राजसमंद में कुमावत समाज की सियासी बगावत, भाजपा-कांग्रेस के सामने नई चुनौती !
राजसमंद जिले में निकाय चुनाव में राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर शुरू हुआ. विवाद अब पंचायत चुनाव तक पहुंच गया है. 84 गांवों की महापंचायत में भाजपा और कांग्रेस के बहिष्कार का ऐलान करने वाला कुमावत समाज अब निर्दलीय प्रत्याशियों के जरिए अपनी ताकत दिखाने मैदान में उतर गया है.
राजसमंद जिला परिषद के 8 वार्डों और राजसमंद, आमेट और रेलमगरा पंचायत समितियों में 17 वार्डों मे निर्दलीय प्रत्याशियों की एंट्री… समाज की इस रणनीति ने चुनावी माहौल को गरमा दिया है. समाज की इस हुंकार से दोनों प्रमुख दलों के चुनावी समीकरण बिगाड़ दिये हैं.
3 पंचायत समितियों में निर्दलीय चुनौती
राजसमंद जिले में पंचायत चुनाव के बीच कुमावत समाज ने अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने के लिए तीसरा मोर्चा खोल दिया है. समाज ने राजसमंद, आमेट और रेलमगरा-तीनों पंचायत समितियों में कुल 17 निर्दलीय प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है. राजसमंद पंचायत समिति के 25 वार्डों में से 7 वार्डों में समाज के प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं. आमेट के 17 वार्डों में से 6 और रेलमगरा के 21 वार्डों में से 4 वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने ताल ठोकी है. इस चुनावी रणनीति में पूर्व प्रधान रीना कुमावत का नाम भी शामिल है. समाज का मकसद निर्दलीय प्रत्याशियों के दम पर राजनीतिक दलों को अपनी ताकत का एहसास कराना है.
गांव-गांव बहिष्कार के पोस्टर-बैनर
कुमावत समाज की नाराजगी अब महापंचायत के फैसले से आगे बढ़कर गांवों तक पहुंच गई है. राजसमंद, आमेट और रेलमगरा—तीनों पंचायत समिति क्षेत्रों के गांवों में भाजपा और कांग्रेस के बहिष्कार से जुड़े पोस्टर और बैनर लगाए गए हैं. इन पोस्टर-बैनरों के जरिए दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रति नाराजगी जाहिर करते हुए बहिष्कार का संदेश दिया जा रहा है. एक तरफ गांवों में बहिष्कार का संदेश, तो दूसरी तरफ चुनावी मैदान में निर्दलीय प्रत्याशी. समाज की ये दोहरी रणनीति पंचायत चुनाव में राजनीतिक दलों की मुश्किलें बढ़ा सकती है. अब नजर इस बात पर है कि बहिष्कार का ये संदेश मतदाताओं के बीच कितना असर दिखाता है.
निकाय चुनाव से शुरू हुई नाराजगी
कुमावत समाज की इस सियासी नाराजगी की जड़ें पिछले निकाय चुनाव से जुड़ी हैं. निकाय चुनाव में भाजपा के टिकट पर समाज के 9 प्रत्याशी पार्षद निर्वाचित हुए थे। इसके बाद समाज की अपेक्षा थी कि नगर परिषद में उसे सभापति पद के रूप में उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिले. इसी मांग को लेकर समाज ने आवाज उठाई और विरोध प्रदर्शन किया. लेकिन प्रदर्शन के बाद 19 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने से समाज की नाराजगी और बढ़ गई. मामले ने राजनीतिक रूप ले लिया और 5 अक्टूबर को 84 गांवों की महापंचायत में बड़ा फैसला लिया गया. महापंचायत में भाजपा और कांग्रेस, दोनों के बहिष्कार का ऐलान किया गया. संदेश साफ था, कि जब राजनीतिक दलों से अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिला, तो अब समाज अपने प्रत्याशियों को निर्दलीय मैदान में उतारकर अपनी ताकत दिखाएगा. जिलाध्यक्ष सुंदरलाल दोराया ने बताया- राजसमंद, नाथद्वारा और आमेट क्षेत्र में कुमावत समाज के करीब 1 लाख मतदाता हैं. लगातार समाज की उपेक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर उचित भागीदारी नहीं मिलने से समाज में नाराजगी बढ़ती चली गई.
क्या बिगड़ेगा भाजपा-कांग्रेस का गणित ?
जिला परिषद की 8 सीटों और तीनों पंचायत समितियों में 17 निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी, गांवों में बहिष्कार के पोस्टर-बैनर और समाज की एकजुटता का संदेश चुनावी मुकाबले को दिलचस्प बना रहा है. हालांकि, इसका वास्तविक असर प्रत्याशियों के जनाधार, मतदाताओं के रुख और चुनावी नतीजों से ही सामने आएगा. फिलहाल कुमावत समाज ने दोनों प्रमुख दलों को साफ राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है. समाज की मांगों और प्रतिनिधित्व के सवाल को नजरअंदाज करना अब आसान नहीं होगा.