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दशहरा या विजयादशमी पर्व पर हथियारों की पूजा होती है, रावण दहन होता है लेकिन इसके साथ-साथ अलग-अलग जगहों पर ढेर सारी परंपराएं निभाईं जाती हैं. साथ ही इस दिन पान खाना बहुत शुभ माना जाता है. इसके अलावा दशहरे के दिन कुछ खास तरह के सपने दिखना, एक शुभ जीव का दिखना अच्छा शकुन माना गया है. ऐसा होना देवी-देवताओं की कृपा का संकेत माना जाता है. खासतौर पर इसे भगवान शिव और भगवान श्रीराम से जोड़ा जाता है. यह जीव है नीलकंठ पक्षी.
भगवान राम ने दशहरे के दिन लंकापति रावण का वध किया था इसलिए इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व विजयादशमी कहा जाता है. साथ ही हथियारों की पूजा करते हैं. हिंदू धर्म-शास्त्रों के अनुसार भगवान राम, भगवान शिव के परमभक्त थे. उन्होंने लंका पर चढ़ाई करने से पहले समुद्र किनारे शिवलिंग बनाकर पूजा की थी.
चूंकि भगवान शिव को नीलकंठ कहा जाता है, इसलिए इस दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन होना भगवान शिव और भगवान राम की कृपा का संकेत माना जाता है. समुद्र मंथन में निकले हलाहल विष का पान करने से शंकर जी का गला नीला पड़ गया था और वह नीलकंठ कहलाए.
आमतौर पर नीलकंठ पक्षी प्रकृति के करीब पाया जाता है, जैसे पेड़ों के झुरमुट में, जंगलों और पहाड़ों में. यही वजह है कि दशहरे के दिन लोग नीलकंठ के दर्शन करने के लिए घने पड़ों के पास उसे खोजते हैं. वहीं खुद ब खुद यदि नीलकंठ पक्षी दिख जाए तो क्या ही कहने हैं. यह भाग्य खुलने का संकेत माना गया है. क्योंकि नीलकंठ मुश्किल से ही नजर आता है. उस पर इस विशेष दिन सुबह -सुबह होना दुर्लभ सा ही है.
दशहरा के दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन होना कष्टों-समस्याओं से मुक्ति होने, आर्थिक तंगी दूर होने, तरक्की की बाधाएं खत्म होने का संकेत माना जाता है. यह निकट भविष्य में मान-सम्मान मिलने का भी इशारा है. वहीं कई जगहों पर दशहरे के दिन शमी के पेड़ की पूजा करने की भी परंपरा है. साथ ही लोग एक-दूसरे को शमी के पेड़ की पत्तियों देकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. पौराणिक मान्यता है कि एक बार दशहरे के दिन शमी के पेड़ की पत्तियां सोने की बन गईं थीं. तब से ही धन-समृद्धि पाने के लिए दशहरे के दिन शमी के पेड़ या पौधे की पूजा करने का विधान है.
(Disclaimer: दशहरे पर नीलकंठ के दर्शन को शुभ मानने की परंपरा धार्मिक आस्था और लोकमान्यताओं पर आधारित है. इसके दर्शन से भविष्य में सफलता या समृद्धि मिलने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है.)