Ganesh Ji Ki Katha: गणेश जी से जुड़ी हैं ये 3 रोचक कथाएं, जिसमें छिपे गहरे संदेश दिखाते हैं जीवन को सही रास्ता!
Ganesh Chaturthi 2026 Katha: इस लेख में हम गणेश जी से जुड़ी 3 कथाओं के बारे में जानेंगे जो अति रोचक तो हैं ही, इसे साथ ही इन कथाओं से बड़ी सीख भी मिलती है. आइए इन कथाओं के बारे में जानें.
Ganesh Chaturthi 2026 Katha Hindi Me: गणेश जी का स्वरूप हो या गणेश जी की रोचक कथाएं, इनमें गहरे संदेश छुपे हैं. जिनको जानकर कोई भी व्यक्ति सही रास्ते पर बिना किसी विघ्न बाधा के चल सकता है. इस साल गणेश चतुर्थी पर्व 14 सितंबर को मनाया जाएगा. इस मौके पर आइए जानें गणेश जी की 3 अति रोचक कथा जो जीवन को नई दिशा दिखाती हैं. जिनको पढ़ने या सुनने के बाद गणेश जी की कृपा भी प्राप्त होती है.
गणेश जी की पहली कथा
पौराणिक कथा है कि एक बार देवताओं पर कई विपदाएं आ गई. इन विपदाओं से पार पाने के लिए भगवान शिव के पास सभी देवता पहुंचे और उनसे सहायता मांगी. शिव जी के साथ भगवान कार्तिकेय और गणेशजी भी बैठे हुए थे. देवताओं की बात सुन शिव जी ने कार्तिकेय जी व गणेश जी को एक क्षण के लिए देखा और फिर पूछा तुम दोनों में से वो कौन है जो इन देवताओं के कष्टों को दूर करेंगा. इस पर दोनों ने स्वयं को इसके लिए सक्षम बताया. इस पर शिव जी और मां पार्वती ने कहा कि कौन योग्य और क्षमतावान है यह जानने के लिए तुम दोनों के बीच एक प्रतियोगिता होगी. जो सफल होगा वह दूसरे से योग्य माना जाएगा. प्रतियोगिता इस तरह से है कि जो भी 3 बार पृथ्वी की परिक्रमा करके सबसे पहले लौटेगा वही योग्य माना जाएगा. भगवान शिव के मुख से अभी वचन निकले ही थे कि मोर पर सवार होकर पृथ्वी के चक्कर लगाने के लिए कार्तिकेय जी निकल पड़े. उनकी सवारी मयूर तेज गति से उड़ान भर रहा था. वहीं दूसरी ओर गणेश जी सोच में पड़ गए कि अपने वाहन मूषक पर सवार होकर पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करने में बहुत समय लगेगा. तभी बुद्धि के देवता गणेश जी ने अपनी तीव्र बुद्धि का उपयोग किया. गणेश जी ने सबसे पहले अपने माता-पिता की पूजा अर्चना की और फिर उनकी 3 बार परिक्रमा कर उनके सामने ही बैठ गए. इस पर शिव जी ने पूछा कि गणेश क्या तुम परिक्रमा के लिए नहीं जाओंगे. इस पर गणेश जी ने कहा कि 'माता-पिता के चरणों में ही समस्त सृष्टि समाहित है. आप दोनों की परिक्रमा ही मेरे लिए पृथ्वी की परिक्रमा है.'यह सुनकर भगवान शिव अति प्रसन्न हुए. वहीं, वहीं पृथ्वी की 3 बार परिक्रमा करके कार्तिकेय भी लौट आए. उन्हें लगा विजेता वहीं हैं. लेकिन इसके उलट गणेश जी की बुद्ध और माता पिता के प्रति श्रद्धा व आस्था देखकर शिव दी ने उन्हें ही विजेता घोषित कर दिया.
क्या मिलती है सीख: इस कथा से सीख मिलती है कि माता-पिता में ही पूरी पृथ्वी समाई है. उनकी सेवा करना ही पूरी दुनिया घूमने के बराबर है. इस कथा से सीख मिलती है कि बुद्धि बल से बड़ी होती है.
गणेश जी की दूसरी कथा
पौराणिक कथा है कि रात्रि के समय गणेश जी कैलाश की ओर जा रहे थे. तभी मूषक के सामने से एक सर्प गुजरा जिसे देख मूषक डर से उछल पड़ा. इससे अपने बड़े पेट के कारण गणेश जी ने अपना संतुलन खो दिया और भूमि पर गिर पड़े. उठकर खड़े हुए और इधर-उधर देखकर जांचने लगे कि किसी ने उन्हें गिरते हुए तो नहीं देखा. इस बात को लेकर जैसे ही वे आश्वस्त हुए कि किसी ने देखा नहीं, वैसे ही आकाश से चंद्र देव उन पर जोर-जोर से हंसने लगे. इस पर गणेश जी को शर्म आ गई. लेकिन चंद्र देव की हंसी बंद नहीं जिससे गणेश जी क्रोधित हो उठे. उन्होंने चंद्रदेव को से कहा कि “ हे अभिमानी चन्द्रमा! तुम मेरे बड़े पेट पर और मेरे गिरने पर हंस रहे हो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता. यह देवता नहीं बल्कि दैत्यों जैसा कृत्य है. मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि जिस सुंदरता पर तुम्हें घमंड है उसे तुम खो दोगे और तुम्हारी चमक समाप्त हो जाएगी. तुम अपनी चांदनी खो दोगे. वहीं, चंद्र देव को अपनी भूल का आभास हुआ तो वे गणेश जी से क्षमा मांगते हुए उनके चरणों में गिर गए. उन्होंने कहा कि हे “हे दुःखहर्ता! मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई है, मुझे क्षमा करें. अगर मेरी चांदनी ही नहीं रहेगी तो मेरा अस्तित्व ही नहीं रहेगा. चंद्रमा की क्षमा-याचना पर गणेश जी का क्रोध शांत हुआ. उन्होंने कहा, “श्राप तो वापस नहीं ले सकता लेकिन हर माह में एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब तुम अपनी चांदनी पूरी तरह से खो दोगे. वहीं पूरे महीने तुम्हारा तेज कम-अधिक होता रहेगा.
क्या मिलती है सीख: किसी का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए, न तो सुंदरता पर घमंड करना चाहिए.
गणेश जी की तीसरी कथा
एक दिन की बात है, माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं लेकिन उससे पहले उन्होंने बालक गणेश को द्वार पर पहरा देने के लिए खड़ा रहने को कहा. माता का आदेश था कि बिना उनकी अनुमति के किसी को भी भीतर न आने दें. गणेश जी वहीं द्वार पर खड़े हो गए. थोड़ी देर बाद भगवान शिव वहां पधारे और भीतर जाने की कोशिश की लेकिन गणेश जी ने उन्हें रोक दिया. बार-बार ऐसा ही होता रहा जिससे शिव जी बहुत अधिक क्रोधित हो गए और अपने त्रिशूल से गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया. वहीं जब माता पार्वती स्नान के बाद बाहर आईं तो गणेश जी की ऐसी अवस्था देखकर क्रोधित की अग्नि में जलने लगीं. उन्होंने शिव जी से कहा कि वे गणेश जी को पूनर्जिवित करें. इस पर भगवान शिव ने अपने गणों को आदेश दिया कि वे उत्तर दिशा में जाएं और जो भी पहला जीव दिखे उसका सिर लेकर आए जाएं. इस तरह गणों को एक हथिनी का बच्चा सबसे पहले दिखा. जिसके सिर गणेश जी के धड़ से शिव जी न जोड़ दिया. तब से गणेश जी गजानन कहलाने लगे.
क्या मिलती है सीख: बिना सोचे-समझे क्रोध में कोई भी निर्णय नहीं लेना चाहिए. यह कथा सिखाती है कि माता की आज्ञा सबसे बड़ी है. साथ ही इस कथा से सीखा जा सकता है कि हाथी का सिर लगने के बाद भी भगवान गणेश इसलिए पूजनीय हैं क्यों उनमें अनेक गुण है. शरीर की बनावट से बड़ा व्यक्ति के गुण हैं.
(डिस्क्लेमर- त्योहार - यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)