डाउनलोड्स और बंपर कमाई
Clockout की ग्रोथ स्टोरी भी काफी दिलचस्प है. जब किसी शहर में इस ऐप के लगभग 1,000 यूजर्स हो जाते हैं, तो माउथ-टू-माउथ पब्लिसिटी से इसकी यूजर संख्या तेजी से बढ़ने लगती है. सिर्फ 10 महीनों के भीतर ही कंपनी ने $1.1 मिलियन (लगभग 9 करोड़ रुपये) का सालाना रेवेन्यू हासिल कर लिया है. ऐप को अब तक 6 लाख से ज्यादा बार डाउनलोड किया जा चुका है. इसका एक प्रीमियम सब्सक्रिप्शन मॉडल भी है, जिसमें $99 सालाना देकर यूजर्स को अनलिमिटेड इवेंट्स और क्लब्स का एक्सेस मिलता है.
क्या डिजिटल नेटवर्क मिटा पाएगा असली अकेलापन
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या एक मोबाइल ऐप इंसानी अकेलेपन को दूर कर सकता है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि टेक्नोलॉजी ने ही लोगों को दूर किया है और अब टेक्नोलॉजी के जरिए ही उन्हें करीब लाने की कोशिश की जा रही है. अगर Clockout जैसे प्लेटफॉर्म्स युवाओं को स्क्रीन से बाहर निकालकर असल दुनिया में मिलने के लिए प्रेरित करते हैं, तो यह टेक इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा सकारात्मक कदम साबित हो सकता है.