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पितृ पक्ष का हर दिन खास होता है और पितरों यानी कि पूर्वजों को समर्पित है. लेकिन इसकी कुछ तिथियां विशेष हैं, जैसे- पितृ दीपावली या पितृ दिवाली. हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि (पितृ पक्ष) को पितृ दिवाली मनाई जाती है. मान्यता है कि इस दिन पितरों के लिए श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने और उनके निमित्त दीपदान करने से उन्हें स्वर्ग मिलता है. पितृ अपने परिजनों के साथ भोजन करने के लिए आते हैं.
वैसे तो लोग अपने घर या आसपास के जलाशयों के पास पितृ दीपावली का दीपदान करते हैं लेकिन देश के कुछ खास स्थान ऐसे हैं, जहां पितृ दिवाली पर दीपदान करना विशेष शुभ माना गया है. ये स्थान हैं - गया का विष्णुपद मंदिर और फल्गु नदी का देवघाट. हर साल आश्विन कृष्ण त्रयोदशी पर यहां देश-दुनिया से लोग पहुंचते हैं और बड़ी संख्या में दीपदान करते हैं.
श्रद्धालु यहां अपनी श्रद्धा अनुसार 108 से लेकर 1001 दीए जलाते हैं. शाम को यहां का माहौल देखने काबिल होता है. जब हजारों दीए यहां जगमगाते हैं.
पितृ दिवाली के दिन पितरों के निमित्त श्राद्ध किया जाता है, साथ ही इस दिन गया धाम के विष्णुपद मंदिर में 56 भोग अर्पित किए जाते हैं. खासतौर पर खीर का भोग जरूर लगाना चाहिए. मान्यता है कि भूख-प्यास से व्याकुल पितरों को जब उनके परिजन खीर का भोग लगाते हैं, तो वे तृप्त होकर उन्हें खूब आशीर्वाद देते हैं.
इस दिन ब्राह्मणों को खीर खिलाकर पितरों को तृप्त करें. साथ ही गरीबों को भी खीर-पूरी का भोजन कराएं. ऐसा करने से पितर बहुत प्रसन्न होते हैं.
जो लोग गया जाकर दीपदान नहीं कर पा रहे हैं, वे अपने घर पर रहकर भी पितरों के लिए दीपदान कर सकते हैं. इसके लिए मिट्टी के दीपक में चौमुखी बाती रहे हैं, फिर इसमें 2 लौंग और सरसों का तेल डालें. इस दीपक को जलाकर घर की दक्षिण दिशा में रखें. वहीं कुछ लोग सर्व पितृ अमावस्या के दिन पितरों के लिए दीपदान करते हैं. ऐसे में आपके परिवार में जो परंपरा हो, आप उसका पालन कर सकते हैं.
(Disclaimer: यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)