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भक्त के नाम पर है ये मंदिर: राजा दूरबीन से करते थे जिसके दर्शन, जानिए 140 साल पुराने मंदिर का रहस्य

इस खबर में हम ग्वालियर के कैंसर पहाड़ी पर स्थित मांढरे की माता मंदिर के इतिहास के बारे में जानेंगे. साथ ही ये भी जानेंगे आखिर क्यों ये मंदिर किसी भगवान के बजाय अपने भक्त के नाम से प्रसिद्ध है और सिंधिया राजघराने से इसका क्या संबंध है.

भक्त के नाम पर है ये मंदिर: राजा दूरबीन से करते थे जिसके दर्शन, जानिए 140 साल पुराने मंदिर का रहस्य

आपने भारत देश में तरह-तरह के मंदिर देखे होंगे. जिसका नाम किसी देवी-देवता के नाम पर पड़ा होता है. लेकिन अगर आपको पता चले के एक ऐसा भी मंदिर है जिसका नाम किसी देवता के नाम पर न पड़कर किसी इंसान के नाम पर है.

जी हां, ऐसा ही एक मंदिर भारत के दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में स्थित है. इस मंदिर का नाम भगवान के नाम पर नहीं बल्कि भक्त के नाम पर है.

ये मंदिर कैंसर पहाड़ी पर स्थित है. मंदिर का नाम मांढरे की माता का मंदिर है. अब आपके मन में सवाल होगा कि ये मंदिर आखिर फेमस क्यों है.

तो ये कोई नॉर्मल मंदिर नहीं है. यहां की अनूठी परंपराएं और इतिहास के कारण ये पूरे देश में अलग पहचान रखता है.

कहा जाता है कि यहां जो भी दर्शन करने आता है उसकी सारी मुराद पूरी हो जाती है. जिसके वजह से यहां लोग दूर-दूर से दर्शन करने आते हैं.

140 साल पुराना इतिहास

यहां मां अष्टभुजा महिषासुर मर्दनी की पूजा होती है. गर्भ गृह में माता की बहुत ही भव्य मूर्ती स्थापित किया गया है.

वहां के लोगों का कहना है कि ये मंदिर लगभग 140 साल पुराना है. एक और बहुत ही रोचक बात ये है कि इसे सिंधिया राजघराने की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है.

वहां मौजूद मूर्ति की भी अपनी खासियत है. मूर्ति को महाराष्ट्र के सतारा से ग्वालियर लाने वाले शख्स सिंधिया सेना के कर्नल आनंद राव मांढरे थे.

इसी वजह से मंदिर का नाम मांढरे की माता पड़ गया था.

किसने करवाई थी स्थापना?

मुर्ति लाने वाली कहानी में सिंधिया राजपरिवार का बड़ा हाथ है. दरअसल आनंद राव मांढरे माता के बहुत बड़े भक्त थे.

कहा जाता है कि उनके सपने में माता आई थी जिसके बाद उन्होंने मंदिर की स्थापना करने का आदेश दिया था.

अब कर्नल आनंद राव अपना काम छोड़कर जा तो सकते नहीं थे. तो उन्होंने ये बात महाराज जयाजी राव सिंधिया को बताई.

महाराज इस बात को सुनकर खुश हुए और आनंद राव का मान रखते हुए एक भव्य मंदिर की स्थापना करवाई.

आनंद राव की भक्ति को देखते हुए महाराज ने आनंद राव को सेना के बड़े दायित्व से मुक्त कर दिया, और माता के सेवा करने की जिम्मेदारी दे दी.

दूरबीन से जयविलास पैलेस से होते थे मां के सीधे दर्शन

राजा जयाजी राव सिंधिया भी माता के बहुत बड़े भक्त थे. राजा साहब अपने शाही जयविलास पैलेस से ही दूरबीन के जरिए माता के दर्शन किया करते थे.

दरअसल महल और मंदिर का मेन दरवाजा बिल्कुल आमने-सामने है. जिसके कारण राजा आसानी से दर्शन कर लेते थे. आज भी राजपरिवार की इस परंपरा मन से निभाता है.

ऐसे लगाएं अर्जी...

मंदिर अपने चमत्तकारों के लिए भी जानी जाती है. कहा जाता है जो भी भक्त दर्शन करने आते हैं, वो अपनी एक अर्जी लगाते हैं जिसका पूरा होना तय होता है.

अर्जी करने के लिए श्रद्धालु नारियल, चुनरी, फूल, हल्दी और रोरी को एक साथ बांधकर मंदिर परिसर में सुरक्षित बांध देते हैं.

अगर आपकी मनोकामना पूरी हो गई है तो आपको वापस मंदिर दर्शन करने आना होगा. मंदिर आकर अपनी उस गांठ को खोलना पड़ता है

पांचवीं पीढ़ी संभाल रही है सेवा

समय बीत चुका है लेकिन आज भी मांढरे परिवार माता की सेवा करती आई है. फिलहाल मांढरे परिवार की पांचवीं पीढ़ी इस मंदिर का देखभाल कर रही है.

(Disclaimer): इस लेख में दी गई समस्त जानकारी ऐतिहासिक किंवदंतियों, स्थानीय मान्यताओं और पारंपरिक विवरणों पर आधारित है.
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Harsh Singh

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हर्ष सिंह जी न्यूज डिजिटल में एक अनुभवी और धारदार शैली के पत्रकार हैं. उन्होंने मार्च 2024 में जी न्यूज जॉइन किया था. वर्तमान में हर्ष धर्म और ज्योतिष से जुड़ी खबरों की खास कवरेज कर रहे हैं. वे देश-दुनिया के धार्मिक आयोजनों, अध्यात्म और ज्योतिषीय गणनाओं से जुड़े जरूरी अपडेट्स दर्शकों तक पूरी सटीकता के साथ पहुंचाते हैं. हर्ष को उनकी फैक्ट-आधारित और भरोसेमंद लेखन शैली के लिए जाना जाता है.बनारस के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट-ग्रेजुएशन करने वाले हर्ष अपनी पूरी ऊर्जा और समझ के साथ धर्म-कर्म और ऐस्ट्रो की दुनिया के खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं.अगर आप हर्ष सिंह से संपर्क करना चाहते हैं या उनसे जुड़ा कोई सुझाव साझा करना चाहते हैं, तो उन्हें इस ईमेल आईडी पर लिख सकते हैं: Harsh.singh@India.com
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