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दुनियाभर में इस वक्त सिर्फ एक ही चीज़ को लेकर सबसे बड़ी होड़ मची है- AI और एडवांस माइक्रोचिप्स. जो इसमें आगे रहेगा, वही आने वाले वक्त में दुनिया पर राज करेगा. चीन इस बात को बहुत अच्छी तरह समझता है, और इसीलिए उसने अपने सबसे कीमती 'टेक टैलेंट' को किसी भी कीमत पर देश से बाहर न जाने देने की ठान ली है. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बीजिंग सरकार ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने पूरी टेक इंडस्ट्री को चौंका दिया है. अब चीन की टॉप AI और सेमीकंडक्टर कंपनियों के बड़े अधिकारियों (CEOs, CTOs) पर ही नहीं, बल्कि उनके पति-पत्नी और बच्चों के विदेश जाने पर भी सरकारी क्लीयरेंस की पाबंदी लगा दी गई है. यानी छुट्टियां बिताने जाना हो या कोई पर्सनल ट्रिप, बिना बीजिंग की इजाजत के कोई भी देश के बाहर कदम नहीं रख सकता.

क्यों घबराया हुआ है चीन?
दरअसल अमेरिका और चीन के बीच इस वक्त कोई आम लड़ाई नहीं, बल्कि एक हाई-टेक कोल्ड वार चल रही है. यह लड़ाई सुपरकंप्यूटिंग, जनरेटिव AI मॉडल्स और चिप मेकिंग टेक्नोलॉजी को लेकर है. चीन की सरकार को डर है कि अगर उसके टॉप एआई वैज्ञानिक, रिसर्चर्स या उनके परिवार विदेश जाते हैं, तो देश के सबसे संवेदनशील टेक्नोलॉजिकल सीक्रेट्स लीक हो सकते हैं. यही वजह है कि स्ट्रेटेजिक सेक्टर्स से जुड़े इन लोगों और उनके परिजनों की विदेशी उड़ानों पर पूरी तरह से सरकारी पहरा बिठा दिया गया है.
परिवारों को लपेटे में लेने की असली वजह
यह नियम सिर्फ कंपनियों के संस्थापकों या बड़े एग्जीक्यूटिव्स तक ही सीमित नहीं है. सरकार ने प्राइवेट AI स्टार्टअप्स के फाउंडर्स को सीधे संदेश भेज दिया है कि उनके परिवार के लोग भी अब इस निगरानी के दायरे में आते हैं. हालांकि कागजों पर इसे 'टोटल बैन' नहीं कहा जा रहा, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि किसी भी छोटी-मोटी ट्रैवलिंग के लिए भी अब इतने कागजी फॉर्म भरने पड़ रहे हैं और सरकारी विभागों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं कि बिना हरी झंडी मिले बाहर जाना लगभग नामुमकिन हो गया है.
अलीबाबा और डीपसीक पर पहले से था कड़ा पहरा
चीन अपने टैलेंट को रोकने के लिए ऐसा पहली बार नहीं कर रहा. इससे पहले भी अलीबाबा (Alibaba) और डीपसीक (DeepSeek) जैसी बड़ी टेक कंपनियों के मुख्य AI साइंटिस्ट्स के पासपोर्ट और विदेश दौरों पर रोक लगाई जा चुकी थी. फर्क बस इतना है कि इस बार सरकार ने दायरा काफी बड़ा कर दिया है. अब इसमें नए प्राइवेट स्टार्टअप्स के फाउंडर्स और उनके परिवार भी शामिल हैं. बीजिंग का साफ मानना है कि नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े किसी भी व्यक्ति को अपनी हर विदेशी यात्रा का एक-एक हिसाब देना ही होगा.

$2 बिलियन की 'मानुस डील' ने बढ़ाई सरकार की धड़कनें
इस नए फरमान के पीछे मेटा (Meta) और मानुस (Manus) के बीच हुई एक डील को भी मुख्य वजह माना जा रहा है. हाल ही में अमेरिकी टेक कंपनी मेटा ने 2 अरब डॉलर में 'Manus' नाम के AI स्टार्टअप को खरीदने का ऑफर दिया था, जिसकी जड़ें चीन से जुड़ी थीं. जैसे ही इस सौदे की खबर बीजिंग तक पहुंची, चीन सरकार ने तुरंत एक्शन लेते हुए मेटा को यह डील रद्द करने पर मजबूर कर दिया. चीन को लगा कि इस सौदे के जरिए उसका एडवांस एआई टैलेंट और पेटेंट सीधी अमेरिका के पाले में चला जाएगा. इस घटना के बाद से ही चीन अपने एआई एक्सपर्ट्स को लेकर हद से ज्यादा सख्त हो गया है.
15 सितंबर का सख्त कानून और 'एग्जिट बैन'
तकनीकी राज़ बाहर न जाएं, इसके लिए चीन ने 15 सितंबर से कुछ नए कड़े कानूनी प्रावधान भी लागू किए हैं. इन नियमों के तहत अगर किसी व्यक्ति पर इंडस्ट्रियल सीक्रेट्स या नियमों के उल्लंघन का जरा सा भी शक होता है, तो उस पर तुरंत 'एग्जिट बैन' लगा दिया जाता है. यानी जांच पूरी होने तक वह चीन की सीमा से बाहर नहीं जा सकता. चीन का उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MIIT) आने वाले दिनों में कई और टेक प्रोफेशनल्स को इस ब्लैकलिस्ट या वॉचलिस्ट में डालने की तैयारी कर रहा है.
चीन के युवा रिसर्चर्स के लिए करियर का संकट
सरकार के इस फैसले से चीन के उन युवा रिसर्चर्स को सबसे बड़ा झटका लगा है, जो अपनी योग्यता के दम पर इंटरनेशनल लेवल पर नाम कमाना चाहते थे. ChatGPT के बाद आए एआई बूम में चीन के हजारों युवा वैज्ञानिकों ने ग्लोबल पहचान बनाई थी. लेकिन अब पर्सनल और प्रोफेशनल फ्रीडम छीन जाने से उनमें काफी निराशा है. जब अपने बच्चों और परिवार को विदेश ले जाने के लिए भी सरकारी दफ्तरों की मिन्नतें करनी पड़ेंगी, तो कोई भी इंजीनियर खुलकर ग्लोबल प्रोजेक्ट्स पर काम नहीं कर पाएगा.