न गोली चली, न विद्रोह हुआ... और आज की सुबह ही बदल गया था राजस्थान का नक्शा और निज़ाम
1 नवंबर 1956 को राजस्थान के इतिहास में बड़े बदलाव हुए. राजप्रमुख का पद समाप्त हुआ, बी-श्रेणी की व्यवस्था खत्म हुई और अजमेर, माउंट आबू व सुनेल टप्पा राजस्थान में शामिल हुए. इसी दिन प्रदेश को आधुनिक स्वरूप मिला.
राजस्थान के इतिहास में 1 नवंबर की तारीख बेहद खास है. साल 1956 में इसी दिन प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे में ऐसा बदलाव हुआ, जिसने राजस्थान को मौजूदा स्वरूप देने में अहम भूमिका निभाई. इस दिन न केवल सदियों पुरानी राजशाही व्यवस्था की आखिरी पहचान 'राजप्रमुख' का पद समाप्त हुआ, बल्कि राजस्थान को बी-श्रेणी के राज्य के दर्जे से भी मुक्ति मिली. साथ ही अजमेर सहित कुछ क्षेत्रों का राजस्थान में विलय हुआ. आइए जानते हैं 1 नवंबर 1956 को राजस्थान के इतिहास में क्या-क्या बदलाव हुए थे.
राजप्रमुख का पद खत्म, राज्यपाल ने संभाली जिम्मेदारी
आजादी के बाद राजपूताना की 19 रियासतों को मिलाकर राजस्थान का गठन किया गया था. उस समय रियासतों के राजाओं की प्रतिष्ठा और परंपराओं को ध्यान में रखते हुए राज्यपाल के बजाय 'राजप्रमुख' का पद बनाया गया था. जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय ने करीब साढ़े सात साल तक इस जिम्मेदारी को संभाला.
लेकिन 31 अक्टूबर 1956 की आधी रात के बाद राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव हुआ. 1 नवंबर से राजप्रमुख का पद समाप्त कर दिया गया. इसके स्थान पर राज्यपाल की व्यवस्था लागू हुई. सरदार गुरुमुख निहाल सिंह राजस्थान के पहले राज्यपाल बने. इस बदलाव के साथ प्रदेश की शासन व्यवस्था में राजशाही की औपचारिक भूमिका खत्म हो गई और संवैधानिक व्यवस्था को नई पहचान मिली.
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बी-श्रेणी के राज्य का दर्जा भी हुआ खत्म
1956 से पहले देश के राज्यों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया था. अंग्रेजों के सीधे शासन वाले राज्यों को ए-श्रेणी में रखा गया था, जबकि रियासतों के विलय से बने राजस्थान जैसे राज्यों को बी-श्रेणी में शामिल किया गया था. वहीं कुछ छोटे राज्यों को सी-श्रेणी में रखा गया था.
इस व्यवस्था के कारण राज्यों के प्रशासनिक ढांचे और केंद्र के साथ उनके संबंधों में अंतर था. 1 नवंबर 1956 को सातवें संविधान संशोधन के लागू होने के बाद ए, बी और सी श्रेणियों की व्यवस्था समाप्त कर दी गई. इसके साथ राजस्थान को भी अन्य राज्यों के समान संवैधानिक दर्जा मिला.
अजमेर, माउंट आबू और सुनेल टप्पा राजस्थान में शामिल
राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया में 1 नवंबर 1956 एक और महत्वपूर्ण पड़ाव बना. इससे पहले अजमेर-मेरवाड़ा अलग सी-श्रेणी का राज्य था. यहां अलग मुख्यमंत्री हरिभाऊ उपाध्याय और अपनी विधानसभा (धारा सभा) थी.
फजल अली आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1 नवंबर 1956 को अजमेर, माउंट आबू (आबू-देलवाड़ा) और मंदसौर के सुनेल टप्पा क्षेत्र को राजस्थान में शामिल किया गया.
इस बदलाव के बाद मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया के नेतृत्व में राजस्थान को उसका मौजूदा स्वरूप मिला. इसलिए 1 नवंबर का दिन केवल भौगोलिक एकीकरण की याद नहीं दिलाता, बल्कि प्रदेश के प्रशासनिक और संवैधानिक इतिहास में आए बड़े परिवर्तन का भी प्रतीक है.