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28 की उम्र में पाली का ये युवा बना सरपंच, बचपन में ही सिर से उठा गया था माता-पिता का साया

राजस्थान के हिम्मत सिंह की कहानी संघर्ष, हौसले और जिम्मेदारी की मिसाल है. महज 9 साल की उम्र में पिता और 14 साल की उम्र में मां को खोने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी. दादा-दादी के सहारे पले-बढ़े हिम्मतसिंह ने 12वीं तक पढ़ाई की और महज 28 साल की उम्र में केरली ग्राम पंचायत के सरपंच चुने गए.

Written By Zee Rajasthan Web Team
Published: Oct 27, 2026, 06:01 PM IST | Updated: Oct 27, 2026, 06:57 PM IST
Image Credit: हिम्मत सिंह
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कुछ कहानियां संघर्ष की आग में तपकर निखरने वाले उस हौसले की होती हैं, जो हालात के आगे झुकना नहीं जानता. यह कहानी है एक ऐसे युवा की, जिसने जिंदगी के शुरुआती दौर में ही अपनों को खोने का दर्द सहा, लेकिन अपने हौसले को कभी टूटने नहीं दिए, जिनका नाम हिम्मत सिंह है.

महज 28 वर्ष की उम्र में केरली ग्राम पंचायत का सरपंच चुना गया. यह युवा इस बात की मिसाल है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियां भी रास्ता नहीं रोक सकतीं.

बचपन से ही संघर्षों से भरी रही हिम्मत सिंह की जिंदगी
हिम्मत सिंह की जिंदगी में बचपन खुशियों के साथ नहीं, बल्कि संघर्ष और जिम्मेदारियों के साथ आगे बढ़ा. महज 9 वर्ष की उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया. अभी पिता के जाने का दर्द कम भी नहीं हुआ था कि 14 वर्ष की उम्र में मां का साथ भी छूट गया. जिस उम्र में बच्चे मां-बाप की उंगली पकड़कर जिंदगी के रास्ते सीखते हैं, उस उम्र में हिम्मत सिंह ने अपनों के बिना जीना सीखा.

दादा-दादी बने जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा
जिंदगी ने एक के बाद एक ऐसे घाव दिए, जिनसे किसी का भी हौसला टूट सकता था लेकिन हिम्मत सिंह के जीवन में दादा-दादी का सहारा बाकी था. वही उनके अपने थे, वही उनका परिवार और वही उनके जीवन की उम्मीद. दर्द गहरा था, हालात कठिन थे लेकिन हिम्मतसिंह ने हार मानना नहीं सीखा.

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12वीं तक की पढ़ाई, दूसरों की मदद करने का जज्बा
सीमित परिस्थितियों के बीच हिम्मतसिंह ने बारहवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की लेकिन उनके जीवन की असली पहचान केवल उनकी पढ़ाई नहीं थी. उनकी पहचान दूसरों के काम आने की भावना थी. शायद उन्हें भी नहीं पता था कि सेवा की यही छोटी-छोटी कोशिशें एक दिन उन्हें गांव की सबसे बड़ी जिम्मेदारी तक पहुंचा देंगी.

संघर्षों से निकलकर बने गांव की उम्मीद
जिस युवक ने बचपन में अपनों को खोने का दर्द सहा, आज वही अपने गांव के लोगों की उम्मीदों और जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर लेकर आगे बढ़ रहा है. यह सफर बताता है कि नेतृत्व केवल उम्र या अनुभव के वर्षों से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, सेवा की भावना और जिम्मेदारी निभाने के संकल्प से भी पहचाना जाता है. हिम्मत सिंह के सामने अब एक नई चुनौती है- गांव की अपेक्षाओं पर खरा उतरना और जनविश्वास को विकास के कार्यों में बदलना.

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दादी-पोता बनें एक-दूसरे का सहारा
हिम्मत सिंह की कहानी का सबसे भावुक पहलू अपने दादा-दादी के प्रति उनका समर्पण है. जिन दादा-दादी ने कठिन समय में उन्हें सहारा दिया, उनके लिए हिम्मत सिंह का लगाव और सेवा किसी मिसाल से कम नहीं है लेकिन वक्त ने एक और परीक्षा ली. दादा का भी निधन हो गया. अब दादी और पोता दोनों ही एक-दूसरे के जीवन का सबसे बड़ा सहारा हैं.

यह कहानी सिर्फ हिम्मत सिंह की नहीं है, यह हर उस इंसान के लिए एक संदेश है, जो मुश्किल हालात में भी अपने सपनों को जिंदा रखता है क्योंकि जिंदगी में बड़ा बनने के लिए हमेशा आसान रास्तों की जरूरत नहीं होती. जरूरत होती है मजबूत इरादों, अपनों के प्रति सम्मान और दूसरों के लिए कुछ कर गुजरने के जज्बे की.

Reporter- Sandeep Rathore

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