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महिलाएं अभी भी घूंघट से आजाद नहीं हो पाई हैं. गांवों में आधी आबादी पंचायत चुनाव के बीच घूंघट के पर्दे से आजादी की जद्दोजहद करती दिखाई दे रही हैं लेकिन समाज और परंपराओं का हवाला देकर उन्हें खुली हवा में सांस लेने की छूट मिलती फिलहाल दिखाई नहीं दे रही है.
आधी आबादी पर अभी भी घूंघट का पहरा है. राजस्थान पंचायत चुनावों के बीच नारी शक्ति इस अंदाज में दिख रही तस्वीरें है. पुरुषों के बराबर बैठने का हक तो महिलाओं ने हासिल कर लिया है लेकिन घूंघट से बाहर निकलकर अपने फैसले खुद लेने के लिए उसे अब भी काफी वक्त की दरकार है. दूदू पंचायत समिति का चुनाव लड़ रही संतोष देवी घूंघट की अब भी कैद में है जबकि पास में बैठी पूर्व प्रधान और जिला परिषद की उम्मीदवार संतोष कड़वा बरसों पहले घूंघट की बंदिशों से आजादी हासिल कर चुकी हैं.
कहीं समाज की मर्यादा का हवाला दिया जा रहा है तो कहीं परंपराओ का. जहां-जहां भी ये प्रत्याशी प्रचार पर जा रहीं हैं, वहां पुरुष प्रधान समाज का ही दबदबा नजर आ रहा है. घूंघट को महिलाओं की इज्जत से जोड़कर उन्हें पर्दे में ही रहने को मजबूर किया जा रहा है. वो गांव की चौपाल पर बैठ मतदाताओं के सामने वोट की गुजारिश तो कर रही है लेकिन अब भी मंच पर वो संतोष कड़वा जैसी भाग्यशाली नहीं हैं. संतोष कड़वा ने दूदू के इस पिछड़े इलाके में महिला सशक्तिकरण की मिसाल पेश की.
घूंघट से परिवार ने आजादी दी तो उन्होंने प्रधान बनकर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का मार्ग दिखाया लेकिन दूसरी तरफ उनकी बगल में बैठी संतोष देवी को देखिए, अब भी माइक उनकी पहुंच से दूर है. न ही वो कुछ बोलने का ऐसा कोई आग्रह करती. बस पंचायती पतिदेव को करनी है. संतोष देवी का घूंघट में बंद चेहरा ही उनकी उम्मीदवारी की पहचान है.
महिलाएं आज राजनीति के शिखर को छू रहीं है लेकिन राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को अपने हक और अधिकार के लिए लंबे संघर्ष की दरकार है. इस हालात के पीछे की एक वजह ये भी है कि इस बार पंचायत राज चुनाव से शैक्षणिक योग्यता खत्म कर दी गई है इसलिए कम पढ़ी लिखी महिलाओं को भी चुनाव लड़ने का मौका मिल रहा है. जहां शिक्षा का स्तर कमजोर है, वहां पुरुष प्रधान समाज महिलाओं को भला आजादी की खुली सांस कैसे लेने देगा इसलिए पर्देदारी उनकी मूंछ का सवाल है, जिसे वो बरकरार रखने में ही अपनी शान समझते हैं.