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जब भी रामायण की कथाओं में लंकापति रावण का जिक्र होता है, तो उसकी बेमिसाल ताकत की बात जरूर की जाती है. इतिहास और धार्मिक मान्यताओं में रावण को इतना बलशाली माना गया है कि कोई साधारण योद्धा उसके सामने टिक नहीं पाता था.
आम तौर पर यही समझा जाता है कि रावण को केवल भगवान श्रीराम ही युद्ध में हरा पाए थे. लेकिन कथाएं ऐसी भी हैं, जो एक अलग ही कहानी बताती हैं.
श्रीराम से पहले भी रावण ने कई बार अपनी बड़ी-बड़ी इच्छाओं के चक्कर में ऐसी हार झेली थी, जिसने उसके अहंकार को चूर-चूर कर दिया था.
रावण को सबसे पहली और ऐतिहासिक हार किष्किंधा के वानरराज बाली के हाथों मिली थी. रावण अपनी शक्तियों के नशे में चूर होकर बाली से युद्ध करने उसकी नगरी पहुंच गया था.
उस समय बाली समुद्र किनारे बैठकर अपनी पूजा और ध्यान में लीन थे. रावण बार-बार युद्ध की ललकार देकर उनकी भक्ति में बाधा डालने लगा.
तब बाली ने रावण को अपनी कांख में दबा लिया और चारों समुद्रों की परिक्रमा करने निकल पड़े. बाली को यह वरदान प्राप्त था कि जो भी उनके सामने आएगा, उसकी आधी शक्ति बाली के भीतर आ जाएगी.
इसी वरदान और अपार बल के कारण रावण चाहकर भी बाली की पकड़ से आजाद नहीं हो पाया और अंत में उसे हार स्वीकार करनी पड़ी.
दूसरी पराजय रावण को माहिष्मती नगरी के सम्राट सहस्त्रबाहु अर्जुन से मिली थी. सहस्त्रबाहु अत्यंत प्रतापी और एक हजार भुजाओं वाले बलशाली राजा थे.
एक बार जब रावण सहस्त्रबाहु से युद्ध लड़ने पहुंचा, तो वहां एक अनोखी घटना हुई थी. सहस्त्रबाहु ने अपनी हजार भुजाओं से बहती हुई नर्मदा नदी का रास्ता ही रोक दिया.
इसके बाद जैसे ही उन्होंने नदी का रुका हुआ पानी एक साथ छोड़ा, तो जल के प्रचंड वेग में रावण की पूरी सेना बह गई. इसके बाद दोनों के बीच हुए सीधे युद्ध में सहस्त्रबाहु ने रावण को आसानी से बंदी बना लिया.
रावण की तीसरी शर्मनाक हार पाताल लोक के दानवराज राजा बलि के द्वार पर हुई थी. रावण अपना प्रभाव जमाने के उद्देश्य से पाताल लोक स्थित राजा बलि के महल में युद्ध की चुनौती देने जा पहुंचा.
उस समय राजा बलि के महल के आंगन में कुछ छोटे बच्चे खेल रहे थे. रावण की ललकार सुनकर उन बच्चों ने उसे कोई बड़ा खतरा नहीं समझा.
बच्चों ने खेल-खेल में ही रावण को दबोच लिया और ले जाकर घोड़ों के अस्तबल में बांध दिया. महापंडित और बलवान रावण खुद को उन बच्चों के बंधन से भी नहीं छुड़ा सका और वहां उसकी करारी फजीहत हुई.
चौथी और सबसे प्रसिद्ध कथा महादेव के प्रति रावण के दुस्साहस की है. रावण भगवान शिव का बड़ा भक्त था, लेकिन एक बार अहंकार में आकर वह शिवजी को ही चुनौती देने कैलाश पर्वत पहुंच गया.
उस समय महादेव परम ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए थे. रावण ने अपनी शक्तियों के घमंड में पूरे कैलाश पर्वत को ही उठाने की कोशिश की. महादेव ने रावण के इस अहंकार को तोड़ने के लिए बस अपने पैर का अंगूठा पर्वत पर थोड़ा सा दबा दिया.
अंगूठे के हल्के से दबाव से कैलाश इतना भारी हो गया कि रावण की हथेली पर्वत के नीचे बुरी तरह दब गई. दर्द से तड़पते हुए रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना की और महादेव से क्षमा मांगी.
इन सभी पौराणिक कथाओं से हमें जीवन का एक बड़ा संदेश मिलता है. रावण के पास अपार ज्ञान, असीमित शक्तियां और बेहसाब संपत्ति थीं.
इसके बावजूद जब-जब उसने अपने बल के घमंड में मर्यादा लांघी, उसे हार और अपमान का सामना करना पड़ा. बाली, सहस्त्रबाहु, राजा बलि और भगवान शिव से मिली सीख के बाद भी उसका अहंकार खत्म नहीं हुआ.
अंत में माता सीता के हरण के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के हाथों उसका विनाश हो गया. ये इतिहास हमें सिखाता है कि शक्ति कितनी भी हो, अहंकार हमेशा विनाश की राह ही दिखाता है.
(Disclaimer): यह लेख हिंदू धर्मग्रंथों, वाल्मीकि रामायण, श्रीमद्भागवत पुराण और प्रचलित पौराणिक मान्यताओं में उपलब्ध कथाओं पर आधारित है.
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