सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण, ग्रहों की चाल हो या शुभ-अशुभ काल की गणना. पंचांग में जो बातें हम झट से देखकर शुभ काम करने का मुहूर्त या चौघड़िया देख लेते हैं, वो सब इतना आसान नहीं होता यदि हमारे ऋषि-मुनियों ने इन विषयों पर इतनी खोज करके वेद-ग्रंथ न लिखे होते. फिर भी स्थानीय समय का सही अनुमान कैसे लगाया जाए? किसी तारे की तात्कालिक स्थिति कैसे पता की जाए? ये सब सवाल, सवाल ही रह जाते यदि हमारे पास वो 5 ऐतिहासिक वेधशालाएं न होतीं, जिन्हें 200 से ज्यादा साल पहले महाराजा सवाई सिंह ने देश के अलग-अलग शहरों में बनवाया था.
इनमें से दिल्ली की वेधशाला जंतर-मंतर एक बार फिर देश-दुनिया में चर्चित है, जिसके पीछे वजह है यहां CEC (मुख्य चुनाव आयुक्त) को लेकर चल रहा विरोध प्रदर्शन. इस घटना को ही जरिया बनाकर हम देश की 5 वेधशालाओं की स्थिति, उनके महत्व और काम करने के तरीके के बारे में जानते हैं, जो मॉडर्न ऑर्ब्जवेट्रीज की नींव बनीं. जिनके जरिए हमारा देश अरबों-खरबों मील दूर के ब्रह्मांड के रहस्यों, नए आकाशीय पिंडों को खोजने से लेकर मौसम पर नजर रखने से लेकर तमाम तरह की खोजों में जुटे हैं, जो आम लोगों की जिंदगी के लिए तो जरूरी हैं हीं, भविष्य के लिए भी नए-नए रास्ते बना रहे हैं.
आमेर और जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय की गणित और खगोलविज्ञान में बड़ी रूचि थी. उन्होंने उस समय की प्रचलित खगोलीय गणनाओं को बेहतर बनाने के लिए वेधशालाओं का निर्माण कराया. ताकि सूर्य, चंद्रमा, तारों आदि की स्थिति का प्रत्यक्ष अवलोकन करके गणनाएं की जा सकें. नई खगोलीय सारणियां तैयार करना, अलग-अलग जगहों से मिलने वाली जानकारियों की तुलना करना भी उनका मकसद था.
ये वेधशालाएं बनवाने के लिए 18वीं शताब्दी में राजा जयसिंह ने भौगोलिक स्थितियों के साथ-साथ उन शहरों के ऐतिहासिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक महत्व को भी ध्यान में रखते हुए, विद्वानों की सलाह पर देश के 5 शहरों को चुना था.

दरअसल, जंतर-मंतर मूल नाम का अपभ्रंश है जो समय के साथ बोलचाल में बदल गया. इसका मूल नाम था यंत्र-मंत्र, जो कि संस्कृत शब्द हैं. यहां जंतर (यंत्र) से मतलब है उपकरण, मशीनें या वैज्ञानिक यंत्र. वहीं मंतर (मंत्र) से मतलब है मंत्रण या गणना करना, सलाह करना. लेकिन समय के साथ यह जंतर-मंतर हो गया और फिर इसका नाम यही पड़ गया.
गणनाओं के लिए जंतर-मंतर में लगे बुनियादी यंत्र तो सभी वेधशालाओं में एक जैसे हैं. वहीं कुछ यंत्र अलग-अलग हैं. इसके पीछे वजह वेधशाला की भौगोलिक स्थिति, वहां की गणनाओं के अलग तरीके, उद्देश्य और आकार आदि हैं. साथ ही राजा मानसिंह ने एक के बाद एक नई वेधशाला बनाते समय पुरानी गलतियों को सुधारा भी, ताकि यंत्र सटीक से सटीकतम गणनाएं दे सकें और आधुनिक भी हों. इनमें कुछ प्रमुख यंत्र बेहद लोकप्रिय हुए. जैसे- सम्राट यंत्र, राम यंत्र.
सम्राट यंत्र - यह विशाल धूपघड़ी है, जिसकी ऊंची त्रिकोणीय दीवार पर पड़ने वाली सूर्य की रोशनी और उसकी छाया के अनुसार स्थानीय समय की गणना की जाती है.
जयप्रकाश यंत्र - यह रोचक बनावट वाला यंत्र है, जो कटोरे या आधे गोले की तरह बना है. इसकी अंदरूनी सतह पर खगोलीय निर्देशांकों से जुड़े निशान बनाए गए हैं. इनके जरिए आकाशीय पिंडों की स्थिति को समझा जाता है.
राम यंत्र - राम यंत्र गोलाकार दीवारें है और उनके बीच कई स्तंभ बनाए गए हैं, जिनके जरिए आकाशीय पिंडों की स्थिति मापी जाती है. यहां ऊंचाई के कोण और क्षितिज के साथ उसकी दिशा के जरिए पिंड की स्थिति पता की जाती है.
मिश्र यंत्र - यह दिल्ली के जंतर-मंतर में है और इसकी आइकोनिक फोटो मशूहर है. यह स्थानीय समय की गणना करने और साल के कुछ विशेष दिनों से संबंधित गणनाएं करने के लिए है.
राशिवलय यंत्र - जयपुर का यह यंत्र ज्योतिष की नजर से विशेष है. इस यंत्र में अलग-अलग राशियों से संबंधित आकाशीय निर्देशांक बनाए गए हैं. जिससे सूर्य और अन्य ग्रहों की राशि-पथ के सापेक्ष स्थिति का पता लगाया जाता है. आसान शब्दों में कहें तो ज्योतिष में हम सूर्य, मंगल, बुध आदि ग्रहों की चाल की बात करते हैं यह उसकी गणना करने वाला यंत्र है. यानी कि कौनसा ग्रह, कब किस राशि में है, यह यंत्र बताता है.
ये सभी विशालकाय यंत्र पत्थरों से बने हैं और इनकी वैज्ञानिक संरचना, इन पर अंकित निर्देशांकों के जरिए ही आकाशीय पिंडों की स्थिति की गणना होती है. अब सवाल यह है कि मोटे तौर पर यह यंत्र कैसे काम करते हैं. तो इसे हम 4 चरणों में समझ सकते हैं.
1. अवलोकन - इसके जरिए सूर्य या अन्य किसी आकाशीय पिंड (ग्रह या तारे) की स्थिति देखी जाती है.
2. मापना - इसमें छाया, कोण और यंत्र पर बने निशानों से संबंधित माप पढ़े जाते हैं.
3. गणना - फिर इन मापों को प्रचलित खगोलीय गणना-पद्धतियों के साथ मिलाकर परिणाम निकालना.
4. सारणी बनाना - इसके बाद गणना से मिले आंकड़ों के जरिए खगोलीय सारणियां तैयार की जाती हैं और अलग-अलग वेधशालाओं से मिले इसी तरह की सारणियों की तुलना करके जांच की जाती है.
हालांकि इन यंत्रों की सटीकता कितनी है या थी, इस बारे में अलग-अलग दावे हैं. उदाहरण के लिए जयपुर की वेधशाला को लेकर 20 सेकंड तक की सटीकता की बात की जाती है.
अब करते हैं, पंचांग की बात. जिसे हिंदू धर्म और ज्योतिष में काल की गणना, मुहूर्त आदि के लिए रीढ़ कहा जा सकता है. पंचांग के जरिए ही तिथि, योग, नक्षत्र, शुभ-अशुभ काल, सूर्य-चंद्रमा की स्थिति आदि की जानकारी मिलती है और पूजा मुहूर्त निकाले जाते हैं.
पंचांग के ये सारे जरूरी अंग सिर्फ वेधशालाओं से मिलने वाली गणनाओं या सारणियों के आधार पर ही तैयार किए जाते थे, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता है. क्योंकि पंचांग के निर्माण में अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी विद्वत पंरपराएं रही हैं और उनका पालन आज भी किया जाता है. वेधशालाओं ने इसमें मदद की है, लेकिन उनका काम खगोल विज्ञान पर ज्यादा केंद्रित रहा है.
हालांकि मौजूदा समय में पंचांग बनाने का काम बेहद आधुनिक हो चुका है. इसके लिए आधुनिक खगोल विज्ञान और कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर की बेजा मदद ली जाती है. ताकि हर गणना सटीक से सटीकतम हो सके. यानी कि सिर्फ सिद्धांत, पारंपरिक सूत्रों से गणनाएं नहीं होतीं, बल्कि आंखों से देखकर की गई वास्तविक स्थिति के आधार पर पंचांग बनाए जाते हैं.
वैसे तो राजा जयसिंह द्वारा बनाई गई पांचों वेधशालाएं बहुत खास हैं लेकिन इनमें दिल्ली और जयपुर की वेधशाला दुनिया भर में फेमस हैं. दिल्ली का जंतर-मंतर, यहां की आइकोनिक पहचान हमेशा से रहा है, हालांकि बीते कुछ सालों से तमाम तरह के विरोध प्रदर्शन का अड्डा रहा है. लेकिन हाल ही में सरकार ने नया आदेश जारी किया है, जिसके अनुसार अब आम जनता को होने वाली परेशानियों और सुरक्षा कारणों के चलते जंतर-मंतर में विरोध करने की अनुमति नहीं होगी. बल्कि विरोध प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान, सीबीडी ग्राउंड को तय किया गया है.
वहीं जयपुर की वेधशाला तो UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल है. यह उस ऐतिहासिक परंपरा का महत्वपूर्ण और सजीव उदाहरण है जिसमें आकाशीय पिंडो की स्थिति का प्रत्यक्ष अवलोकन किया जाता है. यह खगोलीय गणनाओं और वास्तुकला का नायाब उदाहरण है.
(Disclaimer: यह लेख ऐतिहासिक स्रोतों और खगोलीय तथ्यों पर आधारित है. कुछ विवरणों में स्रोतों के अनुसार अंतर संभव है.)