Pitru Paksha 2026: द्वादशी तिथि पर 'संन्यासी श्राद्ध', जानें कुतुप-रौहिण मुहूर्त अपराह्न काल और तर्पण की विधि
द्वादशी तिथि के श्राद्ध को 'संन्यासी श्राद्ध' क्यों कहा जाता है, इस तिथि के श्राद्ध का क्या महत्व है, कुतुप-रौहिण मुहूर्त के साथ ही इस दिन अपराह्न काल क्या रहने वाला है? आइए इस लेख में ये सभी जानकारियां हासिल करें.
पितृ पक्ष के द्वादशी श्राद्ध का अति शुभ फल प्राप्त है. इस साल द्वादशी श्राद्ध 7 अक्टूबर 2026 को पड़ रहा है. इस तिथि पर किए जाने वाले श्राद्ध कर्म को शास्त्रों में 'संन्यासी श्राद्ध' कहा गया है. इस तिथि पर उन पूर्वजों का तर्पण किया जाता है जिनकी मृत्यु किसी भी महीने के किसी भी पक्ष में द्वादशी तिथि पर हुई हो या फिर उन पितृ का श्राद्ध कर्म किया जाता है जिन्होंने जीवनकाल में संन्यास ग्रहण किया था.
मान्यताओं के अनुसार पूरी श्रद्धा के साथ इस दिन तर्पण करने से पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है और पितर संतुष्ट होकर वंशजों के रोगदोष को दूर करते हैं. आइए द्वादशी तिथि के श्राद्ध का महत्व और शुभ मुहूर्त जान लें.
द्वादशी तिथि और विशेष मुहूर्त
द्वादशी तिथि की शुरुआत 07 अक्टूबर को आधी रात में 12:34 बजे से
द्वादशी तिथि का समापन 07 अक्टूबर को देर रात 11:16 बजे होगा.
कुतुप मुहूर्त: दोपहर 11:45 से लेकर 12:32 बजे तक
रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:32 से लेकर 01:19 बजे तक
अपराह्न काल (मुख्य समय): दोपहर 01:19 से लेकर 03:40 बजे तक
द्वादशी श्राद्ध का महत्व
सन्यासी पूर्वजों का इस दिन जो भी व्यक्ति विधि-विधान से स्मरण कर उनके नाम से तर्पण करता है, उसके घर में शांति आती है और कभी अन्न-धन की कमी नहीं रहती है. पितृ की आत्मा परम शांति पाकर वंशजों को आशीर्वाद देती है. पौराणिक मान्यताएं हैं कि द्वादशी श्राद्ध से प्रसन्न होकर पूर्वज अपने वंशजों को लंबी आयु, सुख, समृद्धि और स्वस्थ शरीर का आशीर्वाद देते हैं. भविष्य की सभी संभावित संकटों का नाश होता है.
सरल तर्पण विधि
सुबह स्नान आदि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और साफ वस्त्र पहनें.
दोपहर के समय पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें.
दक्षिण दिशा की ओर मुख करें तर्पण करें.
हाथ में जल, कुशा, जौ और काले तिल लें और पितरों का स्मरण करते अर्पित करें.
चावल, जौ के आटे और तिल को मिलाकर पिंड तैयार करें.
इस पिंडों को कुशा पर रखकर पितरों को चढ़ाएं.
घर में पूर्ण सात्विक भोजन बनाकर पंचबलि के लिए अंश निकाले.
इसके बाद ब्राह्मण को घर बुलाकर भोजन कराएं.
इसके बाद दान-दक्षिणा दें.
(डिस्क्लेमर- यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)