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भारत में ऐसे बहुत से मंदिर हैं जो अपने-अपने खासियत के लिए जाने जाते हैं. लेकिन अगर आपको कोई कहे कि एक मंदिर ऐसा भी है जिसमें पुरा शहर बसता है.
जी हां, ऐसा है. तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में एक ऐसा मंदिर स्थित है. जिसके परिसर में पूरा शहर बसता है.
कहा जाता है ये दुनिया के सबसे छोटे देश, वेटिकन सिटी से भी बड़ा है. साथ ही इसे भारत का सबसे बड़ा मंदिर भी कहा जाता है.
अब आपके मन में ये भी सवाल आ रहा होगा कि ये मंदिर एक देश से भी बड़ा है वो कैसे. तो वेटिकन सिटी का साइज लगभग 109 से 121 एकड़ है
वहीं इस मंदिर का साइज युनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज के मुताबिक 156 एकड़ का है. जो इसे देखने में बहुत विशाल बनाता है.
मंदिर का नाम श्री रंगनाथस्वामी मंदिर है. ये खूबसूरत मंदिर कावेरी नदी के द्वीप पर बना हुआ है. जो इसको और खास बनाती है.
ये मंदिर भगवान विष्णु के श्री रंगनाथ स्वरूप को समर्पित किया गया है. आज हम इस खबर में मंदिर के बारे में डिटेल से जानकारी देंगे.
सबके मन में ये सवाल आ रहा होगा, कि आखिर इतने विशाल मंदिर को बनवाया किसने था. तो इसके पीछे बहुत सारी मान्यताएं हैं.
पौराणिक मान्यताओं के हिसाब से तो इस मंदिर को सबसे पहले राजा धर्म वर्मा ने कावेरी नदी के द्वीप पर कराया था.
लेकिन समय के साथ मंदिर ने कई समस्याएं झेली थी. बाढ़ की वजह से मंदिर रेत की परतों के नीचे पूरी तरह दब गया था.
मान्यता है कि बाद में चोल वंश के एक राजा अपने बगीचे में आराम कर रहे थे तभी वहां एक तोता बैठा था. उस तोते ने एक श्लोक कहा, जिससे प्रेरित होकर उन्होंने श्री रंगनाथस्वामी मंदिर को खोज निकाला.
इस विशाल मंदिर का बनना किसी एक राजा के कार्यकाल में तो संभव नहीं था. इस मंदिर का निर्माण एक राजा ने नहीं बल्कि कई राजवंशों ने मिलकर करवाया था.
जिसमें सैकड़ों साल लगे थे. चोल राजाओं ने जब इसे खोजा तो इसके परिसर को बेहतर करने का काम किया था.
इसके बाद 13वीं सदी के चोल राजाओं, तंजौर के पांड्य शासकों और होयसल राजाओं ने इस मंदिर को और विशाल और बड़ा बनाया.
आगे चलकर 16वीं सदी में विजयनगर साम्राज्य और नायक शासकों ने मंडपों और विशाल दीवारों को बनवाया था. ये जानकारी भी युनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज के साइट से ली गई है.
मंदिर के अंदर खूबसूरत और भव्य मंडप और कलाकृतियां बनी हुई हैं. जिसे देखकर आंखें खुली की खुली रह जाती है.
कभी कभी हम सोचते हैं तब के लोगों ने इन्हें कैसे डिजाइन किया होगा. विजयनगर काल में ग्रेनाइट पत्थरों से बना 953 खंभों का मंडप तैयार किया गया था.

जो किसी थिएटर की तरह लगता है. नायक शासक भी पीछे नहीं थे उन्होंने शेषरायर मंडप तैयार किया था, जो अपनी गजब के नक्काशी के लिए जानी जाती है.
खंभों पर पर उछलते हुए घोड़ों की 40 मूर्तियां बनाई गई हैं. जो बाघों को कुचल रही हैं.

श्री रंगनाथस्वामी मंदिर की बनावट भव्य है. ये मंदिर सात बड़ी दीवारों से घिरा है, जिन्हें प्राकारम कहा जाता हैं.
ये दीवारें ब्रह्मांड के सात लोकों को दर्शाती हैं. पूरे परिसर में कुल 21 गेट (यानी गोपुरम) बने हुए हैं.
इनमें सबसे मुख्य गेट राजगोपुरम है, जिसकी ऊंचाई 236 फीट है. ये पूरे एशिया का सबसे बड़ा गोपुरम है, जिसे करीब 16 किमी दूर से भी आसानी से देखा जा सकता है.
इस मंदिर में भगवान रंगनाथ की मूर्ति किसी ग्रेनाइट पत्थर से नहीं बनी है. इसे चूने, गारे, कस्तूरी, कपूर, शहद, गुड़ और चंदन के विशेष लेप के मिश्रण यानी स्टुको से बनाया गया है.
मंदिर की दीवारों पर जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक रंगों से बनी दुर्लभ चित्रकारी मौजूद है. एक बेहद दिलचस्प बात ये है कि भगवान के यानै वाहन ( हाथी का वाहन) में 4 दांत बने हुए हैं.
विज्ञान के अनुसार 4 दांतों वाले हाथी 1.5 करोड़ साल पहले विलुप्त हो चुके हैं, जो इस मंदिर की प्राचीनता का संकेत देते हैं.
रामायण काल से जुड़ी कथा के अनुसार, लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम ने ये दिव्य मूर्ति विभीषण को उपहार में दी थी.
विभीषण जब इसे लंका ले जा रहे थे, तो वे कावेरी नदी के तट पर रुके. वहां के राजा धर्म वर्मा की प्रार्थना और भगवान की इच्छा से ये मूर्ति यहीं स्थापित हो गई और आगे हिलने से मना कर दिया.
वैसे तो भगवान ने विभीषण को रक्षा का वचन दिया. यही कारण है कि मंदिर में भगवान रंगनाथ का मुख दक्षिण दिशा यानी श्रीलंका की ओर है.
(Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), ऐतिहासिक अभिलेखों और मंदिर के आधिकारिक दस्तावेजों पर आधारित है.