धागे से मगरमच्छ को बांधने वाली कौन थी वो करवा नाम की महिला? जिसके नाम पर रखा जाता है करवा चौथ का व्रत
हर साल लाखों महिलाएं करवा चौथ का व्रत रखती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि करवा नाम की वो महिला कौन थी, जिसके नाम पर यह व्रत रखा जाता है? साथ ही उसने ऐसा क्या विशेष काम किया था? करवा चौथ पर जानिए इससे जुड़ी दो अहम कहानियां.
Karwa Mata Kahani: करवा चौथ के दिन करवा माता की पूजा की जाती है, जिनकी बहादुरी के आगे मगरमच्छ भी हार गया था. उनके नाम पर ही रखे गए करवा चौथ व्रत पर हर साल लाखों महिलाएं यह व्रत करती हैं. शाम को पूजा में करवा चौथ व्रत की कथा पढ़ती हैं. इसमें आमतौर पर वीरावती की कथा पढ़ी जाती है. वहीं करवा माता की बहादुरी की कहानी से सभी लोग परिचित नहीं हैं. आज 29 अक्टूबर 2026 को करवा चौथ व्रत के मौके पर हम ये दोनों अहम कहानियां जानते हैं, जो इस व्रत के महत्व और इसकी शक्ति को दर्शाती हैं.
करवा माता की कहानी
पुराने समय की बात है करवा नाम की एक महिला अपने पति के साथ नदी किनारे बसे एक गांव में रहती थी. वो गजब की पतिव्रता थी और तप में ताकत थी. एक दिन उसका पति हमेशा की तरह नहाने के लिए नदी में उतरा और तभी पानी में छिपे मगरमच्छ ने उसका पैर अपने जबड़े में दबोच लिया. पति करवा का नाम लेकर चिल्लाने लगा.
पति के चिल्लाने की आवाज सुनते ही करवा नदी किनारे पहुंची. जैसे ही करवा ने मगरमच्छ के जबड़े में अपने पति को देखा उसने अपने आंचल से एक सूत का धागा निकाला और उससे मगरमच्छ को बांध दिया. सूत का कच्चा धागा भले ही बेहद कमजोर था लेकिन करवा के सतीत्व और पतिव्रत धर्म में इतनी ताकत थी कि उस कच्चे धागे से ही मगरमच्छ जकड़ गया.
इसके बाद करवा ने मृत्यु के देवता यमराज का आह्वाहन किया और जब यमराज आए तो उनसे कहा कि वे मगरमच्छ को नरक ले जाएं और मेरे पति को दीर्घायु होने का वरदान दो, वरना मैं आपको श्राप दे दूंगी. करवा की तपस्या का बल देखकर यमराज डर गए. उन्होंने तुरंत अपने दूतों से मगरमच्छ को नरक में भिजवा दिया और करवा के पति को सौ साल जीने का वरदान दे दिया. उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि थी. उसी दिन से इस तिथि पर करवा के नाम पर करवा चौथ व्रत रखा जाने लगा. मान्यता है कि यह व्रत रखने से पत्नी के तप बल से पति की उम्र लंबी होती है.
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करवा चौथ व्रत की कथा
प्राचीन काल में एक साहूकार के सात पुत्र और एक इकलौती पुत्री थी जिसका नाम वीरावती (या करवा) था. वीरावती अपने मायके में थी और उसने अपने पति की लंबी उम्र के लिए करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा. शाम होते-होते भूख और प्यास से वीरावती की हालत खराब होने लगी. भाइयों को अपनी लाडली बहन की यह पीड़ा देखी नहीं गई.
भाइयों ने दूर एक पेड़ की ओट में जलता हुआ दीपक छलनी के पीछे इस तरह रखा, जिससे वह बिल्कुल चांद की तरह चमकने लगा. वीरावती ने उसे असली चांद समझ लिया, उसे अर्घ्य दिया और उसे ही देखकर व्रत का पारण कर लिया. जैसे ही वह व्रत पारण के लिए भोजन करने बैठी, उसे अपने पति की मृत्यु का समाचार मिल गया.
वीरावती दुखी होकर खूब विलाप करने लगी. तभी उसे देवी की कृपा से पता चला कि उसने बिना असली चांद देखे भ्रमवश व्रत तोड़ दिया था. उसने खूब क्षमा मांगी और अगले साल विधि-विधान से करवा चौथ का व्रत रखने का संकल्प लिया. इससे उसके पति को पुनः जीवन प्राप्त हुआ. फिर वह हर साल व्रत रखने लगी.
इसके अलावा भी करवा चौथ की कई कथाएं प्रचलित हैं, जैसे महाभारत काल में द्रौपदी ने भगवान श्री कृष्ण के कहने पर अपने पांचों पति की विजय और लंबी उम्र की कामना के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था, जिसके प्रभाव से पांडवों को विजय मिली.
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(Disclaimer: इस बताई गई करवा माता की कहानी पौराणिक कथा, मान्यताओं और लोक-श्रुतियों पर आधारित है. हर क्षेत्र में इसके सुनाने का तरीका अलग हो सकता है. हमारा उद्देश्य केवल जानकारी देना है.)