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क्या है 'वाटर-केरोसिन स्टोव'? 16 साल के देसी जुगाड़बाज ने पानी से जलाकर दिखाया स्टोव, IIT वाले भी रह गए हैरान!

मध्य प्रदेश के 16 साल के छात्र व्यासजी मिश्रा ने पानी और केरोसिन से चलने वाला अनोखा हाइब्रिड चूल्हा बनाकर सबको चौंका दिया. जानिए कैसे सिर्फ 600 रुपये के बजट में बने इस जुगाड़ू स्टोव ने 20% केरोसिन की बचत की और एजुकेशन मिनिस्टर से पहला प्राइज जीता.

क्या है 'वाटर-केरोसिन स्टोव'? 16 साल के देसी जुगाड़बाज ने पानी से जलाकर दिखाया स्टोव, IIT वाले भी रह गए हैरान!
Image Credit: Water powered stove

क्या आपने कभी सोचा है कि जिस पानी को हम प्यास बुझाने के लिए पीते हैं, उसी पानी से रसोई का चूल्हा भी जल सकता है? सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी जैसा लगता है, लेकिन मध्य प्रदेश के एक 16 साल के स्कूल स्टूडेंट ने इसे सच कर दिखाया था. 11वीं कक्षा में पढ़ने वाले व्यासजी मिश्रा ने एक ऐसा हाइब्रिड स्टोव तैयार किया, जो केरोसिन के साथ-साथ पानी की भाप से जलता है. इस देसी आविष्कार ने न सिर्फ साइंस एग्जीबिशन में पहला प्राइज जीता, बल्कि बड़े-बड़े वैज्ञानिकों और IIT के प्रोफेसरों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया. आइए जानते हैं इस यंग इनॉवेटर की पूरी इंस्पायरिंग स्टोरी.

16 साल के लड़के का बड़ा कारनामा
बात 2002-03 की है जब मध्य प्रदेश के देवसर के रहने वाले 16 साल के व्यासजी मिश्रा ने कुछ ऐसा कर दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. व्यासजी उस समय 11वीं कक्षा के छात्र थे. बचपन से ही उनका दिमाग साइंस और नई चीजों को समझने में लगता था. उन्होंने पानी और केरोसिन को मिलाकर एक ऐसा हाइब्रिड चूल्हा बनाया जो भाप की मदद से आग देता था. इस बेहतरीन इनोवेशन के लिए उन्हें तत्कालीन शिक्षा मंत्री इंद्रजीत कुमार पटेल के हाथों पहला पुरस्कार मिला था. इससे पहले साल 2000 में भी व्यासजी ड्रिप सिंचाई मॉडल बनाकर पहला प्राइज जीत चुके थे.

कैसे आया पानी से चूल्हा जलाने का आईडिया?
इस अनोखे चूल्हे की कहानी व्यासजी के घर से ही शुरू होती है. सबसे पहले उनके बड़े भाई पवनजी मिश्रा ने 2001 में साइंस फेयर के लिए ऐसा मॉडल बनाने की कोशिश की थी. हालांकि वह पहली बार में पूरी तरह सफल नहीं हो पाए थे. इसके बाद जब व्यासजी ने 2002-03 में स्कूल के साइंस एग्जीबिशन में भाग लेने का मन बनाया तो दोनों भाइयों ने मिलकर पुरानी गलतियों को सुधारा. दोनों ने मिलकर 'ऊर्जा के स्रोत' सेक्शन के तहत इस नए मॉडल पर काम करना शुरू किया और लगभग 6 महीने की कड़ी मेहनत के बाद इसे बनाकर तैयार कर दिया.

जानिए कैसे काम करता है यह खास चूल्हा
इस चूल्हे की बनावट बहुत ही सिंपल लेकिन स्मार्ट थी. इसमें दो अलग-अलग टैंक लगाए गए थे. एक टैंक में केरोसिन भरा जाता था और दूसरे टैंक में साधारण पानी. दोनों टैंकों में हवा का दबाव यानी प्रेशर बनाने के लिए अलग से पंप दिए गए थे. इसके अलावा चूल्हे में 3 रेगुलेटर लगाए गए थे. पहला रेगुलेटर केरोसिन के लिए, दूसरा पानी के लिए और तीसरा बर्नर को चालू-बंद करने के लिए था. पानी और केरोसिन के बहाव को सही तरीके से कंट्रोल करना सबसे बड़ी चुनौती थी जिसे इन रेगुलेटरों की मदद से हल किया गया.

शुरुआत केरोसिन से और फिर पानी की भाप का जादू
चूल्हे को इस्तेमाल करने का तरीका काफी दिलचस्प था. सबसे पहले केरोसिन वाले सेक्शन को ऑन किया जाता था और बर्नर को तब तक जलाया जाता था जब तक वह एकदम लाल-गर्म न हो जाए. जैसे ही बर्नर पूरी तरह गर्म हो जाता था, केरोसिन की सप्लाई बंद करके पानी वाला रेगुलेटर खोल दिया जाता था. अत्यधिक गर्मी के कारण पानी तुरंत भाप में बदल जाता था और यही भाप चूल्हे को लगातार जलाकर रखती थी. जब बर्नर धीरे-धीरे ठंडा होने लगता और लौ धीमी पड़ती, तो पानी बंद करके दोबारा थोड़ी देर के लिए केरोसिन चालू कर दिया जाता था.

आविष्कार में सुधार की थी गुंजाइश
व्यासजी एक सच्चे इनोवेटर थे इसलिए वे अपने मॉडल की कमियों को अच्छी तरह समझते थे. उनका मानना था कि पानी के लगातार इस्तेमाल से बर्नर ठंडा हो जाता है जिससे चूल्हा बंद हो सकता है. वे चाहते थे कि इस पर और रिसर्च हो ताकि ऐसा सिस्टम बने जो बिना रुके लगातार पानी पर चलता रहे. सुरक्षा के लिहाज से भी इसमें ध्यान रखना पड़ता था. जब पानी का वाल्व खुला हो तो केरोसिन का वाल्व पूरी तरह बंद रखना जरूरी था. इसके साथ ही टैंक में कचरा न जाए इसका भी खास ध्यान रखना पड़ता था.

तेल की बचत और कम धुआं देने वाला मॉडल
इस चूल्हे को बनाने का मुख्य मकसद केरोसिन की खपत को कम करना और जहरीले धुएं से मुक्ति दिलाना था. यह मॉडल उन गरीब परिवारों के लिए बहुत मददगार साबित हो सकता था जो पूरी तरह केरोसिन पर निर्भर थे. इसके अलावा कांच की फैक्ट्रियों, खिलौने बनाने वाली वर्कशॉप और लैबोरेट्रीज में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता था. उस समय बाजार के हिसाब से इस चूल्हे की लागत मात्र 600 रुपये तय की गई थी. इस कम लागत वाले मॉडल ने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचा.

IIT गुवाहाटी ने की टेस्टिंग और पाया 20% का फायदा
व्यासजी के इस मॉडल को लेकर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम (देहरादून) ने कुछ आशंकाएं जताई थीं. इसके बाद IIT गुवाहाटी ने इस चूल्हे पर गहन रिसर्च और टेस्टिंग की. आईआईटी की जांच और कैलकुलेशन में यह पाया गया कि यह चूल्हा लगभग 20 प्रतिशत तक केरोसिन की बचत कर सकता है. हालांकि शुरुआत में इससे ज्यादा बचत का दावा किया गया था, लेकिन 20 परसेंट की बचत भी उस दौर के हिसाब से एक बहुत बड़ी उपलब्धि मानी गई थी.

तंगी के बावजूद परिवार ने दिया पूरा साथ
व्यासजी का परिवार एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार था. उनके पिता तहसील ऑफिस में क्लर्क थे और पूरे परिवार की सालाना कमाई सिर्फ 60 हजार रुपये थी. परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण व्यासजी के पास महंगे उपकरण और साधन नहीं थे. व्यासजी ने खुद माना था कि पैसों की कमी के कारण उन्हें काफी दिक्कतें आईं. लेकिन उनके बड़े भाई पवनजी मिश्रा ने उन्हें कभी हार नहीं मानने दी. पवनजी ने छोटे भाई को लगातार टेक्निकल और फाइनेंशियल सपोर्ट दिया जिससे यह सपना सच हो पाया.

राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान और फंड
व्यासजी के इस अनोखे प्रयास को नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन (NIF) ने सराहा. NIF ने 'माइक्रो वेंचर इनोवेशन फंड' के तहत व्यासजी के इस वाटर-केरोसिन स्टोव और तीन अन्य प्रोजेक्ट्स के लिए 37,250 रुपये की राशि मंजूर की. यह राशि इस मॉडल के आगे के डेवलपमेंट और मार्केट रिसर्च के लिए दी गई थी. 16 साल के एक छोटे शहर के लड़के द्वारा शुरू की गई इस मुहिम ने यह साबित कर दिया कि अगर सोच बड़ी हो तो संसाधनों की कमी भी रास्ते का रोड़ा नहीं बन सकती.

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About the Author

Mohit Chaturvedi

Mohit Chaturvedi

मोहित चतुर्वेदी डिजिटल न्यूज मीडिया में 16 से अधिक वर्षों का एक्सपीरियंस रखने वाले एक वरिष्ठ टेक जर्नलिस्ट हैं, जो वर्तमान में Zee News में असिस्टेंट न्यूज एडिटर के रूप में टेक्नोलॉजी सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं. स्मार्टफोन रिव्यू, गैजेट एनालिसिस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और साइबर सुरक्षा में गहरी विशेषज्ञता रखने वाले मोहित ने Apple, Samsung, OnePlus, Vivo और Xiaomi जैसे टॉप ब्रांड्स के फ्लैगशिप डिवाइसों का गहन और निष्पक्ष इन-डेप्थ रिव्यू किया है. अंतरराष्ट्रीय टेक इवेंट्स की ऑन-ग्राउंड रिपोर्टिंग का लंबा अनुभव रखने वाले मोहित ने लंदन में 'Nothing Phone' और आयरलैंड के बेलफास्ट में 'Realme' के ग्लोबल लॉन्च इवेंट्स को कवर किया है, और इससे पहले वे NDTV, आजतक और दैनिक भास्कर जैसे देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में टेक जर्नलिज्म और डिजिटल कंटेंट स्ट्रेटेजी में अहम भूमिकाएं निभा चुके हैं. जटिल तकनीकी बारीकियों को बेहद आसान भाषा में डिकोड करने के लिए पहचाने जाने वाले मोहित से सीधे Mohit.chaturvedi@zeemedia.com पर ईमेल के जरिए या उनके एक्स और इंस्टाग्राम हैंडल्स पर कनेक्ट किया जा सकता है.
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