Explainer : विश्वेंद्र का अलविदा,मानेसर के पुराने घाव, गहलोत-पायलट की विरासत और राजस्थान कांग्रेस का नया सियासी संकट
Explainer : क्या ठहरे हुए पानी में अब कंकड़ मार रही है कांग्रेस ? और अगर हां, तो आखिर क्यों ? कहानी शुरू होती है सोशल मीडिया पर पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह की नाराजगी से. निकाय चुनावों में टिकट वितरण और भरतपुर में जिला अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर उनके तीखे तेवर सामने आए. इसके बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और बड़े ही सधे हुए अंदाज में कहा कि "हम जानेंगे कि आखिर विश्वेंद्र सिंह को क्या दुख है". पीसी खत्म हुई थी कि सोशल मीडिया के अखाड़े में विश्वेंद्र सिंह ने एक गाना पोस्ट कर दिया - "ठहरे हुए पानी में कंकड़ न मार सांवरे". ये एक सीधा सियासी तंज था, जिसने कांग्रेस के भीतर हलचल मचा दी.
बात यहीं खत्म नहीं हुई. डोटासरा ने सुबह तो कहा था कि वे पीड़ा सुनेंगे, लेकिन शाम होते-होते पार्टी की तरफ से विश्वेंद्र सिंह को 'कारण बताओ नोटिस' थमा दिया गया. इस नोटिस ने आग में घी का काम किया. विश्वेंद्र सिंह ने फिर से सोशल मीडिया पर पलटवार किया और कड़े शब्दों में कहा कि एक तरफ तो आप कह रहे हो कि आप बात करोगे, और दूसरी तरफ कारण बताओ नोटिस भेज रहे हो. उन्होंने साफ कर दिया कि "मैं अब इस उम्र में हूं कि मुझे किसी की नसीहत की जरूरत नहीं है".
इस पूरी तनातनी ने एक बार फिर 2020 के उस 'मानेसर मामले ' के जिन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया है, जब विश्वेंद्र सिंह ने सचिन पायलट के साथ मिलकर अशोक गहलोत सरकार की नींव हिला दी थी. आज का ये विवाद सिर्फ एक नोटिस का नहीं है, बल्कि उन पुराने घावों की टीस है जो मानेसर के होटल से शुरू हुई थी और आज तक राजस्थान कांग्रेस के भीतर रिस रही है.
सियासी बिसात: 'अलविदा' से लेकर 'नसीहत' तक का ड्रामा
राजस्थान कांग्रेस की राजनीति कभी भी एक सीधी रेखा में नहीं चलती. यहां कब कौन सा मोहरा बाजी पलट दे, कहना मुश्किल है. साल 2026 में भरतपुर के राजघराने से ताल्लुक रखने वाले और पूर्व कैबिनेट मंत्री विश्वेंद्र सिंह एक बार फिर उस सियासी बवंडर के केंद्र में हैं, जिसने कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया है. हाल ही में संपन्न हुए निकाय चुनावों के बाद विश्वेंद्र सिंह ने भरतपुर और डीग में कांग्रेस संगठन की कार्यप्रणाली और टिकट वितरण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए. उनका निशाना सीधा प्रदेश नेतृत्व पर था, और खास तौर पर पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा उनके रडार पर थे.
विश्वेंद्र सिंह की ये कोई सामान्य बयानबाजी नहीं थी. ये एक ऐसे कद्दावर नेता की नाराजगी थी जिसका अपने इलाके में खासा रसूख है. जब ये विवाद बढ़ा, तो डोटासरा ने मीडिया के सामने आकर एक कूटनीतिक बयान दिया. उन्होंने कहा कि पार्टी विश्वेंद्र सिंह से बात करेगी और जानेगी कि उनकी पीड़ा क्या है. लेकिन राजनीति में जो दिखता है, वो होता नहीं है. डोटासरा के इस बयान के तुरंत बाद विश्वेंद्र सिंह ने फेसबुक पर एक वीडियो या कहें एक गाना साझा किया, जिसके बोल थे - "ठहरे हुए पानी में कंकड़ न मार". ये लाइन अपने आप में पूरी कहानी बयां कर रही थी.
सुबह हमदर्दी, शाम को नोटिस: कांग्रेस का दोहरा रवैया
सियासत में टाइमिंग का बहुत महत्व होता है. जिस दिन सुबह डोटासरा ने विश्वेंद्र सिंह के दुख दर्द को समझने का दावा किया, उसी दिन ढलती शाम के साथ कांग्रेस कमेटी की तरफ से एक कड़क 'कारण बताओ नोटिस' विश्वेंद्र सिंह के दरवाजे पर पहुंच गया. इस एक कदम ने बातचीत के सारे पुल गिरा दिए. एक अनुभवी राजनेता के लिए यह किसी अपमान से कम नहीं था.
विश्वेंद्र सिंह, जो अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने भी जवाब देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उनका अगला सोशल मीडिया पोस्ट और भी ज्यादा आक्रामक था. उन्होंने सीधे तौर पर पार्टी के दोहरे मापदंडों पर प्रहार किया.
मानेसर का जिन्न : जब जयपुर से दिल्ली तक हिली थी कुर्सी
विश्वेंद्र सिंह के इस हालिया विवाद को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को थोड़ा पीछे पलटना होगा. साल 2018 में जब राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी, तो सत्ता के दो ध्रुव स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आए - एक तरफ थे अनुभवी अशोक गहलोत, जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए, और दूसरी तरफ थे युवा सचिन पायलट, जो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री बने. सरकार के गठन के पहले दिन से ही इन दोनों खेमों के बीच की दूरियां और सियासी खींचतान की खबरें आम थी.
ये अंदरूनी कलह जुलाई 2020 में एक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ी. ये वही दौर था जिसने भारतीय राजनीति के शब्दकोश में 'रिसॉर्ट पॉलिटिक्स' जैसे शब्दों को हमेशा के लिए दर्ज कर दिया. सचिन पायलट अपने समर्थक करीब 19 विधायकों के साथ दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर स्थित मानेसर के एक आलीशान होटल में जाकर बैठ गए. इस बगावत के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक थे विश्वेंद्र सिंह, जो उस वक्त गहलोत सरकार में पर्यटन मंत्री थे.
गहलोत सरकार और उनके समर्थकों ने इसे सरकार को अस्थिर करने और बीजेपी के साथ मिलकर चुनी हुई सरकार को गिराने की साजिश बताया. वहीं, पायलट खेमे का तर्क था कि ये कोई बगावत नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर अपनी बात रखने, नेतृत्व के रवैये का विरोध करने और सरकार में अपनी उचित राजनीतिक भूमिका की मांग करने का एक लोकतांत्रिक तरीका है.
बाड़ेबंदी, ऑडियो टेप और कुर्सी छिनने का दर्द
मानेसर में सचिन पायलट और उनके समर्थक थे तो यहां जयपुर में अशोक गहलोत के समर्थक विधायकों को एक होटल में रखा गया. जिसे 'बाड़ेबंदी' कहा गया. बाद में सब जैसलमेर के सूर्यगढ़ फोर्ट में शिफ्ट कर दिये गये. इसी हाई-वोल्टेज ड्रामे के बीच कुछ कथित ऑडियो टेप मीडिया में लीक हो गए. जिसमें विधायकों की खरीद-फरोख्त यानी की (हॉर्स ट्रेडिंग) की बात कही जाने लगी. आखिरकार 14 जुलाई 2020 को कांग्रेस आलाकमान के निर्देश पर सचिन पायलट को उनके दोनों अहम पदों (उपमुख्यमंत्री और पीसीसी चीफ) से हटाया गया और विश्वेंद्र सिंह से भी मंत्री पद ले लिया गया.
2025 की क्लीन चिट
बाद में प्रियंका गांधी और राहुल गांधी की मध्यस्थता से सुलह तो हो गई और गहलोत सरकार ने विधानसभा में अपना बहुमत भी साबित कर दिया, लेकिन दिलों की दूरियां क्या कभी नहीं मिटीं ? मानेसर की वो टीस कभी कभी गहलोत और पायलट खेमे के बयानों में छलकती रही. सियासत का पहिया घूमा और साल 2025 आ गया. 2025 में राजस्थान हाईकोर्ट के समक्ष एसीबी (ACB) की रिपोर्ट में 2020 के उस कथित विधायकों की खरीद-फरोख्त के मामले में जांच एजेंसियों को कोई भी ठोस प्रमाण या सबूत नहीं मिले.
और 2026 का नया घमासान
अब सवाल ये कि आखिर 2026 में विश्वेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया पर बगावत क्यों कर दी. इसका जवाब भरतपुर की स्थानीय राजनीति में छिपा है. विवाद की असली जड़ भरतपुर और डीग जिलों में हुए नगरीय निकायों के चुनावों में पार्टी की हार रही . जिसके लिए विश्वेंद्र सिंह ने स्थानीय संगठन और टिकट वितरण को जिम्मेदार कहा था. उनका आरोप था कि जमीन से जुड़े पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी की गई.उन्होंने भरतपुर जिला कांग्रेस अध्यक्ष दिनेश सूपा और डीग जिला कांग्रेस अध्यक्ष राजीव चौधरी की कार्यशैली और गतिविधियों पर गंभीर सवाल उठाए थे.
क्या कांग्रेस इतिहास दोहराने की राह पर है?
वरिष्ठ पत्रकार, श्याम सुंदर शर्मा के मुताबिक निकाय चुनाव में कांग्रेस की स्थिति भरतपुर संभाग में बेहद खराब रही. ऐसे में अगर विश्वेंद्र सिंह, अगर जिलाध्यक्षों पर आरोप लगा रहे हैं, तो पार्टी को एक्शन लेना चाहिए था. विश्वेंद्र सिंह की आलाकमान से बातचीत चल रही है , तो संभवता सचिन पायलट के जरिए हो रही होगी, ऐसे में हो सकता है कि, इन दो जिलाध्यक्षों पर कोई एक्शन पार्टी ले और मामला यहीं खत्म हो जाए. दूसरी तरफ विश्वेंद्र सिंह सोशल मीडिया पर पोस्ट डालकर अपनी नाराजगी जाहिर कर ही रहे है और बीजेपी नेता अरूण चतुर्वेंदी से भी मुलाकात कर चुके है. राजनीति में कब क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है.
कुलमिलाकर विश्वेंद्र सिंह ने तकनीकी रूप से पार्टी छोड़ी नहीं है, लेकिन उनका "मुझे नसीहत मत दो" वाला बयान और "ठहरे पानी में कंकड़" वाला तंज इस बात का खुला ऐलान है कि वे पार्टी के भीतर रहकर ही आर-पार की लड़ाई लड़ने के मूड में हैं. उनकी इस मौजूदा स्थिति को कांग्रेस से अलगाव नहीं, बल्कि संगठन के भीतर जारी एक भयंकर राजनीतिक टकराव के रूप में देखा जाना चाहिए.