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आप पर किसी की गंदी नजर है! नंबर प्लेट, कपड़े और कौन है साथ... सब हो रहा रिकॉर्ड! हैक हुए सड़क किनारे कैमरे ने खोला बड़ा राज

सड़क पर गाड़ियों की निगरानी करने वाले हाई-टेक फ्लॉक (Flock) कैमरों को हैकर्स ने हैक कर लिया है. हैकर्स ने कैमरे का पूरा डाटा लीक करके खुलासा किया है कि यह सिर्फ गाड़ियों के नंबर नहीं, बल्कि इंसानों, बाइक, बैग और झंडों तक पर नजर रख रहा है. जानिए इस सीक्रेट सर्विलांस सिस्टम की पूरी सच्चाई.

Written By Mohit Chaturvedi
Published: Sep 17, 2026, 09:02 AM IST | Updated: Sep 17, 2026, 10:50 AM IST
Image Credit: Flock Safety Camera
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क्या आपने कभी सड़क किनारे, खंभों पर या हाईवे के एंट्री पॉइंट पर लगे उन छोटे, काले बॉक्स जैसे कैमरों पर गौर किया है? अक्सर जब हम और आप सड़कों पर गाड़ी चलाते हैं, तो यही सोचते हैं कि ये कैमरे ट्रैफिक पुलिस ने सिर्फ इसलिए लगाए हैं ताकि कोई रेड लाइट न तोड़े या ओवर-स्पीडिंग करने पर ऑटोमैटिक चालान घर न भेज दे. लेकिन अगर हम आपसे कहें कि सड़क पर लगा वो एक छोटा सा डिब्बा सिर्फ आपकी गाड़ी का नंबर प्लेट नहीं पढ़ रहा, बल्कि आप कब निकले, किसके साथ बैठे हैं, आपने कपड़े कैसे पहने हैं, आपकी बाइक पर कौन सा स्टीकर लगा है और आपका हर एक मूवमेंट कहां हो रहा है- यह सब रिकॉर्ड कर रहा है?

जी हां, हाल ही में साइबर सुरक्षा और टेक्नोलॉजी की दुनिया में एक ऐसा धमाका हुआ है जिसने आम लोगों की प्राइवेसी की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं. 'stegan0gram' नाम के एक हैकर ग्रुप ने सड़क पर लगे सबसे पॉपुलर और हाई-टेक सर्विलांस कैमरे को खंभे से उखाड़ दिया, उसकी पूरी मेमोरी डंप की और उसका पूरा कच्चा-चिट्ठा दुनिया के सामने रख दिया.

यह कैमरा अमेरिका की सबसे बड़ी सर्विलांस कंपनियों में से एक, फ्लॉक सेफ्टी (Flock Safety) का था. हैकर्स ने कैमरे का सिस्टम हैक करके उसकी पूरी अंदरूनी फाइलें और कोड टेक मैगजीन WIRED (वायर्ड) और 404 Media के साथ शेयर कर दिए. WIRED और 404 Media ने जब इन लीक फाइलों का मिलकर डिटेल्ड इन्वेस्टिगेशन किया, तो जो सच सामने आया उसने न केवल अमेरिका बल्कि दुनिया भर के आम नागरिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हमारी हर एक मूवमेंट पर सीक्रेट जासूसी हो रही है?

हैकर्स ने चलती सड़क से कैमरे को कैसे उखाड़ा और उसके अंदर का सिस्टम कैसे हैक किया?
इस कहानी की शुरुआत किसी साइबर थ्रिलर मूवी जैसी है. आमतौर पर हैकर्स इंटरनेट के जरिए किसी सिस्टम में घुसते हैं, लेकिन इस बार हैकर्स ने एक कदम आगे बढ़ाया. उन्होंने फील्ड में लगे एक लाइव फ्लॉक कैमरे को फिजिकली (शारीरिक रूप से) उखाड़ फेंका. यह कैमरा सोलर पैनल से चलता था और सड़क के ऊपर पोल पर लगा हुआ था.

हैकर्स ने कैमरे को निकालकर सुरक्षित जगह पर पहुंचाया, उसे डिस-आर्म किया और फिर उसकी रिवर्स-इंजीनियरिंग शुरू की. रिवर्स-इंजीनियरिंग का मतलब होता है किसी बनी बनाई डिवाइस को खोलकर, उसके हर एक पार्ट, कोड और सॉफ्टवेयर की गहराई से स्टडी करना ताकि पता चल सके कि वो काम कैसे करता है.

हैकर्स के ग्रुप 'stegan0gram' के एक मेंबर ने इंटरव्यू में बहुत साफ शब्दों में कहा, "जब हम इन कैमरों को रिवर्स-इंजीनियर करके अपने ऊपर नजर रखने वालों के सारे राज खोल सकते हैं, तो उन्हें सिर्फ तोड़कर क्यों छोड़ें? हमने हार्डवेयर को आजाद कराया और उसके अंदर के सारे सीक्रेट्स बाहर निकाल लिए."

कंपनी दावा करती थी कि डेटा पर ताला लगा है, फिर कैमरे से ही उसकी असली चाबी कैसे मिल गई?
फ्लॉक कंपनी हमेशा से यह दावा करती आई है कि उनके कैमरे इतने सुरक्षित हैं कि अगर कोई कैमरे को चुरा भी ले या तोड़ भी दे, तो भी उसके अंदर का डेटा कोई नहीं देख सकता क्योंकि सारा डेटा एनक्रिप्टेड यानी सुरक्षित पासवर्ड के पीछे लॉक होता है. कंपनी का कहना था कि फोटो खींचने के तुरंत बाद डेटा क्लाउड (इंटरनेट) पर भेज दिया जाता है और कैमरे में कुछ नहीं बचता.

लेकिन हैकर्स ने जब कैमरे की हार्ड डिस्क को स्कैन किया, तो उन्हें कैमरे के अंदर एंड्रॉइड ऑपरेटिंग सिस्टम मिला. इस सिस्टम में कई हिस्से थे. हैकर्स को पता चला कि 'Vendor' और 'Media' नाम के दो हिस्से बिल्कुल भी एनक्रिप्टेड नहीं थे, यानी उन पर कोई ताला नहीं लगा था.

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि 'Media' वाले हिस्से के अंदर ही उस एनक्रिप्शन की (Encryption Key) या पासवर्ड की चाबी रखी हुई थी, जो बाकी के सुरक्षित डेटा को लॉक करती थी. हैकर्स ने उसी कैमरे से वो चाबी उठाई और कैमरे के अंदर लॉक पड़े हजारों वीडियो और फोटो वाले फोल्डर को एक झटके में अनलॉक कर दिया. कंपनी का सालों पुराना "सिक्योरिटी का दावा" मिनटों में धरा का धरा रह गया.

सिर्फ गाड़ी का नंबर या इंसान भी? जानिए यह AI कैमरा आपके बैग और कपड़ों में क्या खोजता है
जब WIRED और 404 Media की टीम ने हैकर्स द्वारा दिए गए डेटा और कोड का डीप एनालिसिस किया, तो जो सच सामने आया वो किसी को भी डराने के लिए काफी है.

कंपनी हमेशा यही प्रचार करती है कि उनके कैमरे सिर्फ "लाइसेंस प्लेट रीडर" हैं- यानी वे सिर्फ गाड़ियों के नंबर पढ़ने के काम आते हैं. लेकिन लीक हुए कोड से साफ पता चला कि कैमरे के अंदर जो कंप्यूटर-विजन और AI सॉफ्टवेयर चल रहा है, उसे खासतौर पर 'इंसानों' को डिटेक्ट (Detect) करने के लिए भी ट्रेन किया गया है.

पैदल चलने वाले और बाइक राइडर्स: कैमरा सॉफ्टवेयर में ऐसा कोड लिखा गया है जो रास्ते से गुजरने वाले हर इंसान, पैदल चलने वाले और साइकिल चलाने वाले को अलग से पहचानता है. जब भी इसे कोई इंसान दिखता है, यह तुरंत नोट कर लेता है कि वो फोटो में कहां खड़ा है और उसे लेकर सिस्टम कितना 100% कन्फर्म है. WIRED ने जब कैमरे के AI मॉडल को खुद टेस्ट किया, तो पाया कि सॉफ्टवेयर ने एक रिपोर्टर की सेल्फी में भी इंसान को तुरंत पहचान लिया.

कपड़े और बैग तक स्कैन: टेस्टिंग के दौरान जब इस सॉफ्टवेयर को पुराने फुटेज पर चलाया गया, तो देखा गया कि कैमरे के सिस्टम ने बाइक सवारों के बैग पर लगे अमेरिका के झंडे के एक छोटे से पैच (Patch) को भी अलग से क्रॉप करके रिकॉर्ड कर लिया.

स्टीकर और बंपर चेकिंग: कार के बंपर पर लगे स्टीकर, कार डीलरशिप के फ्रेम और गाड़ियों के रंग-रूप को भी यह कैमरा अलग से पहचानकर उसका डेटाबेस तैयार करता है.

1 सेकंड में 100 फोटो खींचने वाला यह कैमरा एक महीने में कितना बड़ा डेटाबेस तैयार कर लेता है?
डेटा की एनालिसिस से पता चला कि यह कैमरा कोई नॉर्मल फोटो नहीं खींचता. जैसे ही सड़क पर कोई गाड़ी या हलचल होती है, कैमरा एक ही सेकंड में बहुत तेजी से फोटो की बौछार कर देता है.

28 से 100 फोटो प्रति सेकंड: एक आम गाड़ी जब कैमरे के सामने से गुजरती है, तो कैमरा उसकी करीब 28 से लेकर 100 से भी ज्यादा अलग-अलग एंगल्स और एक्सपोजर वाली फोटो खींच लेता है.

लाखों तस्वीरों का अंबार: लीक हुए कैमरे के लॉग्स (Logs) से पता चला कि सिर्फ 21 दिनों की वर्किंग में इस एक अकेले कैमरे ने लगभग 50,200 गाड़ियों को रिकॉर्ड किया और 16 लाख (1.6 Million) से ज्यादा हाई-क्वालिटी तस्वीरें जनरेट कीं.

डेली ट्रैकिंग: एक नॉर्मल दिन में यह कैमरा 3,300 से लेकर 4,500 गाड़ियों का डेटा अकेले जुटा रहा था. अब सोचिए, ऐसे हजारों कैमरे मिलकर हर रोज करोड़ों लोगों का पल-पल का लोकेशन डेटा तैयार कर रहे हैं.

नेशनल नेटवर्क का क्या मतलब है और कैसे 2,000 से ज्यादा एजेंसियां आपके लोकेशन डेटा को ट्रैक कर सकती हैं?
यह मुद्दा इसलिए और भी ज्यादा गंभीर हो जाता है क्योंकि यह कोई एक लोकल पुलिस स्टेशन का डेटा नहीं है. फ्लॉक कंपनी का एक "नेशनल नेटवर्क" (National Network) है.

मान लीजिए कि आप किसी छोटे शहर में रहते हैं और वहां के खंभे पर यह कैमरा लगा है. आपकी गाड़ी वहां से गुजरी और फोटो खींच ली गई. अब फ्लॉक का सिस्टम इस डेटा को सिर्फ लोकल पुलिस तक सीमित नहीं रखता. कंपनी का सॉफ्टवेयर देश भर की अलग-अलग एजेंसियों को इस डेटा में सर्च करने की इजाजत देता है.

WIRED द्वारा किए गए खुलासे में सामने आया कि जॉर्जिया के एक छोटे से शहर अल्फारेटा (Alpharetta) में लगे फ्लॉक कैमरों का डेटा देश भर की 2,000 से ज्यादा अलग-अलग एजेंसियों के पास उपलब्ध था. इनमें सिर्फ पुलिस ही नहीं, बल्कि लोकल कॉलेज, एयरपोर्ट की सुरक्षा एजेंसियां और यहां तक कि कई सरकारी इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट भी शामिल थे.

इसका मिसयूज (गलत इस्तेमाल) भी सामने आ चुका है. 404 Media की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कई लोकल पुलिस अधिकारियों ने बिना आधिकारिक परमिशन के इस नेशनल नेटवर्क का इस्तेमाल आम नागरिकों की लोकेशन ट्रैक करने के लिए किया. एक मामले में तो एक पुलिस अफसर ने किसी महिला की पर्सनल लोकेशन ट्रैक करने के लिए पूरे देश के फ्लॉक कैमरों का इस्तेमाल कर डाला था.

सर्विलांस कैमरों के खिलाफ जनता का गुस्सा क्यों भड़का और पुलिस नकली कैमरे लगाने पर क्यों मजबूर हुई?
इस तरह की बेधड़क जासूसी से तंग आकर अब दुनिया भर में आम लोग, खासकर यूथ और प्राइवेसी एक्टिविस्ट्स सड़कों पर उतर आए हैं. लोगों का मानना है कि बिना किसी कोर्ट आर्डर या बिना किसी अपराध के, हर आम नागरिक को 'संदिग्ध' मानकर उसकी पल-पल की लोकेशन रिकॉर्ड करना उनके मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) का हनन है.

कैमरों को तोड़ना और गायब करना: अमेरिका के अलग-अलग राज्यों में लोग रात के अंधेरे में इन कैमरों को उखाड़ रहे हैं, उनकी केबल काट रहे हैं या उन पर स्प्रे पेंट डाल रहे हैं. स्थिति इतनी बिगड़ गई कि कुछ शहरों की पुलिस ने असली कैमरों की जगह 3D-प्रिंटेड नकली कैमरों के बॉक्स (Fake Cases) लगाने शुरू कर दिए ताकि वो कैमरों को नुकसान पहुंचाने वालों को रंगे हाथों पकड़ सकें.

कैमरों पर बैन: जनता के भारी विरोध के बाद कई शहरों की लोकल सरकारों ने फ्लॉक कैमरों के कॉन्ट्रैक्ट्स रद्द कर दिए हैं और इन कैमरों को शहर से हटाने का फैसला लिया है.

भारी लोड की वजह से जब कैमरा बार-बार क्रैश हुआ, तो उसके कोड में कौन से अजीब मैसेजेस मिले?
हैकर्स द्वारा निकाले गए टेक्निकल डेटा में कुछ बहुत ही दिलचस्प और अजीब बातें भी सामने आईं.

डेटा दिखाता है कि इतनी भारी मात्रा में फोटो खींचने के कारण कैमरे का खुद का सिस्टम बुरी तरह हांफ रहा था. कैमरे की मेमोरी इतनी जल्दी भर जाती थी कि लॉग फाइल्स में 27,000 से ज्यादा बार "No space left on device" (डिवाइस में जगह नहीं बची है) का एरर दर्ज था. मेमोरी फुल होने की वजह से कैमरा बार-बार क्रैश हो रहा था और ऑटोमैटिक रीबूट (रिफ्रेश) हो रहा था.

लेकिन सबसे मजेदार बात यह थी कि इस सीक्रेट जासूसी कैमरे के कोड में इसके डेवलपर्स ने कुछ अजीब और मजाकिया मैसेजेस छिपा रखे थे:

हर दो मिनट में कैमरे का सिस्टम यह चेक करता था कि सॉफ्टवेयर सही से काम कर रहा है या नहीं. इस चेकिंग के बाद कोड बैकएंड में अपने आप एक मैसेज लिखता था: "Who’s a good boy?!" (कौन अच्छा बच्चा है?!). लीक फाइलों में यह मैसेज 12,000 से ज्यादा बार लिखा मिला.

जब भी कैमरा क्रैश होकर रीबूट होता था, तो रीबूट होने से ठीक पहले सिस्टम एक आखिरी मैसेज छोड़ता था: "A reboot was requested! ¡Adiós, Amigos!" (रीबूट की रिक्वेस्ट मिली है! अलविदा, दोस्तों!).

इन कोड्स से साफ पता चलता है कि यह बैकएंड सॉफ्टवेयर कितना कैजुअल तरीके से लिखा गया था, जबकि इसके जरिए लाखों लोगों की प्राइवेसी से खिलवाड़ हो रहा था.

हैकिंग के खुलासे के बाद कंपनी ने क्या सफाई दी और एक्सपर्ट्स का इस पर क्या रुख है?
इस पूरे हैकिंग और डेटा लीक के बाद जब फ्लॉक सेफ्टी (Flock Safety) कंपनी से सवाल पूछे गए, तो उनके प्रवक्ता ने हैकिंग को गैर-कानूनी बताया. कंपनी ने कहा, "किसी कैमरे को बिना इजाजत उखाड़ना और उसके साथ छेड़छाड़ करना एक अपराध है. हम सिक्योरिटी को गंभीरता से लेते हैं. अगर किसी रिसर्च को कोई कमी मिलती है, तो उन्हें हमारे सिस्टम के जरिए रिपोर्ट करना चाहिए." हालांकि, कैमरे के अंदर पासवर्ड की चाबी (Encryption Key) खुले में रखे होने के सवाल पर कंपनी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी.

दूसरी तरफ, कानून और सुरक्षा मामलों के जानकारों की राय बंटी हुई है. कुछ पूर्व पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कैमरों को उखाड़ना या हैक करना सही रास्ता नहीं है, क्योंकि इससे सरकार और पुलिस को यह तर्क देने का मौका मिल जाता है कि लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने के लिए ऐसे सख्त कदम और ज्यादा जरूरी हैं.

लेकिन प्राइवेसी एक्टिविस्ट्स और 'stegan0gram' जैसे हैकर ग्रुप्स का मानना है कि जब तक सरकारें और बड़ी टेक कंपनियां छुपकर आम जनता के डेटा पर कब्जा जमाती रहेंगी, तब तक उन्हें बेनकाब करने के लिए ऐसे डिजिटल और फिजिकल अटैक होते रहेंगे.

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About the Author

मोहित चतुर्वेदी डिजिटल न्यूज मीडिया में 16 से अधिक वर्षों का एक्सपीरियंस रखने वाले एक वरिष्ठ टेक जर्नलिस्ट हैं, जो वर्तमान में Zee News में असिस्टेंट न्यूज एडिटर के रूप में टेक्नोलॉजी सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं. स्मार्टफोन रिव्यू, गैजेट एनालिसिस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और साइबर सुरक्षा में गहरी विशेषज्ञता रखने वाले मोहित ने Apple, Samsung, OnePlus, Vivo और Xiaomi जैसे टॉप ब्रांड्स के फ्लैगशिप डिवाइसों का गहन और निष्पक्ष इन-डेप्थ रिव्यू किया है. अंतरराष्ट्रीय टेक इवेंट्स की ऑन-ग्राउंड रिपोर्टिंग का लंबा अनुभव रखने वाले मोहित ने लंदन में 'Nothing Phone' और आयरलैंड के बेलफास्ट में 'Realme' के ग्लोबल लॉन्च इवेंट्स को कवर किया है, और इससे पहले वे NDTV, आजतक और दैनिक भास्कर जैसे देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में टेक जर्नलिज्म और डिजिटल कंटेंट स्ट्रेटेजी में अहम भूमिकाएं निभा चुके हैं. जटिल तकनीकी बारीकियों को बेहद आसान भाषा में डिकोड करने के लिए पहचाने जाने वाले मोहित से सीधे Mohit.chaturvedi@zeemedia.com पर ईमेल के जरिए या उनके एक्स और इंस्टाग्राम हैंडल्स पर कनेक्ट किया जा सकता है.
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