महाभारत कथा: द्रौपदी को अपने ही पति के पुत्र पर क्यों आया इतना गुस्सा? दिया ऐसा श्राप, हो गई मृत्यु
महाभारत धर्म-अधर्म, पराक्रम से लेकर कई श्रापों, छल-कपट की कहानी है. आज हम एक ऐसे श्राप की बात करते हैं जो द्रौपदी ने भीम के पुत्र को दिया था. जिसके कारण उसकी मृत्यु हो गई थी. जानिए महाभारत की रोचक कथा.
महाभारत में द्रौपदी सबसे अहम किरदार में से एक है, जिसे अर्जुन ने स्वयंवर में जीता और फिर कुंती के आदेश पर उससे सभी 5 पांडवों की शादी हुई. लेकिन पांडवों - युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव के अलग-अलग विवाह भी हुए और संतानें भी हुईं. इन संतानों ने महाभारत युद्ध में हिस्सा भी लिया. जिसमें अधिकांश वीरगति को प्राप्त हुए. लेकिन भीम का एक पुत्र ऐसा था, जो बेहद पराक्रमी होने के बाद ही बहुत जल्दी मारा गया. जबकि वह अकेला इतना ताकतवर था कि सारे कौरवों का अकेले सर्वनाश कर सकता है. लेकिन द्रौपदी के श्राप के कारण वह जल्दी ही मारा गया.
कर्ण ने किया था घटोत्कच का वध
भीम का पुत्र घटोत्कच विशालकाय शरीर वाला था और युद्ध में उसकी एंट्री कौरवों की सेना में कोहराम मचा देती है. इसलिए दुर्योधन के कहने पर कर्ण ने अपने अमोघास्त्र का प्रयोग भीम पुत्र घटोत्कच पर किया था जबकि वह इसका प्रयोग अर्जुन पर करना चाहता था.
कर्ण को यह शस्त्र ऐसे वरदान के साथ मिला था कि इसका वार कभी खाली नहीं जाएगा लेकिन इसका प्रयोग वह एक बार ही कर सकता था. यदि कर्ण घटोत्कच को नहीं मारता तो घटोत्कच अकेला ही कौरव सेना का नाश कर देता. जबकि घटोत्कच इतना वीर था कि वह किसी भी प्रकार की शक्ति से नहीं मरता लेकिन द्रौपदी के श्राप के कारण उसकी मौत हो गई.
द्रौपदी ने दिया था भीम पुत्र घटोत्कच को श्राप
द्रौपदी ने भीम के पुत्र घटोत्कच को श्राप दिया था कि उसकी आयु बहुत कम होगी. महाभारत कथा के अनुसार भीम और हिडिम्बा का पुत्र घटोत्कच जब पहली बार अपने पिता भीम के राज्य में आया तो उसने अपनी मां (हिडिम्बा) की आज्ञा के अनुसार द्रौपदी को कोई खास सम्मान नहीं दिया.
इससे द्रौपदी को अपमान महसूस हुआ और उसे बहुत गुस्सा आया. उसने नाराज होकर उसे अपमान दिया कि दुष्ट तेरा जीवन बहुत छोटा होगा तथा तू बिना किसी लड़ाई के ही मारा जाएगा. आखिर में ऐसा ही हुआ. कर्ण के अमोघअस्त्र के कारण घटोत्कच बिना लड़ाई के ही मारा गया.
उसी घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बना लेकिन श्रीकृष्ण ने उससे दान में उसका शीश मांग लिया. बाद में श्रीकृष्ण ने उसे वरदान दिया कि कलयुग में तुम मेरे नाम से पूजे जाओगे. वर्तमान में वे खाटू श्याम के नाम से प्रसिद्ध हैं.
(Disclaimer: यह सामग्री धार्मिक ग्रंथों, व्रत कथाओं, पौराणिक प्रसंगों एवं प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है. विभिन्न ग्रंथों, क्षेत्रों, परंपराओं और विद्वानों के मतानुसार कथाओं एवं उनके विवरण में अंतर संभव है. इसका उद्देश्य धार्मिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक जानकारी प्रदान करना है.)