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Jaipur News: राजस्थान की राजधानी जयपुर में जीजा को ब्लैकमेल कर 30 लाख रुपये मांगने का मामला सामने आया है. आरोप है कि युवक की साली लगभग चार साल तक उसके साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रही. वहीं, दोनों के अलग होने के बाद युवती ने कथित तौर पर झूठे रेप केस में फंसाने और बदनाम करने की धमकी देकर 30 लाख रुपये की मांग की. इस मामले से परेशान होकर युवक ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है.
पुलिस के अनुसार, शिकायतकर्ता युवक ने बताया कि आरोपी युवती उसकी साली है. दोनों साल 2022 से आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे थे. करीब चार साल साथ रहने के बाद साल 2026 में दोनों अलग हो गए. इसके बाद युवती ने युवक से 30 लाख रुपये की मांग की.
साली ने जीजा से ठगे 2 लाख रुपये, 28 लाख की और मांग
शिकायत में युवक ने आरोप लगाया कि रुपये देने से मना करने पर युवती ने उसे झूठे रेप केस में फंसाने और बदनाम करने की धमकी दी. आरोप है कि दबाव बनाकर युवती ने उससे 2 लाख रुपये भी ले लिए. इसके बाद बाकी 28 लाख रुपये देने के लिए लगातार धमकियां दे रही.
फोन कर बार-बार धमकाया
युवक का आरोप है कि उसे फोन कॉल के जरिए बार-बार धमकाया गया और झूठे मामले में फंसाने की बात कही गई. लगातार मिल रही धमकियों से परेशान होकर उसने पुलिस से शिकायत की.
पुलिस ने बताया कि कोर्ट के आदेश के बाद शुक्रवार शाम आरोपी युवती के खिलाफ ब्लैकमेलिंग सहित संबंधित धाराओं में मामला दर्ज कर लिया गया है. पुलिस अब शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच कर रही है और मामले से जुड़े साक्ष्यों को जुटाया जा रहा है.
लिव इन रिलेशन को लेकर क्या कहता है भारतीय कानून?
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप अपने आप में अपराध नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने वयस्कों के अपनी पसंद से साथ रहने के अधिकार को मान्यता दी है. हालांकि, हर लिव-इन संबंध को कानूनी रूप से 'विवाह के समान संबंध' नहीं माना जाता है.
लिव-इन रिलेशन को लेकर कानून की मुख्य बातें
दो बालिग सहमति से साथ रह सकते हैं. केवल शादी किए बिना साथ रहने के कारण इसे अपराध नहीं माना जाता.
हर लिव-इन को शादी के बराबर दर्जा नहीं मिलता. अदालत संबंध की अवधि, साझा घर, आर्थिक व्यवस्था, घरेलू जिम्मेदारियां, बच्चों की स्थिति, समाज में पति-पत्नी के रूप में पहचान और दोनों की मंशा जैसे पहलुओं को देख सकती है.
महिलाओं को कानूनी संरक्षण मिल सकता है. घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 में 'Relationship in the nature of marriage' को संरक्षण के दायरे में रखा गया है. इसमें साझा घर में रहने का अधिकार, संरक्षण आदेश, निवास आदेश और आर्थिक राहत जैसे प्रावधान हैं.
लिव-इन खत्म करना अपने आप में अपराध नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वैवाहिक संबंध और लिव-इन संबंध अलग कानूनी व्यवस्थाएं हैं, लिव-इन में कोई पक्ष संबंध खत्म करने का फैसला ले सकता है.
बच्चों के अधिकार अलग मुद्दा हैं. लंबे समय तक साथ रहने वाले जोड़े से जन्मे बच्चों की वैधता और संपत्ति/उत्तराधिकार जैसे सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में महत्वपूर्ण संरक्षण दिया है.