)
क्या है पूरा मामला ?
साल 1943 में सवाई राजा मानसिंह ने जयपुर मेटल्स एंड इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (JMEL) की स्थापना 1943 में जयपुर में की थी.ये फैक्ट्री कभी जयपुर की औद्योगिक पहचान हुआ करती थी.यहां तांबे और पीतल को गलाकर तार, बिजली के मीटर और टीवी के पार्ट्स बनाए जाते थे.इसी वजह से आम बोलचाल में इसे 'पीतल फैक्ट्री' या मेटल फैक्ट्री कहा जाने लगा. लेकिन साल 1997 के आते आते आर्थिक घाटे और प्रशासनिक लापरवाही के चलते फैक्ट्री के बंद होने की नौबत आ गयी. साल 2000 तक इसे पूरी तरह से बंद कर दिया गया. जिस दिन से फैक्ट्री बंद हुई, ये धरना जारी है.
आज कल के माहौल में जब आंदोलन बहुत उग्र हो गये है, अपनी बात को मनवाने के लिए सड़कों को जाम कर दिया जाता है.ट्रेन रोक दी जाती है, आगजनी की जाती है, पत्थरबाजी और हिंसा की जाती है. ऐसे में जयपुर में रेलवे स्टेशन के पास कुछ लोग पिछले 26 साल से धरना कर रहे है, वो भी पूरे धैर्य के साथ. लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था.
26 साल का संघर्ष, 450 साथियों की मौत और उम्मीदों का बोझ
जयपुर मेटल्स के मोहन जी बताते हैं कि "जब जयपुर मेटल्स (पीतल फैक्ट्री) पर ताला लगा तब मेरी उम्र 52 साल थी उस समय आंदोलन का रूप आज जैसा नहीं था हमने अपना हक पाने के लिए हर संभव कोशिश की, धरने दिए, उग्र प्रदर्शन किए लेकिन इस कीमती जमीन पर हर किसी की नीयत खराब थी,सब इसे बेचकर खा जाना चाहते थे. इन ढाई दशकों में हमने हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया इस दौरान प्रदेश में दो बार बीजेपी और दो बार कांग्रेस की सरकारें आईं और गईं, कभी थोड़ा आश्वासन मिला तो कभी अनदेखी हुई लेकिन किसी ने हमारा स्थायी समाधान नहीं निकाला शुरुआत में सभी मजदूर संगठन हमारे साथ थे और हमने एकजुट होकर बहुत संघर्ष किया लेकिन आज हालात यह हैं कि कुछ बुजुर्ग मजदूर ही यूनियन दफ्तर पर बैठते हैं और एक-दूसरे का दुख-दर्द बांटते हैं. सबसे बड़ा दर्द यह था कि जब फैक्ट्री बंद हुई तब अधिकांश मजदूरों की उम्र 50 के पार हो चुकी थी और कंधों पर परिवार की भारी जिम्मेदारियां थीं. उस उम्र में दूसरा रोजगार मिलना लगभग नामुमकिन था अगर नियम और उम्र के हिसाब से देखें तो आज भी करीब 200 से 250 लोग ऑनरोल की श्रेणी में आते हैं जो इस ढलती उम्र में भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि शायद अब भी उनका हक मिल जाए. बीते 26 सालों के लंबे इंतजार में हमें बकाया राशि के नाम पर सिर्फ 3 महीने की तनख्वाह ही नसीब हुई है साल 2000 के बाद से आज तक हमें फूटी कौड़ी नहीं मिली"
इंतजार में उठती अर्थियां और सफेद होते बाल
मोहन जी बताते हैं कि जब 1997-2000 के दौरान ये लड़ाई शुरू हुई, तब हमारे साथ कुल 1,558 मजदूर थे आज 26 साल बीत चुके हैं और इस लंबी जंग में हमारे 450 साथी न्याय की आस में दुनिया से विदा हो चुके हैं जो बचे हैं, वे अपने परिवार का पेट पालने के लिए इधर-उधर छोटा-मोटा काम करने को मजबूर हैं.जो मजदूर चले गये. उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई,बेटियों की शादी और बुढ़ापे के इलाज के लिए अपने जिस खून-पसीने की कमाई (बकाया राशि)का इंतजार किया,वो उन्हें जीते जी नसीब नहीं हुई. आज भी जब धरने पर बैठे इन बुजुर्गों से बात की जाती है,तो उनकी आंखों में अपने उन साथियों के लिए आंसू छलक आते हैं जो न्याय की आस में दुनिया छोड़ गए. लेकिन उनका जज्बा देखिए-जाने वाले चले गए,मगर जो बचे हैं,उन्होंने धरने की जगह को सूना नहीं होने दिया. वे आज भी अपने हक के लिए वहां डटे हैं.
आज जब युवा पीढ़ी छोटी-छोटी बातों पर अपना आपा खो बैठती है और आंदोलन के नाम पर उग्रता को सही ठहराने लगती है,तब उन्हें जयपुर के इस चौराहे पर आकर इन सफेद बालों वाले बुजुर्गों से मिलना चाहिए. इन मजदूरों ने साबित किया है कि लड़ाई केवल हथियारों या पत्थरों से नहीं लड़ी जाती. धैर्य और शांति से भी अपने हक की आवाज को जिंदा रखा जा सकता है