सूखे की आहट के बीच 100 साल पुरानी 'मास्टरस्ट्रोक' फाइल : जब पंजाब ने रोका पानी, तो बीकानेर के महाराजा ने रेगिस्तान में कैसे बहाई थी नदी ?
Rajasthan Water Crisis History : आज जब कमजोर मानसून, समय से पहले आती गर्मी और गहराते जल संकट ने पूरे देश की चिंता बढ़ा दी है, तो इतिहास की एक कूटनीतिक जीत हर किसी के लिए एक सबक है. जब पंजाब ने राजस्थान को पानी देने से आनाकानी की थी, तब बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने ब्रिटिश हुकूमत के साथ अपनी मजबूत पकड़ का इस्तेमाल कर 'गंग नहर' का निर्माण करवाया था. ये महज़ ईंट-गारे का ढांचा नहीं था, बल्कि भविष्य के भीषण जल संकट को भांपने वाली एक ऐसी अचूक 'दूरदृष्टि' थी, जिसने बंजर मरुस्थल को नखलिस्तान में बदल दिया.
Rajasthan Water Crisis History : आज जब हम देश के कई हिस्सों में सूखती नदियों, गिरते भूजल स्तर और पानी के लिए हाहाकार की ख़बरें पढ़ते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे भविष्य का सबसे बड़ा संकट हमारे दरवाज़े पर दस्तक दे रहा ह.। ऐसे में इतिहास के पन्नों में दर्ज एक कहानी हमें ये सिखाती है कि अगर शासक के पास दूरदृष्टि और दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो वो प्रकृति के सबसे कठोर प्रहार को भी मात दे सकता है. ये कहानी है आधुनिक भगीरथ कहे जाने वाले बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह की, जिन्होंने उस दौर में पंजाब से पानी छीनकर राजस्थान के तपते रेगिस्तान में नदी बहा दी थी, जब तकनीक और संसाधन आज के मुकाबले ना के बराबर थे.
छप्पनिया अकाल- जब मौतों ने बदल दी राजा की सोच
इस ऐतिहासिक जल क्रांति की नींव एक महाविनाश के बीच रखी गई थी. साल 1899-1900 (विक्रम संवत 1956) में राजपूताना ने एक ऐसा खौफनाक अकाल देखा, जिसे आज भी 'छप्पनिया अकाल' के नाम से जाना जाता है. बारिश की एक बूंद नहीं गिरी थी. कुएं सूख गए थे, फसलें खाक हो गई थीं और मवेशी तड़प-तड़प कर मर रहे थे. बीकानेर रियासत की लगभग एक-तिहाई आबादी इस अकाल और उसके बाद फैली महामारियों की भेंट चढ़ गई. उस समय महाराजा गंगा सिंह युवा थे. उन्होंने अपनी जनता को भूख और प्यास से दम तोड़ते देखा. उन्होंने अकाल राहत के बहुत से कार्य चलाए, लेकिन उन्हें ये गहराई से अहसास हो गया कि कुएं खुदवाना या राहत सामग्री बांटना केवल फौरी उपाय हैं. थार के इस रेगिस्तान को अगर हमेशा के लिए अकाल से बचाना है, तो यहां हिमालय का पानी लाना ही होगा.
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पंजाब की जिद और सतलुज का पानी
महाराजा गंगा सिंह का विजन साफ था. पंजाब से बहने वाली सतलुज नदी के पानी को नहर के ज़रिए बीकानेर तक लाना. लेकिन ये इतना आसान नहीं था. जब इस योजना का खाका तैयार हुआ, तो सबसे बड़ा रोड़ा बनकर खड़ा हुआ पंजाब. भौगोलिक और राजनीतिक तौर पर पंजाब का तर्क था कि सतलुज के पानी पर उसका पहला हक है. पंजाब प्रशासन और वहां के इंजीनियरों ने स्पष्ट कह दिया कि "रेगिस्तान को पानी क्यों दें ? वहां पानी सोखने वाली रेत के अलावा कुछ नहीं है, पानी बेकार हो जाएगा. पंजाब की ओर से राजस्थान (तब की बीकानेर रियासत) को पानी देने में भारी आनाकानी की गई. ये एक ऐसा गतिरोध था, जो किसी भी सामान्य शासक का हौसला तोड़ सकता था. लेकिन महाराजा गंगा सिंह कोई सामान्य शासक नहीं थे; वे एक चतुर कूटनीतिज्ञ भी थे.
1920 का ऐतिहासिक मास्टरस्ट्रोक
पंजाब के विरोध को देखते हुए महाराजा गंगा सिंह ने अपनी कूटनीतिक बिसात बिछाई. वे ब्रिटिश हुकूमत के चहेते थे और इंपीरियल वॉर कैबिनेट के एकमात्र गैर-श्वेत सदस्य भी रह चुके थे. प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए उनके योगदान के कारण वाइसरॉय से लेकर लंदन तक उनकी गहरी पैठ थी. गंगा सिंह ने इस प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए सीधे ब्रिटिश उच्चाधिकारियों और वायसराय पर दबाव बनाया. उन्होंने ये साबित किया कि पानी सिर्फ रियासतों की जागीर नहीं है, बल्कि ये अकाल से मरती हुई इंसानियत को बचाने का एकमात्र साधन है. उनके कूटनीतिक दबाव का ही नतीजा था कि आखिरकार 4 सितंबर 1920 को एक ऐतिहासिक 'सतलुज घाटी परियोजना समझौता' (Sutlej Valley Project Agreement) हुआ. इस त्रिपक्षीय समझौते पर ब्रिटिश सरकार, पंजाब सरकार, बहावलपुर रियासत और बीकानेर रियासत ने हस्ताक्षर किए. पंजाब की तमाम आपत्तियों को दरकिनार करते हुए, इस समझौते ने कानूनी और आधिकारिक तौर पर बीकानेर के लिए सतलुज नदी का पानी सुनिश्चित कर दिया यह महाराजा का वह 'मास्टरस्ट्रोक' था, जिसने रेगिस्तान की किस्मत हमेशा के लिए बदल दी.
रेत में नहर : एक इंजीनियरिंग चमत्कार
समझौता तो हो गया था, लेकिन असली चुनौती अब भी बाकी थी. रेतीले धोरों के बीच 129 किलोमीटर लंबी मुख्य नहर (और 1000 किलोमीटर से ज्यादा की वितरिकाएं) बनाना. तत्कालीन चीफ इंजीनियर ए.डब्लू.ई. स्टैंडली के नेतृत्व में काम शुरू हुआ. सबसे बड़ी समस्या यह थी कि रेतीली जमीन पानी सोख लेगी. महाराजा गंगा सिंह ने इसका भी नायाब हल निकाला. उन्होंने पूरी नहर को पक्का करने का फैसला किया. उस ज़माने में सीमेंट आसानी से उपलब्ध नहीं था, इसलिए नहर को पक्का करने के लिए बीकानेर के पास जिप्सम और चूने का इस्तेमाल किया गया. हजारों मजदूरों ने दिन-रात एक कर दिया. भयंकर गर्मी, रेत की आंधियों और बीमारियों से लड़ते हुए इस नहर का निर्माण किया गया.
मरुस्थल बन गया नखलिस्तान
आखिरकार 26 अक्टूबर 1927 को तत्कालीन वाइसरॉय लॉर्ड इरविन ने 'गंग नहर' का उद्घाटन किया. शिवपुर हेड (हुसैनीवाला) से जब सतलुज का पानी बीकानेर रियासत की सीमा में दाखिल हुआ, तो वो केवल पानी नहीं था, वह रेगिस्तान के लिए जीवन था. इस एक नहर ने राजस्थान के भूगोल और अर्थशास्त्र को बदलकर रख दिया. जिस इलाके में कभी केवल रेत उड़ती थी, वहां कपास, गेहूं और गन्ने की लहलहाती फसलें उगने लगीं. इस नहर के चलते ही श्रीगंगानगर जिले की स्थापना हुई, जो आज राजस्थान का 'अन्न का कटोरा' कहलाता है. अगर महाराज ने ज़िद नहीं की होती, तो आज का हरा-भरा श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ शायद आज भी सूखे रेत के टीले ही होते.
आज जब हम पानी की हर एक बूंद के लिए राज्यों को सुप्रीम कोर्ट और ट्रिब्यूनल में लड़ते देखते हैं, तब महाराजा गंगा सिंह की ये कोशिश और भी प्रासंगिक हो जाती है. उन्होंने जल प्रबंधन को राजनीति का नहीं, बल्कि अस्तित्व का मुद्दा माना था. गंग नहर सिर्फ ईंट-गारे और चूने का ढांचा नहीं है. ये एक शासक की उस दूरदृष्टि का स्मारक है, जिसने 100 साल पहले यह समझ लिया था कि आने वाले समय में सबसे बड़ा खजाना 'पानी' ही होगा.