Jitiya 2026: पक्षीराज गरुड़ गंधर्व राजा जीमूतवाहन को उड़ा ले गए... ये है जितिया की कथा, जानें व्रत-पूजा का शुभ मुहूर्त
Jitiya Vrat In Hindi: पक्षीराज गरुड़ के नागभक्षण को रोकने के लिए गंधर्व राजा जीमूतवाहन ने अपने ही प्राणों का बलिदान देने की ठान ली. जितिया व्रत की कथा क्या है और पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है? आइए जानें.
Jitiya Vrat Katha: आज यानी 3 अक्टूबर 2026 को जितिया व्रत रखा जा रहा है. इसका एक नाम जीवित्पुत्रिका व्रत भी है. इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु के लिए 24 घंटे का निर्जला व्रत रखकर गंधर्व राजा जीमूतवाहन की पूजा करती हैं. मुख्य रूप बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में इस व्रत को रखा जाता है. पंचांग के अनुसार हर साल आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि पर जितिया व्रत रखने का विधान है. जितिया व्रत रखकर महिलाएं पूजा में जीमूतवाहन देवता की कथा सुनती सुनाती हैं. आइए जितिया व्रत कथा को जानें.
जितिया व्रत का मुहूर्त
निर्जला जितिया व्रत आज यानी 3 अक्टूबर को शनिवार के दिन रखा जाएगा और भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाएगी.
ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 04:38 बजे से लेकर सुबह 05:26 एम
प्रातः सन्ध्या – सुबह 05:02 बजे से लेकर सुबह 06:15 एम
अभिजित मुहूर्त – सुबह 11:46 बजे से लेकर दोपहर 12:34 पीएम
गोधूलि मुहूर्त – शाम 06:05 बजे से लेकर शाम 06:29 पी एम
सायाह्न सन्ध्या – शाम 06:05 बजे से लेकर शाम 07:18 पी एम
व्रत पारण का समय: 4 अक्टूबर 2026, रविवार के दिन सुबह के 7:28 बजे के बाद.
जितिया व्रत की कथा
जीवित्पुत्रिका व्रत कथा है कि गंधर्वों के राजकुमार जीमूतवाहन ने अपने पिता के वृद्धावस्था में वानप्रस्थ आश्रम जाने के बाद राज सिंहासन सौंप संभाला. लेकिन उदार और परोपकारी राजा जीमूतवाहन को राजपाट में मन नहीं लगा तो वे अपने राज्य की जिम्मेदारी अपने भाइयों को सौंपकर वन की ओर पिता की सेवा के लिए निकल पड़े. वहीं पर उनका मलयवती नाम की एक राजकन्या से विवाह हुआ.
एक बार की बात है जीमूतवाहन वन में भ्रमण करते हुए बहुत आगे निकल गए. जहां उन्हें एक वृद्धा विलाप करते हुए दिखी. जिससे उन्होंने उससे पूछा कि क्यों विलाप करती हैं. इस पर वृद्धा ने बताया कि 'मैं नाग वंश की स्त्री हूं. मेरा एक पुत्र है . पक्षीराज गरुड़ को हर दिन एक नाग भक्षण के लिए देने की नागों ने प्रतिज्ञा की हुई है और आज मेरे पुत्र शंखचूड़ की बलि देने का दिन है.' वृद्धा को जीमूतवाहन ने आश्वन दिया कि 'भयभीत न हो, मैं तुम्हारे पुत्र के प्राण बचाउंगी.'उसके स्थान पर आज में अपने आपको लाल कपड़े में ढककर वध्य-शिला पर लेटूंगा. इसके बाद उन्होंने गरुड़ को अपनी बलि देने के लिए शंखचूड़ के हाथ से लाल कपड़ा लिया और स्वयं को ढककर शिला पर लेट गए.
कुछ समय बाद तय समय पर पक्षीराज गरुड़ आए और लाल कपड़े में ढके जीमूतवाहन को अपने पंजे में दबोचकर उड़ा ले गए और एक पहाड़ के शिखर पर जाकर बैठ गए. जब गरुड़जी ने अपने चंगुल में फंसे हुए प्राणी की आंखों में आंसू देखा और मुंह से आह निकलते सुना तो आश्चर्य में पड़ गए. फिर लाल कपड़ा हटाया तो नाग की जगह जीमूतवाहन को देख उनसे उनका परिचय पूछा. इस पर जीमूतवाहन ने विस्तार वो सब बताया जो अब तक हो चुका था. जीमूतवाहन के त्याग, वीरता और दूसरे की प्राण-रक्षा की भावना देख गरुड़देव बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें जीवनदान दे दिया. इसके साथ ही वरदान दिया कि वे नागों की बलि नही लेंगे. तब से संतान की सुरक्षा के लिए माताएं जीमूतवाहन की पूजा और उनके निमित्त व्रत का संकल्प करने लगीं.
(डिस्क्लेमर- यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)