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गोरखा जनरल ने रखी थी नीव, जयपुर के राजा ने संवारा; जानिए गंगोत्री धाम की उत्पत्ति और निर्माण का सच

उत्तराखंड के उत्तरकाशी में स्थित प्रसिद्ध गंगोत्री मंदिर का निर्माण 1807 में नेपाल के गोरखा जनरल अमर सिंह थापा ने कराया था. माना जाता है कि इसी स्थान पर राजा भगीरथ की कठोर तपस्या के बाद मां गंगा धरती पर अवतरित हुई थीं.

गोरखा जनरल ने रखी थी नीव, जयपुर के राजा ने संवारा; जानिए गंगोत्री धाम की उत्पत्ति और निर्माण का सच

हिंदू धर्म में गंगा नदी को सबसे पवित्र माना गया है. मां गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि जीवन और मोक्ष देने वाली देवी के रूप में पूजी जाती हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा भगवान विष्णु के चरणों से निकली हैं और आकाशगंगा के रूप में धरती पर आई हैं.

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित गंगोत्री धाम समुद्र तल से लगभग 3,140 मीटर की ऊंचाई पर भागीरथी नदी के दाहिने तट पर बसा है. देवदार और चीड़ के घने जंगलों के बीच बसा ये खूबसूरत गांव हर साल लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनता है.

गोरखा जनरल अमर सिंह थापा ने करवाया था मंदिर का निर्माण

गंगोत्री में पावन भागीरथी के तट पर सदियों से पूजा-अर्चना होती आ रही है. लेकिन यहां वर्तमान सफेद संगमरमर के भव्य मंदिर का निर्माण 18वीं सदी की शुरुआत में हुआ था.

इतिहास के अनुसार, नेपाल के प्रसिद्ध गोरखा जनरल अमर सिंह थापा ने 1807 में गंगोत्री मंदिर का निर्माण कराया था. इसके बाद 19वीं सदी के मध्य में जयपुर के राजा माधो सिंह ने इस दिव्य मंदिर का सौंदर्यीकरण कराया.

मंदिर का ढांचा बहुत ही सुंदर और सफेद पत्थरों से बना हुआ है, जो बर्फ से ढकी पहाड़ियों के बीच अद्भुत दिखता है.

राजा भगीरथ की तपस्या और 60,000 पुत्रों के उद्धार की कथा

गंगोत्री धाम की उत्पत्ति के पीछे एक बहुत ही प्रसिद्ध पौराणिक कथा जुड़ी हुई है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्यवंशी राजा सागर के 60,000 पुत्र महर्षि कपिल के श्राप से भस्म हो गए थे.

उनके उद्धार और आत्मा की शांति के लिए उनके वंशज राजा भगीरथ ने वर्षों तक कठोर तपस्या की. भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा स्वर्ग से धरती पर उतरने को तैयार हुईं.

गंगा के तीव्र वेग को संभालने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया. इसके बाद ही मां गंगा धरती पर प्रवाहित हुईं और राजा सागर के पुत्रों का उद्धार हुआ.

भागीरथी शिला: जहां बैठकर भगीरथ ने की थी घोर तपस्या

गंगोत्री मंदिर के ठीक पास भागीरथी नदी के तट पर एक विशाल पवित्र पत्थर मौजूद है. इस विशाल शिला को भागीरथी शिला कहा जाता है. माना जाता है कि इसी पावन शिला पर बैठकर राजा भगीरथ ने भगवान शिव और मां गंगा की घोर तपस्या की थी.

आज भी गंगोत्री आने वाले श्रद्धालु इस पवित्र शिला के दर्शन करते हैं और यहां माथा टेकते हैं. मान्यता है कि इस जगह पर मां गंगा की पूजा करने से इंसान के जन्मों-जन्मों के पाप मिट जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है.

ऋषिकेश से सड़क मार्ग और श्रद्धालुओं के ठहरने की उत्तम व्यवस्था

गंगोत्री धाम तक पहुंचने के लिए बहुत ही बेहतरीन सड़क मार्ग बना हुआ है. ये पावन स्थल ऋषिकेश से लगभग 248 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. ऋषिकेश और उत्तरकाशी से बस, टैक्सी या निजी गाड़ियों द्वारा आसानी से गंगोत्री पहुंचा जा सकता है.

नदी के दूसरे किनारे पर कई धार्मिक आश्रम और धर्मशालाएं बनी हुई हैं. ये आश्रम यहां आने वाले यात्रियों और श्रद्धालुओं के ठहरने तथा भोजन की बहुत अच्छी व्यवस्था करते हैं. चारों तरफ पहाड़ों का शांत माहौल और बहती नदी की कल-कल आवाज यहां आने वालों का मन मोह लेती है.

शीतकालीन प्रवास मुखबा गांव और कपाट खुलने की परंपरा

हर साल सर्दियों के मौसम में गंगोत्री क्षेत्र में भारी बर्फबारी होती है. इस कारण दीपावली (भाई दूज) के पावन दिन मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं. कपाट बंद होने के बाद मां गंगा की भोग मूर्ति को ढोल-नगाड़ों के साथ पास के मुखबा (मुखवा) गांव लाया जाता है.

पूरे शीतकाल में मां गंगा की पूजा-अर्चना इसी गांव में होती है. इसके बाद गर्मियों की शुरुआत में, वैशाख महीने की अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर गंगोत्री मंदिर के कपाट दोबारा श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं.
 

डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह लेख ऐतिहासिक अभिलेखों, गढ़वाल के इतिहास और प्रचलित पौराणिक मान्यताओं पर आधारित एक विवरणात्मक रिपोर्ट है. इसका उद्देश्य पाठकों तक गंगोत्री धाम के निर्माण और इसके धार्मिक महत्व की प्रामाणिक जानकारी पहुंचाना है.

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Harsh Singh

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हर्ष सिंह जी न्यूज डिजिटल में एक अनुभवी और धारदार शैली के पत्रकार हैं. उन्होंने मार्च 2024 में जी न्यूज जॉइन किया था. वर्तमान में हर्ष धर्म और ज्योतिष से जुड़ी खबरों की खास कवरेज कर रहे हैं. वे देश-दुनिया के धार्मिक आयोजनों, अध्यात्म और ज्योतिषीय गणनाओं से जुड़े जरूरी अपडेट्स दर्शकों तक पूरी सटीकता के साथ पहुंचाते हैं. हर्ष को उनकी फैक्ट-आधारित और भरोसेमंद लेखन शैली के लिए जाना जाता है.बनारस के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट-ग्रेजुएशन करने वाले हर्ष अपनी पूरी ऊर्जा और समझ के साथ धर्म-कर्म और ऐस्ट्रो की दुनिया के खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं.अगर आप हर्ष सिंह से संपर्क करना चाहते हैं या उनसे जुड़ा कोई सुझाव साझा करना चाहते हैं, तो उन्हें इस ईमेल आईडी पर लिख सकते हैं: Harsh.singh@India.com
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