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अगर आप जम्मू-कश्मीर को सिर्फ वैष्णो देवी के दर्शन के लिए जानते हैं तो आज हम आपको एक और सबसे रहस्यमयी मंदिर के बारे में बताएंगे.
ये मंदिर किश्तवाड़ जिले में ऊंचे पहाड़ों और घने जंगलों के बीच मचैल गांव में बसा हुआ है. इसी गांव में एक मंदिर है जहां मां चंडी की पूजा होती है.
इस मंदिर की महिमा पूरे देश में फैली हुई है. वहां के लोगों का मानना है कि वहां माता रानी अपने आभूषणों को खुद हिलाकर भक्तों को अपनी मौजूदगी का अहसास कराती हैं.
कंगन में बंधे घुंघरू हों या कानों के कुंडल, इनके हिलने को श्रद्धालु देवी मां का सीधा आशीर्वाद मानते हैं.
इतना ही नहीं नवरात्रि और सालाना छड़ी यात्रा के समय यहां भक्ति का एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है. आज हम इस मंदिर के बारे में डिटेल से जानेंगे.
वहां के भक्तों का दावा है कि देवी के गहनों को उन्होंने अपने आप हिलते हुए देखा है. लोग इसे माता का चमत्कार मानते हैं.
सुरत से आए एक भक्त की कहानी वहां बहुत फेमस है. कहते हैं कि उसने अपनी आंखें बचपन से खो दी थी.
जब वो भक्त दर्शन करने पहुंचा तो उसके आंखों की रोशनी वापस आ चुकी थी. ऐसे ही कई लोगों के बारे में कहानियां सुनने को मिलती हैं.
मंदिर के बाहर लकड़ी पट्टियां हैं जिसपर देवी-देवताओं की सुंदर नक्काशी की गई है. गर्भगृह के भीतर मां चंडी एक पवित्र पिंडी के रूप में हैं.
उसी पिंडी के पास दो और मूर्तियां रखी हैं. जिसमें एक मूर्ति चांदी की है. मूर्ति को लेकर मान्यता है कि उसे जंस्कार क्षेत्र से आए बौद्ध श्रद्धालुओं ने भेंट किया था.
इसी वजह से इस मूर्ती को भोट मूर्ति कहा जाता है. इन मूर्तियों को मंहगे आभूषणों से सजाया गया है.
मचैल माता धाम का इतिहास वीरता और गहरी आस्था से भरा हुआ है. कहा जाता है कि साल 1834 में प्रसिद्ध डोगरा सेनापति जनरल जोरावर सिंह ने लद्दाख फतह करने से पहले यहां आकर मां चंडी का आशीर्वाद लिया था.
इसके बाद साल 1981 में ठाकुर कुलवीर सिंह ने मां के दर्शन किए और 1987 से आधिकारिक रूप से छड़ी यात्रा की शुरुआत की.
आज यह छड़ी यात्रा बहुत बड़े पैमाने पर आयोजित की जाती है, जिसमें देशभर से श्रद्धालु शामिल होकर पुण्य कमाते हैं.
पहले के समय में गुलाबगढ़ से मचैल गांव तक लगभग 30 से 32 किलोमीटर का कठिन पहाड़ी रास्ता पैदल तय करना पड़ता था.
घने जंगलों और सीधे पहाड़ों के बीच यह यात्रा काफी जोखिम भरी होती थी. लेकिन अब सड़कों का बने होने से श्रद्धालुओं का सफर काफी आसान हो गया है.
इसके अलावा मौसम ठीक रहने पर श्रद्धालु हेलीकॉप्टर सेवा का लाभ भी ले सकते हैं. यात्रा पर निकलने से पहले स्थानीय प्रशासन से रास्ते और मौसम की सही जानकारी लेना जरूरी है.
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(Disclaimer): यह लेख स्थानीय धार्मिक मान्यताओं, ऐतिहासिक प्रसंगों और जम्मू-कश्मीर पर्यटन विभाग की सार्वजनिक जानकारी पर आधारित है.