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काशी को दुनिया का सबसे पुराना शहर माना जाता है. कहा जाता है यहां के राजा दिवोदास से एक बार अपने राज्य में देवताओं के आने पर बैन लगा दिया था.
फिर भी देवता किसी न किसी तरह यहां आते रहते थे. आखिर क्यों राजा ने यह सख्त फैसला लिया, और बाद में क्या हुआ. आइए इस कथा के बारे में डिटेल से जानते हैं.
पौराणिक कथाओं के मुताबिक राजा दिवोदास ने जब ब्रह्मा जी के कहने पर काशी की बागडोर संभाली, तो उन्होंने एक अनोखी शर्त रखी कि इस पवित्र नगरी में केवल मनुष्यों का सुशासन चलेगा और देवताओं का सीधा हस्तक्षेप पूरी तरह बंद रहेगा.
राजा दिवोदास का विश्वास था कि दिव्य शक्तियों की मौजूदगी से आम इंसानों के जीवन में असंतुलन और बेवजह की परेशानियां खड़ी होती हैं.
अपनी प्रजा को एक निष्पक्ष, शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित व्यवस्था देने के इरादे से ही उन्होंने ये सख्त कदम उठाया, जिसके सम्मान में खुद भगवान शिव को भी कुछ समय के लिए काशी छोड़कर मंदार पर्वत पर जाना पड़ा था.
कुछ समय बाद देवताओं ने राजा दिवोदास को मनाने की कोशिश की. आखिरकार राजा मान गए और उन्होंने देवताओं पर लगा प्रतिबंध हटा दिया.
देवताओं ने इस पल को अपनी जीत के तौर पर देखा. इसी वजह से उन्होंने इसे विजय दिवस के तौर पर मनाना शुरू किया. काशी आने का मकसद सिर्फ जीत का जश्न मनाना ही नहीं था, बल्कि भगवान शिव की महाआरती करना भी था.
देव दीपावली को लेकर एक और मान्यता भी सुनने को मिलती है. कहा जाता है कि त्रिपुर नाम के राक्षस पर जीत हासिल करने के बाद देवताओं ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन अपने सेनापति कार्तिकेय के साथ मिलकर भगवान शंकर की महाआरती की थी.
इस खुशी में पूरे नगर को दीयों से सजाया गया और विजय दिवस के तौर पर उत्सव मनाया गया. पुराने समय में यह परंपरा सिर्फ पंचगंगा घाट तक ही सीमित थी.
देव दीपावली का जो भव्य स्वरूप आज हम देखते हैं, वो साल 1889 में शुरू हुआ था. उस वक्त से चली यह परंपरा धीरे-धीरे बढ़ते-बढ़ते आज एक बड़े महोत्सव में बदल चुकी है.
हर साल लाखों लोग इस मौके पर काशी के घाटों पर पहुंचते हैं और दीयों की रोशनी में गंगा किनारे का नजारा देखने आते हैं.
काशी के ललिता घाट पर अन्नपूर्णा मंदिर के महंत रामेश्वरपुरी ने 101 बटुकों के साथ दीप जलाकर गंगा पूजन किया. इसके बाद गंगा आरती का भी आयोजन हुआ.
पूरे घाट को सजाया गया और दीयों से जगमग किया गया. सिर्फ काशी ही नहीं, आसपास के इलाकों में भी इसका उत्साह देखने को मिलता है.
काशी के उप नगर रामनगर में भी देव दीपावली की धूम देखने को मिली. यहां के बलुआ घाट पर मां गंगा की आरती की गई और हजारों दीयों से घाट को रोशन किया गया.
गंगा दैनिक आरती समिति और विश्व हिंदू महासंघ ने मिलकर यह आयोजन किया. सामने घाट से देखने पर ऐसा लग रहा था मानो गंगा किनारे आसमान के तारे उतर आए हों.
रामबाग पोखरे पर भी दुर्गा पूजा समिति सुल्तानपुर द्वारा दीप जलाए गए. नगर के हर मंदिर, कुंड और तालाब पर भी इस मौके पर दीयों की रोशनी बिखरी नजर आई.
(Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी पौराणिक कथाओं, धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों (जैसे महाभारत और विष्णु पुराण) पर आधारित है. यह सामग्री केवल पाठकों की रुचि, सामान्य ज्ञान और सांस्कृतिक जानकारी के लिए प्रस्तुत की गई है. इस लेख का उद्देश्य किसी भी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है.