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Pitru Paksha 2026: पितृपक्ष में पितरों की शांति और मोक्ष के लिए श्राद्ध कर्म करने का विधान है. इस 16 दिन की अवधि में पिंडदान करें तो पितर प्रसन्न होकर परिवार को सुख-शांति का आशीर्वाद देते हैं. शास्त्रों के अनुसार, श्राद्ध कर्म कुछ पवित्र नदियों के तट पर करने का विधान है. मान्यता है कि त्रिवेमी, फल्गु, गंगा, यमुना, अलकनंदा, क्षिप्रा और कावेरी जैसी मोक्षदायिनी नदियों के तट पर विधि-विधान से पिंडदान करें तो पितर तृप्त होकर नर्क से निकलते हैं और मोक्ष की प्राप्ति करते हैं. इन तटों पर तर्पण करने से 7 पीढ़ियों तक के पूर्वज तृप्त होकर मुक्ति पाते हैं.
गया को मोक्ष की भूमि कहते हैं जहां के फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने का विधान है. इस तट पर पूर्वजों का तर्पण करने से पितृ सीधा बैकुंठ के रास्ते पर निकल जाते हैं. गया में फिलहाल करीब 48 स्थान हैं जहां पर पिंडदान किया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि मां सीता ने फल्गु नदी के तट पर ही राजा दशरथ का पिंडदान किया था. फल्गु नदी के स्पर्श मात्र से ही और यहां तर्पण करने से अकाल मृत्यु प्राप्त पितृ तृप्त और मुक्ति होते हैं.
काशी में गंगा तट पर विशेषकर मणिकर्णिका और दशाश्वमेध घाट पर अगर पितृ का श्राद्ध व तर्पण कर्म किया जाए तो दिवंगत आत्माएं भवसागर से पार होती हैं. धार्मिक मान्यता है कि शिव इस नगरी में जब यहां के इस दो पवित्र घाटों पर विधि-विधान से तर्पण कर्म किया जाता है तो कुल का कल्याण होता है. काशी में गंगा नदी के तट पर अपने पूर्वजो के नाम हवन आदि करवाने की भी बड़ी धार्मिक मान्यता है.
प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर यानी जहां पर गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है वहां के तट पर पवित्र जल से तर्पण करें तो यह अति पुण्यदायी और मोक्षदायी माना गया है. प्रयागराज को'तीर्थराज' कहा गया है और जो भी अपने पितृ का तर्पण यहां के त्रिवेणी घाट पर करता है उसे पितृ ऋण से मुक्ति मिल जाती है. संगम पर श्राद्ध कर्म से पहले क्षौर कर्म और स्नान आदि किया जाता है और फिर विधि-विधान से श्राद्ध कर्म को संपन्न किया जाता है.
मथुरा में यमुना के तट पर विश्रंती, बोधिनी तीर्थ और वायु तीर्थ पर जब परिवारजन अपने पितृ का श्राद्ध कर्म करते हैं तो पितृ के लिए बैकुंठ के द्वार खुल जाते हैं. इस तरह के अनुष्ठान ब्राह्मणों के निर्देश पर 7 पिंड या चावल में मिक्स गेहूं के आटे से गोले बनाए जाते हैं, इसे शहद-दूध के साथ मृतक और पूर्वजों की शांति के लिए प्रसाद के रूप में तैयार करते हैं और मंत्रों के जाप कर चढ़ाया जाता है. ऐसा करने से पितृ प्रसन्न होते हैं.
चमोली जिले में अलकनंदा नदी के तट पर स्नान करने से ही सभी पाप धुल जाते हैं. अलकनंदा नदी के तट पर स्थित ब्रह्म कपाल पर पिंडदान करने से पितरों को नरक लोक से मुक्ति और मोक्ष मिलता है. यहां पिंडदान करने से दिवंगत की आत्मा शांत हो जाती है और परिवार के जीवित सदस्य सुखी होते हैं.
मध्य प्रदेश के उज्जैन में शिप्रा नदी के तट और सिद्धवट के पास अपने पितृ का श्राद्ध कर्म करने से पितृ दोष दूर होता है.पितरों को पूर्ण तृप्ति मिलती है. पितृ शांत होकर मोक्ष का रास्ता पकड़ते हैं. पिंडदान के लिए शिप्रा नदी के तट को एक आदर्श स्थान माना गया है.
दक्षिण भारत में कावेरी नदी के तट पर विशेषकर पवित्र अम्मा मंडपम घाट पर पितृपक्ष के महालय अमावस्या पर तर्पण करने से 7 पीढ़ियों के पितरों को तृप्ति मिलती है. दक्षिण भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में भी तर्पण का विशेष महत्व है. तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में श्रीरंगम का ‘अम्मा मंडपम’ घाट कावेरी नदी के तट पर स्थित है जो बहुत प्राचीन घाट है. श्राद्ध अनुष्ठान करने, पितृ तर्पण और पिंडदान करने के लिए यह घाट प्रसिद्ध है. हजारों की संख्या में अम्मा मंडपम पर श्रद्धालु आते हैं और तर्पण करते हैं. इसके बाद श्रद्धालु भगवान श्रीरंगनाथ स्वामी के मुख्य मंदिर में दर्शन पाते हैं. यहां दर्शन करने से मृत्यु और जीवन के बीच का संतुलन बना रहता है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथों व लोक मान्यताओं पर आधारित है। किसी भी श्राद्ध-पिंडदान कर्म या स्थान की जानकारी को लेकर पहले अपने स्थानीय पुरोहित या विद्वान से सलाह जरूर लें।.)