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आज के समय में सगे भाई मिलकर फैमिली बिजनेस करते हैं या किसी नए स्टार्टअप की शुरुआत करते हैं. पहले तो सब अच्छा रहता है.
लेकिन कुछ समय बाद जब कारोबार बढ़ जाता है और पैसे अच्छे आने लगते हैं, तब पैसों के लेन-देन को लेकर आपस में मनमुटाव होने लगता है.
अब जब अपना भाई ही अपने सामने आ जाए, तो सिर्फ रिश्ता ही नहीं, बल्कि सालों से बनाया गया बिजनेस भी डूबने के कगार पर आ जाता है.
अगर आपके परिवार में भी ऐसी समस्या है, तो आचार्य चाणक्य की कुछ नीतियां हैं जो आपको इस समस्या से बाहर निकाल सकती हैं.
आज हम इस खबर में चाणक्य के उन खास नीतियों के बारे में जानेंगे, जिन्हें अपनाकर रिश्ते और बिजनेस दोनों को बचाया जा सकता है.
बिजनेस की दुनिया में आचार्य चाणक्य के बताए गए एक नियम को सबसे जरूरी माना जाता है. वो कहते हैं कि हमारे पारिवारिक रिश्ते और बिजनेस के फैसले बिल्कुल अलग-अलग चीजें हैं.
जब भाई बिजनेस पार्टनर बनते हैं, तो अक्सर भावनाओं में आकर बिना किसी लिखित समझौते के काम शुरू कर देते हैं.
फिर आगे चलकर जब बड़ा मुनाफा या नुकसान होता है, तो वही आपसी प्यार बाद में झगड़े की वजह बन जाता है.
चाणक्य का कहना है कि बिजनेस में एक-दूसरे की क्या जिम्मेदारी रहेगी, क्या हिस्सेदारी रहेगी, इन्हें कागजों पर साफ-साफ दर्ज करवा लेना चाहिए.
भाई-भाई के रिश्ते को घर तक ही रखें. कारोबार के काम में सिर्फ एक प्रोफेशनल पार्टनर की भूमिका निभानी चाहिए.
बिजनेस में कभी-कभी ऐसा होता है कि एक भाई कुछ और चाहता है और दूसरा भाई कुछ और चाहता है.
आगे चलकर जब ऐसा बार-बार होता है, तो यह आपसी लड़ाई में बदल जाता है.
चाणक्य कहते हैं कि ऐसी समस्या आने से पहले दोनों को अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को बांट लेना चाहिए. किस विभाग में कौन फैसला लेगा, ये बिजनेस शुरू करते समय ही तय कर लेना चाहिए.
भाइयों के ज्यादातर बिजनेस आपसी मनमुटाव की वजह से डूबते हैं. अगर आपस में आप एक-दूसरे से खुलकर बात नहीं करेंगे, तो धीरे-धीरे मन में शिकायतें पलने लगती हैं.
चाणक्य कहते हैं कि किसी व्यापारी को अपने पार्टनर से बातचीत बंद नहीं करनी चाहिए. अगर बिजनेस में कोई समस्या आ रही है, तो उसे अपने भाई या पार्टनर से तुरंत बात करके सुलझाना चाहिए.
हम हमेशा यह सोचते हैं कि सामने वाला हमारा भाई है, तो वह भी हमारे हित के लिए ही सोचेगा. लेकिन ये हमेशा नहीं होता है.
जब बिजनेस का सालाना टर्नओवर सामने आता है, तो पैसे बांटते समय लोगों के अंदर अपना स्वार्थ आ ही जाता है.
चाणक्य नीति के अनुसार, बिजनेस के फैसलों में हमेशा निष्पक्षता होनी चाहिए. अगर कोई भाई कंपनी के लिए ज्यादा मेहनत कर रहा है या अधिक पूंजी लगा रहा है, तो उसके योगदान के आधार पर उसे उसका सही हिस्सा मिलना चाहिए.
अगर तमाम कोशिशों के बाद भी भाइयों के बीच का तनाव खत्म नहीं हो रहा और हर दिन बिजनेस को नुकसान हो रहा है, तो समझदारी इसी में है कि सम्मानजनक तरीके से रास्ते अलग कर लिए जाएं.
कारोबार का बंटवारा हो जाना पूरे परिवार के बर्बाद होने से कहीं बेहतर है. कानूनी और पारदर्शी तरीके से अलग होकर भी आप एक-दूसरे के भाई बने रह सकते हैं.
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई सभी जानकारियां पारंपरिक नीतियों और व्यावसायिक प्रबंधन के दृष्टिकोण पर आधारित हैं.