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आपने कभी महसूस किया है कि अचानक आप जहां रहते हो वहां आधी रात को अचानक हजारों एक साथ लाठी लेकर निकलें और एक दूसरे पर हमला कर दें.
जी हां, ठीक ऐसा ही आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले होता है. देवरागतु मंदिर की पहाड़ियों पर हर साल विजयादशमी की रात एक ऐसा नजारा देखने को मिलता है.
लोग एक दूसरे के ऊपर अचानक लाठियां बरसाने लगते हैं. एक दूसरे के ऊपर हमला बोलते हैं. दरअसल ये एक परंपरा का हिस्सा है.
इस उत्सव का नाम बन्नी उत्सव है. ये एक खूनी परंपरा है. जिसे लोग सदियों से मनाया जाता है. वहां के लोग अपने गांव का सम्मान बनाएं रखने के लिए लोग इस खेल में खून बहाते हैं.
वहां मौजूद कहानियों के मुताबिकक, भगवान मल्ला-मल्लेश्वर यानि महादेव ने इलाके के राक्षसों को मारकर वहां के लोगों को बचाने का काम किया था.
भगवान के जीत पर हर साल दशहरा के दिन देवरागतु पहाड़ी पर स्थित मंदिर में मलाम्मा और मल्लेश्वर स्वामी की शादी करवाई जाती है.
जैसे ही पूजा-पाठ खत्म होता है. वैसे ही भगवान की मूर्तियों का एक भव्य जुलूस निकाला जाता है. भव्य जुलूस वाली मूर्तियों की रक्षा करने के बहाने लाठी युद्ध शुरू हो जाती है.
वहां दो टीम बनते हैं. इसमें 10 गांव के दो गूट बनते हैं. एक समूह में नेरानिकी, नेरानिकी थंडा और कोथापेटा के लोग शामिल होते हैं.
वहीं दूसरी टीम में अरिकेरा, सुलुवाई, एलार्थी, बिलेहाल, नित्रावती और आलूर गांव के ग्रामीण होते हैं.
दोनों टीम आधी रात से लेकर अगली सुबह की पहली किरण तक एक-दूसरे पर लाठियों से वार करते रहते हैं.
इतिहास की मानें तो पुराने समय में लोग लाठियों की जगह भाले और कुल्हाड़ी जैसे धारदार हथियारों से ये लड़ाई लड़ा करते थे. सुनने में तो थोड़ा डरावना लग सकता है, पर यही सच है.
लाठियां लोगों को लगती हैं तो लोग घायल हो जाते हैं. कई लोगों के सिर में भयानक चोट लग जाता है.
स्थानीय प्रशासन और पुलिस हर साल आपातकालीन इलाज के लिए डॉक्टरों की मेडिकल टीमें वहां तैनात करती हैं.
हैरान करने वाली बात ये है कि कोई भी हॉस्पीटल नहीं जाता है. लोग घर पर ही हल्दी का लेप लगाते हैं. उसके बाद फिर युद्ध में कूद जाते हैं.
उनका मानना है कि, भगवान की सुरक्षा करना उनके गांव का फर्ज है और उनके इज्जत की बात है.
पवित्र मूर्तियों को सुरक्षा घेरे से निकाल कर बासवन्नागुड़ी पहुंचाते हैं. उसके बाद वहां के माहौल में बदलाव देखने को मिलता है.
वहां के पुजारी आने वाले साल के लिए भविष्यवाणी करते हैं. इसमें देश के भविष्य, खेती-किसानी और बारिश को लेकर अनुमान लगाया जाता है.
इसके बाद जब मूर्तियां कल्याणकट्टा पहुंचती हैं, तो एक अंतिम लाठी युद्ध के साथ इस प्राचीन उत्सव को खत्म करते हैं.
(Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक परंपराओं, पौराणिक मान्यताओं और स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है.