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गांव की सरकार चुनने पहुंचे वोटर, बोले- कब आएगा नलों में पानी? और बंदर... उनसे कब मिलेगी मुक्ति?

आमेर पंचायत समिति क्षेत्र में गांव की सरकार चुनने पहुंचे मतदाताओं ने बंदरों के आतंक, पानी की किल्लत, टूटी सड़कों और रोजगार की समस्या पर सवाल उठाए. ग्रामीणों का कहना है कि पानी के लिए टैंकर मंगाने पड़ते हैं और पढ़ाई-इलाज के लिए शहर जाना पड़ता है.

Reported By Deepak Goyal Written By Ansh Raj
Published: Oct 28, 2026, 09:25 AM IST | Updated: Oct 28, 2026, 09:26 AM IST
Image Credit: Amer Panchayat Samiti
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गांव की सरकार चुनने के लिए मतदाता मतदान केंद्रों तक पहुंच रहे हैं. महिला मतदाताओं में भी वोटिंग को लेकर खासा उत्साह दिखाई दे रहा है. लेकिन मतदान करने पहुंचे ग्रामीणों के मन में सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि अपने गांव की बुनियादी समस्याओं को लेकर भी कई सवाल हैं. आमेर पंचायत समिति क्षेत्र में बंदरों का आतंक, पानी की किल्लत, टूटी सड़कें और रोजगार की परेशानी ग्रामीणों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं. ग्रामीणों का सवाल है कि हर पांच साल में चुनाव होते हैं, विकास के वादे किए जाते हैं, लेकिन उनकी रोजमर्रा की समस्याओं का स्थायी समाधान कब होगा?

बंदरों के आतंक से परेशान ग्रामीण
आमेर पंचायत समिति क्षेत्र के ग्रामीणों की बड़ी शिकायत बंदरों के आतंक को लेकर है. ग्रामीणों का कहना है कि बंदर आए दिन किसी न किसी पर हमला कर देते हैं. ऐसे में घर से बाहर निकलने और गलियों में आने-जाने के दौरान भी डर बना रहता है. ग्रामीण चाहते हैं कि इस समस्या का स्थायी समाधान हो, ताकि वे बिना डर के अपने रोजमर्रा के काम कर सकें. मतदान के बीच ग्रामीणों का यह सवाल भी सामने आया कि गांव की सरकार बनने के बाद बंदरों के आतंक से राहत दिलाने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे.


नलों में पानी कब आएगा?
ग्रामीणों की दूसरी बड़ी परेशानी पानी का संकट है. कई परिवारों को आज भी पानी के लिए टैंकर मंगवाने पड़ रहे हैं. ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर उनके घरों के नलों में पानी कब आएगा और कब उन्हें टैंकरों पर निर्भरता से छुटकारा मिलेगा.

पानी की व्यवस्था के लिए अतिरिक्त खर्च करना भी परिवारों पर बोझ बन रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि एक तरफ महंगाई से घर का बजट बिगड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ पीने के पानी के लिए भी पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं. ऐसे में पानी की नियमित व्यवस्था उनकी प्रमुख मांगों में शामिल है.

रोजगार के लिए शहरों की दौड़
गांवों में रोजगार की समस्या भी ग्रामीणों की चिंता का हिस्सा है. रोजगार के लिए लोगों को शहरों की ओर जाना पड़ता है. ग्रामीणों की अपेक्षा है कि गांवों में ही रोजगार के बेहतर अवसर मिलें, ताकि काम की तलाश में उन्हें बाहर न जाना पड़े. इसके साथ ही बच्चों की अच्छी पढ़ाई और परिवार के सदस्यों के इलाज के लिए भी ग्रामीण शहरों पर निर्भर रहने की बात कहते हैं. ग्रामीण चाहते हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाएं उनके आसपास उपलब्ध हों, जिससे इन जरूरतों के लिए बार-बार शहर न जाना पड़े.

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टूटी सड़कें और विकास के वादे
ग्रामीणों ने गांव की टूटी सड़कों को लेकर भी सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि बुनियादी सुविधाओं में सुधार होना चाहिए, ताकि गांव में रहना और रोजमर्रा के काम करना आसान हो सके. ग्रामीणों की शिकायत है कि हर पांच साल में चुनाव आते हैं, विकास के वादे किए जाते हैं और गांव की सरकार चुनी जाती है, लेकिन उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान अब भी उनकी अपेक्षा बना हुआ है.

महिला मतदाताओं में भी उत्साह
गांव की सरकार चुनने के लिए महिलाएं भी मतदान केंद्रों पर पहुंच रही हैं. मतदान को लेकर उनके बीच खासा उत्साह दिखाई दे रहा है. वहीं, वोट डालने पहुंचे ग्रामीण अपनी समस्याओं का समाधान भी चाहते हैं. आमेर पंचायत समिति क्षेत्र के ग्रामीणों के सवाल साफ हैं… बंदरों के आतंक से राहत कब मिलेगी, घरों के नलों में पानी कब आएगा, सड़कें कब सुधरेंगी और रोजगार, पढ़ाई व इलाज के लिए शहरों पर निर्भरता कब कम होगी? अब ग्रामीणों को उम्मीद है कि गांव की नई सरकार इन बुनियादी समस्याओं पर ध्यान देगी.

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