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जब थार की धूप में साथ चले थे, राजस्थानी किसान और रूसी इंजीनियर

श्रीगंगानगर में आज से करीब 70 साल पहले सोवियत संघ (रूस) के इंजीनियर, तपती धूप में राजस्थान के किसानों को खेती के आधुनिक तरीके सिखाने आए थे. ये लोग अपने साथ उस वक्त की सबसे आधुनिक मशीनरी भी लाए, जिसने श्रीगंगानगर को अन्न के कटोरे में बदल दिया.

जब थार की धूप में साथ चले थे, राजस्थानी किसान और रूसी इंजीनियर
Image Credit: suratgarh central mechanized farm history indo russia friendship rajasthan

Rajasthan News : थार के रेत पर भारत और सोवियत संघ (रूस) की दोस्ती साल 1955 के आखिर और 1956 की शुरूआत में हुई. सोवियत संघ (रूस) के तत्कालीन प्रधानमंत्री निकिता एस. ख्रुश्चेव ने भारत को कृषि मशीनरी और उपकरणों का एक शानदार तोहफा देने की पेशकश की, खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उस वक्त के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे मान लिया और 15 अगस्त 1956 को राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में 'सेंट्रल मैकेनाइज्ड फार्म, सूरतगढ़' की स्थापना हुई. ये फार्म करीब 30,000 एकड़ में फैला है.
डॉ. आर. के. दधीच, पूर्व फार्म प्रमुख, सूरतगढ़ (NSC CSF) ने बताया कि 1 अप्रैल 1959 और 28 जनवरी 1960 को प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस फार्म का दौरा किया. उनके साथ इंदिरा गांधी भी यहां आई थीं. जिस जीप पर सवार होकर नेहरूजी और इंदिरा गांधी ने इस विशाल फार्म का मुआयना किया था, वो आज भी सूरतगढ़ के बेस वर्कशॉप में रखी गई है. गेस्ट हाउस में रखा विजिटर्स रजिस्टर 14 मार्च 1959 को पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी द्वारा किए गए हस्ताक्षर आज भी मौजूद हैं. सोवियत संघ (रूस) के प्रधानमंत्री ख्रुश्चेव 13 फरवरी 1960 भी खुद सेंट्रल मैकेनाइज्ड फार्म, सूरतगढ़ को देखने आये थे.


रशियन कैसे समझ रहे थे राजस्थान के किसान ?
सोवियत संघ (रूस) से सिर्फ मशीनरी ही नहीं मिली थी, बल्कि आए इंजीनियर्स भारतीय किसानों और कर्मचारियों को उन भारी-भरकम मशीनों को चलाने और संभालने की ट्रेनिंग भी दे रहे थे. बातचीत के लिए दुभाषिया की मदद ली जाती थी, क्योंकि रशियन को हिंदी में समझाना भी होता था और समझना भी होता था. थार की रेत से उपजी ये हरियाली, पंजाब राजस्थान बॉर्डर पर भी बदलाव लाई और सोवियत संघ (रूस) से मिली मशीनों ने थार के बंजर जमीन की जुताई से लेकर फसल तैयार करने तक पूरी मदद की.

श्रीगंगानगर में ही ये फार्म क्यों लगा था ?
इंजीनियर सुशांत प्रियदर्शी (एजीएम, कृषि इंजीनियरिंग) बताते है कि, आजादी से पहले से भारत में रशियन साहित्य को पढ़ा जाता रहा था. कालांतर में भारत आए सोवियत संघ (रूस) के प्रधानमंत्री निकिता एस. ख्रुश्चेव ने भारत में भी बड़े मैकेनिक फार्म खोलने की पेशकश की. और 70 लाख की मदद दी, फिर करीब 70 लाख की मशीनरी मुंबई से होते हुए सूरतगढ़ पहुंची. इंजन टेस्टिंग से जुड़े सामान, जैसे 60 के करीब ट्रैक्टर, कंबाइंड हारवेस्टर के साथ कई तकनीकी जरूरत और एक बेस वर्कशॉप यहां बनायी गयी, जिससें हाइड्रोलिक सेटिंग से जुड़े सारे सेटअप किये गये और भारतीय इंजीनियर्स को ट्रेंड किया. उस वक्त सूरतगढ़ का सेंट्रल मैकेनाइज्ड फार्म पहली तरह का एक मात्र फार्म था भारत में. सूरतगढ़ में ये बदलाव कैसे आया इसके बारे में  Making the Desert Bloom नाम की किताब में बताया गया है. दरअसल जब सोवियत रूस की तरफ से मदद का प्रस्ताव दिया गया था तो भारत सरकार ने सभी राज्यों से डेटा मांगा था. ऐसे में राजस्थान को क्षेत्रफल की अधिकता और पानी की कमी के चलते चुना गया. उस वक्त जब फोन लाइन ना के बराबर थी, तब श्रीगंगानगर में टेलीफोन कनेक्शन था. 


बीकानेर के महाराजा के 'शूटिंग लॉज'
श्रीगंगानगर के इस सेंट्रल स्टेट फार्म का इतिहास सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है, इसका शाही कनेक्शन भी है. यहां का जो गेस्ट हाउस है, उसे कभी बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने 'शूटिंग लॉज' (शिकारगाह) के रूप में बनवाया था. वक्त के साथ ये शाही शिकारगाह भारत-रूस कूटनीति और कृषि अनुसंधान का मुख्य केंद्र बन गया. 70 लाख रुपये की आधुनिक कृषि मशीनों और उपकरणों के साथ शुरू हुआ.

 

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Pragati Pant Awasthi

Pragati Pant Awasthi

मीडिया की दुनिया में 18 साल का सफर... एंकरिंग से लेकर डिजिटल की स्क्रीन तक, हर नया बदलाव दिल से अपनाया, जो सोचती हूं, वही कहती हूं, बातों को घुमाना मेरी आदत नहीं, दिल की बात जुबां पर रखना पहचान है. फिलहाल 'ज़ी राजस्थान डिजिटल' के साथ सफर जारी है और हर दिन कुछ नया सीखने की ललक बरकरार है और रहेगी. Pragati.Pant@india.com ईमेल के जरिए आप संपर्क कर सकते हैं.
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