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क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि भगवान या देवी-देवताओं की अलग-अलग प्रतिमाओं में उनके हाथों की मुद्रा या उनके खड़े होने या बैठने की मुद्रा क्यों अलग-अलग होती है? देवी-देवताओं की अलग-अलग मूर्तियों में किसी का हाथ हमें न डरने की सीख देता है तो किसी का हाथ वरदान देने मुद्रा में होता है. कोई देवता ज्ञान मुद्रा में होते हैं तो कोई वीर मुद्रा में हमें कोई न कोई संदेश दे रहे होते हैं.
देवी-देवताओं की ये अलग-अलग मुद्राएं केवल चित्रकला, मूर्तिकला या देवी-देवताओं के सुंदर रूप को ही नहीं दर्शाते हैं, बल्कि इन मुद्राओं से गुप्त विज्ञान और आध्यात्म का गहरा नाता है. मानव शरीर की ऊर्जा, मानसिक शांति और ब्रह्मांड की शक्तियों से देवी-देवताओं की मुद्राओं का जुड़ाव है, ऐसी मान्यता पुराने समय से ही है. कुछ मुद्राएं तो ऐसी भी हैं जो हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म में एक जैसी दिखती हैं. आखिर इन मुद्राओं के पीछे का रहस्य क्या है, किन मुद्राओं का किन देवी-देवताओं से संबंध है और ये सभी मुद्राएं हमें क्या बताती हैं? आइए इस बारे में विस्तार से जानें.

त्रिभंग मुद्रा और श्रीकृष्ण की लीला
भगवान कृष्ण की त्रिभंग मुद्रा बहुत प्रसिद्ध है. चित्र हो या श्रीकृष्ण मंदिर, ज्यादातर इसी मुद्रा में श्रीकृष्ण दिखते हैं. इस मुद्रा में श्रीकृष्ण का शरीर तीन जगहों से मुड़ता है. इसी मुद्रा में आकर वे बांसुरी बजाते हैं और अपने प्रिय भक्तों के साथ खेलने के लिए उन्हें बुलाते हैं. विशेषकर श्रीकृष्ण इस मुद्रा में आकर वृंदावन की गोपियों को रास के लिए आमंत्रित करते हैं और अपनी लीला करते हैं.
आध्यात्मिक महत्व
कला और दर्शन में श्रीकृष्ण के इस त्रिभंग मुद्रा को पूर्णता व आनंद का प्रतीक माना गया है. ऐसा धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यता है कि पूर्णावतार भगवान कृष्ण संपूर्ण आनंद के प्रतीक हैं. इस मुद्रा में आकर श्रीकृष्ण संदेश देते हैं कि संसार की कठोरता में भी वे लचीलेपन और सहजभाव से आनंद से भरे रहते हैं. इस मुद्रा में जब भगवान बांसुरी की धुन का बजाते हैं तो यह पूरी क्रिया उनके भीतर के संगीत और ब्रह्मांडीय संतुलन का प्रतीक बन जाती है.
त्रिभंग मुद्रा और विज्ञान
त्रिभंग मुद्रा केवल कलात्मक शैली नहीं है बल्कि इसका शारीरिक संतुलन व ऊर्जा से गहरा संबंध है. इस मुद्रा में श्रीकृष्ण का युवा शरीर तीन जगह से मुड़ता है, गर्दन, कमर और टखनों से जिससे शारीरिक आकर्षण और बढ़ जाता है. यह त्रिभंग मुद्रा श्रीकृष्ण की युवावस्था और और उनकी चंचलता को दर्शाता है. भले ही यह मुद्रा स्थिर जान पड़ती है लेकिन इस मुद्रा से वैज्ञानिक और दार्शनिक संदेश मिलता है कि प्रकृति और जीवन में स्थिरता तो जरूरी है लेकिन लचीलापन और निरंतरता भी जरूरी है.

'अभय मुद्रा', निर्भय रहने के साथ ही सुरक्षा का प्रतीक है जिसका हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म से गहरा संबंध है. पुराने समय से ही इन धर्मों की कई प्रतिमाएं ऐसी मुद्राओं में देखी जाती रही हैं. इस मुद्रा में सामान्यतः दाहिना हाथ कंधे की ऊंचाई तक उठा होता है और हथेली बाहर की ओर होती है और उंगलियां सीधी रखी जाती हैं.
अभय मुद्रा का किन देवताओं से संबंध है?
भगवान नटराज समेत कई हिंदू देवी-देवता को अभय मुद्रा में देखा जाता है. वहीं, गुप्त काल की भगवान बुद्ध की कई मूर्तियां इस मुद्रा में दिखती हैं. यह मुद्रा सुरक्षा, शांति स्थापित करने व निडर रहने का संदेश देता है. अभय यानी निर्भयता, यह मुद्रा बताती है कि 'मैं आपकी रक्षा करूंगा'.
शिव जी के नटराज रूप की मूर्ति भी अभय मुद्रा में
तमिलनाडु की 11वीं शताब्दी की नटराज की मूर्ति भी अभय मुद्रा में है जिसका चोल काल से संबंध है. शिव की नटराज छवि उनके ब्रह्मांड के निर्माता, संरक्षक व संहारक रूप को दर्शाती है. दरअसल, नटराज के दाहिने हाथ में एक डमरू है जिससे निकलने वाली ध्वनि सृष्टि की पहली ध्वनि का प्रतीक है,ऊपरी बाएं हाथ में अग्नि ब्रह्मांड को नष्ट करेगी और अभय मुद्रा में निचला दाहिना हाथ भय को दूर करने की ओर इशारा करता है.

वरद मुद्रा करुणा, दान और वरदान देने का प्रतीक है. वरद यानी आशीर्वाद देने वाला, यह मुद्रा देवी-देवता की उदारता का प्रतीक है. यह मुद्रा बिना किसी जुड़ाव और निःस्वार्थ भाव से दान देने का भी प्रतीक है. यह मुद्रा दूसरों का कल्याण करने व करुणा भाव रखने का संदेश देता है. वरद मुद्रा में हाथ को नीचे की ओर फैलाया जाता है, हथेली खुली होती है जिसे आगे की ओर किया जाता है. उंगलियां ढीली होती हैं. वरद मुद्रा को अक्सर अभय मुद्रा के साथ दिखाया जाता है. भगवान बुद्ध, गणेश जी, देवी लक्ष्मी, शिव जी से लेकर देवी पार्वती और भगवान विष्णु को इस मुद्रा में देखा जा सकता है.
वरदा मुद्रा और ऊर्जा
ऊर्जा के दृष्टिकोण से देखे तो वरदा मुद्रा हृदय के साथ ही मूल चक्रों को सक्रिय कर देती है जो मन में करुणा, उदारता और स्थिरता लाती है. इस मुद्रा का अभ्यास बाएं हाथ से करते हैं. इस मुद्रा का अभ्यास बैठकर या खड़े होकर कर सकते हैं लेकिन ध्यान रखना होगा कि रीढ़ सीधी रहे और ऊर्जा स्थिर हो.

ज्ञान मुद्रा में हाथ की तर्जनी उंगली और अंगूठा का इस्तेमाल किया जाता है. आध्यात्मिक और ज्योतिषीय मान्यताएं है कि ज्ञान मुद्रा में प्रथम उंगली यानी तर्जनी को अंगूठे से जोड़ा जाता है. ज्ञान मुद्रा अपने भीतर की ऊर्जा को निर्देशित करने व मन को एकाग्र करने का प्रतीक माना गया है.
ज्ञान मुद्रा का किन देवी-देवताओं से है संबंध
प्रमुख देवी-देवता को ज्ञान मुद्रा में देखा जा सकता है . जैसे भगवान शिव के ज्ञान और शिक्षा देने वाले दक्षिणमूर्ति रूप को अक्सर ज्ञान मुद्रा में दिखाया जाता है. भगवान बुद्ध के ध्यानमग्न मूर्तियों को इस मुद्रा में दिखाया जाता है. ज्ञान, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की प्रतिमाएं और चित्रों को ज्ञान मुद्रा में ही दर्शाया जाता है. बुद्धि, विवेक के देवता और विघ्नहर्ता के रूप में गणेश जी भी कई बार अपने चित्रों और मूर्तियों में ज्ञान मुद्रा में देखे जा सकते हैं. जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर भी ध्यान और ज्ञान मुद्रा में दिखाए जाते हैं.

ध्यान मुद्रा का उपयोग मन को एकाग्र करने, आंतरिक शांति और गहरे ध्यान के लिए किया जाता है. यह मुद्रा मोक्ष को दर्शाता है जिसमें दोनों हाथों को गोद में रखा जाता है, दाईं हथेली बाई हथेली के ऊपर होती है. दोनों अंगूठों के सिरे आपस में मिलते हैं जिससे त्रिकोण जैसी आकृति बनती है.
ध्यान मुद्रा का किन देवी-देवताओं से संबंध
ध्यान मुद्रा का भगवान शिव से गहरा संबंध है. हिंदू धर्म में आदि योगी भगवान शिव ध्यान और समाधि की मुद्रा में ही होते हैं. पद्मासन में बैठकर आधे खुले नेत्रों से ध्यान लगाकर शिव जी बैठते हैं. ध्यान मुद्रा का बौद्ध धर्म के भगवान बुद्ध से भी गहरा संबंध है. भगवान बुद्ध की ज्यादातर मूर्तियां या चित्रों को ध्यान मुद्रा में ही दिखाया जाता है.

वीर मुद्रा का मुख्य संबंध भगवान शिव व उनके अवतार हनुमान जी से है. सनातन परंपरा से लेकर योग विज्ञान में वीर मुद्रा वीरता, साहस और शक्ति को दर्शाती है. यही वजह है कि उग्र और महाबली देवताओं का इस मुद्रा से गहरा संबंध है.
वीर मुद्रा का किन देवताओं से संबंध
हनुमान जी के कई चित्र और प्रतिमाएं इस मुद्रा में दिखती हैं. हनुमान जी के इस मुद्रा से संदेश मिलता है कि वे अपने भक्तों में भय का नाश करते हैं और उनके भीतर असीम शक्ति का संचार करते हैं. भगवान शिव के वीरभद्र अवतार को वीर मुद्रा में दिखाया जाता है.
वीर मुद्रा और तंत्र और पूजा-पद्धति
तंत्र और पूजा-पद्धति के नजरिये से देखें तो 'वीर मुद्रा' एक गुप्त हस्त मुद्रा है जिसे "देव कृपा आकर्षण मुद्रा" कहते हैं. इस साधना का अभ्यास करके इष्ट देवता या कुलदेवी की सूक्ष्म ऊर्जा और शक्ति को अपने भीतर समाहित या आकर्षित किया जाता है.
(डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं, मूर्तिकला और आध्यात्मिक परंपराओं पर आधारित है. मुद्राओं की वैज्ञानिक व्याख्या प्रतीकात्मक है, इसका उद्देश्य किसी धर्म या आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं है.)