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हिंदू धर्म में गंगा नदी को सबसे पवित्र माना गया है. मां गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि जीवन और मोक्ष देने वाली देवी के रूप में पूजी जाती हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा भगवान विष्णु के चरणों से निकली हैं और आकाशगंगा के रूप में धरती पर आई हैं.
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित गंगोत्री धाम समुद्र तल से लगभग 3,140 मीटर की ऊंचाई पर भागीरथी नदी के दाहिने तट पर बसा है. देवदार और चीड़ के घने जंगलों के बीच बसा ये खूबसूरत गांव हर साल लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनता है.
गंगोत्री में पावन भागीरथी के तट पर सदियों से पूजा-अर्चना होती आ रही है. लेकिन यहां वर्तमान सफेद संगमरमर के भव्य मंदिर का निर्माण 18वीं सदी की शुरुआत में हुआ था.
इतिहास के अनुसार, नेपाल के प्रसिद्ध गोरखा जनरल अमर सिंह थापा ने 1807 में गंगोत्री मंदिर का निर्माण कराया था. इसके बाद 19वीं सदी के मध्य में जयपुर के राजा माधो सिंह ने इस दिव्य मंदिर का सौंदर्यीकरण कराया.
मंदिर का ढांचा बहुत ही सुंदर और सफेद पत्थरों से बना हुआ है, जो बर्फ से ढकी पहाड़ियों के बीच अद्भुत दिखता है.
गंगोत्री धाम की उत्पत्ति के पीछे एक बहुत ही प्रसिद्ध पौराणिक कथा जुड़ी हुई है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्यवंशी राजा सागर के 60,000 पुत्र महर्षि कपिल के श्राप से भस्म हो गए थे.
उनके उद्धार और आत्मा की शांति के लिए उनके वंशज राजा भगीरथ ने वर्षों तक कठोर तपस्या की. भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा स्वर्ग से धरती पर उतरने को तैयार हुईं.
गंगा के तीव्र वेग को संभालने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया. इसके बाद ही मां गंगा धरती पर प्रवाहित हुईं और राजा सागर के पुत्रों का उद्धार हुआ.
गंगोत्री मंदिर के ठीक पास भागीरथी नदी के तट पर एक विशाल पवित्र पत्थर मौजूद है. इस विशाल शिला को भागीरथी शिला कहा जाता है. माना जाता है कि इसी पावन शिला पर बैठकर राजा भगीरथ ने भगवान शिव और मां गंगा की घोर तपस्या की थी.
आज भी गंगोत्री आने वाले श्रद्धालु इस पवित्र शिला के दर्शन करते हैं और यहां माथा टेकते हैं. मान्यता है कि इस जगह पर मां गंगा की पूजा करने से इंसान के जन्मों-जन्मों के पाप मिट जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है.
गंगोत्री धाम तक पहुंचने के लिए बहुत ही बेहतरीन सड़क मार्ग बना हुआ है. ये पावन स्थल ऋषिकेश से लगभग 248 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. ऋषिकेश और उत्तरकाशी से बस, टैक्सी या निजी गाड़ियों द्वारा आसानी से गंगोत्री पहुंचा जा सकता है.
नदी के दूसरे किनारे पर कई धार्मिक आश्रम और धर्मशालाएं बनी हुई हैं. ये आश्रम यहां आने वाले यात्रियों और श्रद्धालुओं के ठहरने तथा भोजन की बहुत अच्छी व्यवस्था करते हैं. चारों तरफ पहाड़ों का शांत माहौल और बहती नदी की कल-कल आवाज यहां आने वालों का मन मोह लेती है.
हर साल सर्दियों के मौसम में गंगोत्री क्षेत्र में भारी बर्फबारी होती है. इस कारण दीपावली (भाई दूज) के पावन दिन मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं. कपाट बंद होने के बाद मां गंगा की भोग मूर्ति को ढोल-नगाड़ों के साथ पास के मुखबा (मुखवा) गांव लाया जाता है.
पूरे शीतकाल में मां गंगा की पूजा-अर्चना इसी गांव में होती है. इसके बाद गर्मियों की शुरुआत में, वैशाख महीने की अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर गंगोत्री मंदिर के कपाट दोबारा श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं.
डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह लेख ऐतिहासिक अभिलेखों, गढ़वाल के इतिहास और प्रचलित पौराणिक मान्यताओं पर आधारित एक विवरणात्मक रिपोर्ट है. इसका उद्देश्य पाठकों तक गंगोत्री धाम के निर्माण और इसके धार्मिक महत्व की प्रामाणिक जानकारी पहुंचाना है.