कृष्ण भक्त मीराबाई की भक्ति के किस्से आज भी खूब सुने और सुनाए जाते हैं. जिन्होंने भगवान कृष्ण के प्रेम में जहर भी हंसते-हंसते पी लिया था. मीरा बाई का जन्म आश्विन पूर्णिमा के दिन हुआ था, जो कि इस साल आज 26 अक्टूबर को है. मीराबाई की जयंती पर 2 ऐसे रोचक किस्से भी जानते हैं, जो उनकी भक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाते हैं. साथ ही बताते हैं कि कैसे कृष्ण के लिए गाए गए उनके भजनों ने बादशाह अकबर को संन्यासी का वेश धारण करने के लिए मजबूर कर दिया, तो वृंदावन के संत जीव गोस्वामी को शर्मिंदा कर दिया था.
प्रचलित कथाओं और लोक मान्यताओं के अनुसार, मेवाड़ की रानी और कृष्ण भक्त मीरा के प्रेम में डूबे भजन और कविताएं बेहद मशहूर थीं. उनकी चर्चा न केवल पूरे राज्य में होती थी, बल्कि कई कोस दूर दिल्ली के तख्त पर बैठे बादशाह अकबर तक पहुंची. हिंदू धर्म में रुचि रखने वाले अकबर ने जब हिंदू रानी मीरा बाई के भजन-कीर्तन की इतनी तारीफ सुनी तो वे उनसे मिलने और उनके भजन सुनने के लिए व्याकुल हो गए.
चूंकि मीराबाई के पति मेवाड़ के राजा सांगा के पुत्र राजकुमार भोजराज और मुगल बादशाह अकबर एक-दूसरे के दुश्मन थे, ऐसे में अकबर का मीराबाई से मिलना संभव नहीं था, तब अकबर ने एक साधु का वेश बनाया और उस मंदिर में जा पहुंचे, जहां मीराबाई अक्सर भजन-कीर्तन करती थीं. वहां मीरा बाई की मधुर आवाज में उनके कृष्ण भजन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते थे. इन्हीं के बीच अकबर बैठ गए और भजन सुनते रहे.
कुछ देर बाद अकबर भाव-विभोर उठे और उन्होंने भगवान कृष्ण की मूर्ति पर हीरे-मोतियों से जड़ा हार अर्पित कर दिया. तब वहां मौजूद लोग चौंक गए कि कैसे एक संन्यासी इतनी कीमती हार भगवान को चढ़ा सकता है. इसके बाद जब छानबीन हुई तो पता चला कि वे बादशाह अकबर थे जो अपने प्रिय गायक तानसेन के साथ वहां आए थे. हालांकि इस घटना को कई लोग सही नहीं मानते हैं क्योंकि मीराबाई के जन्म और मृत्यु का समय अकबर के जन्म से पहले का माना जाता है.
एक अन्य घटना के अनुसार जब कृष्ण भक्त मीराबाई वृंदावन पहुंची तो वे कई साधु-संतों और कृष्ण प्रेमियों से मिलीं. उन्होंने वृंदावन के मशहूर संत, विद्वान और कृष्ण प्रेमी श्री जीव गोस्वमी से मिलने की भी इच्छा जताई. जब जीव गोस्वामी जी तक यह खबर पहुंची तो उन्होंने मीराबाई से मिलने से इनकार कर दिया.
दरअसल, संत जीव गोस्वामी आजीवन ब्रह्मचारी थे और उन्होंने नियम ले रखा था कि वे किसी भी स्त्री से नहीं मिलेंगे, ना मुख देखेंगे. इस कारण उनके शिष्यों ने मीराबाई को आश्रम के बाहर ही रोक दिया. तब मीराबाई ने वजह पूछी तो शिष्यों ने उन्हें वजह बताई.
इस पर मीराबाई ने जो कहा, वह जानने के बाद जीव गोस्वामी शर्मिंदा होकर दौड़े चले आए और आश्रम के बाहर आकर मीराबाई से क्षमा मांगी व उनसे भेंट की. मीराबाई ने उनके शिष्य से कहा था, ''मैंने तो सुना था कि वृंदावन में श्रीकृष्ण ही एकमात्र 'पुरुष' (नायक/स्वामी) हैं और यहां बाकी तो सभी भक्त गोपियां हैं. (सभी स्त्री-पुरुष गोपी-भाव) में हैं. मुझे यह जानकर आश्चर्य हो रहा है कि यहां कोई दूसरा पुरुष भी है.''
यह संदेश जब जीव गोस्वामी के पास पहुंचा तो उन्हें अहसास हुआ कि वे अभी भी देह-भाव में ही अटके हुए हैं, जबकि जो मीराबाई उनसे मिलने आईं हैं, वे तो कृष्ण जी की भक्ति और प्रेम में उनसे कहीं ऊपर हैं.
इस तरह ये 2 घटनाएं बताती हैं कि मीराबाई की भगवान कृष्ण की अटूट भक्ति और प्रेम कितना अद्भुत था कि न बादशाह खुद को उनके दर्शन करने से रोक पाया और न संत.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी लोक मान्यताओं, भक्तमाल और इतिहास ग्रंथों में वर्णित प्रसंगों पर आधारित है. मीरा बाई और अकबर की मुलाकात का प्रसंग कई इतिहासकार विवादित मानते हैं, इसे केवल भक्ति परंपरा के लोक किस्से के रूप में देखें. इसका उद्देश्य किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं है.)