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Explainer: राजस्थान से शुरू हुई थी गांव की सत्ता! जानिए पंचायती राज की पूरी कहानी, कैसे चुने जाते हैं सरपंच से जिला प्रमुख तक

Explainer: राजस्थान के नागौर से 1959 में शुरू हुई पंचायती राज व्यवस्था तीन स्तरों पर काम करती है. जानिए ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद के चुनाव, आरक्षण, परिसीमन और प्रधान-जिला प्रमुख के चुनाव की पूरी प्रक्रिया.

Explainer: राजस्थान से शुरू हुई थी गांव की सत्ता! जानिए पंचायती राज की पूरी कहानी, कैसे चुने जाते हैं सरपंच से जिला प्रमुख तक
Image Credit: राजस्थान के नागौर से शुरू हुई थी देश की पहली त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था.

Explainer: भारत में आम आदमी को शासन व्यवस्था में सीधे भागीदारी देने की शुरुआत राजस्थान से हुई थी. 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले से देश की पहली त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था शुरू हुई. इस व्यवस्था का खाका तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष बलवंत राय मेहता का भी राजस्थान के उदयपुर से गहरा नाता रहा है.

पंचायती राज का मूल उद्देश्य यह है कि गांव के विकास से जुड़े फैसले केवल दिल्ली या जयपुर में बैठी सरकारें न लें बल्कि गांव के लोग भी अपनी जरूरतों और प्राथमिकताओं के अनुसार विकास की दिशा तय करें. लेकिन यह व्यवस्था जमीन पर किस तरह काम करती है? इसके चुनाव कैसे होते हैं? परिसीमन और आरक्षण का क्या असर पड़ता है? और पंचायत चुनाव शहरी निकायों के चुनाव से किस तरह अलग हैं? आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं.

पंचायती राज के तीन स्तर क्या हैं?
पंचायती राज व्यवस्था तीन स्तरों पर काम करती है. ये तीनों स्तर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और गांव से लेकर जिले तक विकास व्यवस्था को आगे बढ़ाते हैं.

1. ग्राम पंचायत
ग्राम पंचायत पंचायती राज व्यवस्था का सबसे निचला स्तर है. यह सीधे गांव के स्तर पर काम करती है. इसमें वार्ड पंच और सरपंच होते हैं.

गांव में पानी, बिजली, साफ-सफाई, मनरेगा से जुड़े काम और छोटी-मोटी सड़कों के निर्माण जैसे कार्य ग्राम पंचायत के जिम्मे होते हैं. यानी ग्रामीण स्तर पर लोगों की रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों से जुड़े कई काम ग्राम पंचायत के माध्यम से किए जाते हैं.

2. पंचायत समिति
पंचायत समिति मध्यम स्तर की व्यवस्था है और ब्लॉक स्तर पर काम करती है. यह ग्राम पंचायत और जिला परिषद के बीच एक पुल की भूमिका निभाती है. कई ग्राम पंचायतों को मिलाकर एक पंचायत समिति बनाई जाती है.

इसका काम ग्राम पंचायतों के विकास कार्यों की निगरानी करना, उनके लिए बजट पास करना और सरकारी योजनाओं को ब्लॉक स्तर पर लागू करना है.

3. जिला परिषद
जिला परिषद पंचायती राज व्यवस्था का शीर्ष स्तर है. यह पूरे जिले के स्तर पर काम करती है. जिले की पंचायत समितियों के विकास कार्यों का खाका तैयार करना, राज्य और केंद्र सरकार से आने वाले बजट को पंचायत समितियों में बांटना और बड़े प्रोजेक्ट्स को मंजूरी देना इसके प्रमुख काम हैं.

पंचायत समिति और जिला परिषद के सदस्य कैसे चुने जाते हैं?
पंचायत चुनाव के दौरान ग्रामीण मतदाता एक साथ कई स्तरों के प्रतिनिधियों को चुनते हैं. आम वोटर वार्ड पंच और सरपंच के साथ पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य के लिए भी सीधे मतदान करता है.

पंचायत समिति के सदस्यों को आम बोलचाल में CR या डायरेक्टर भी कहा जाता है. इन सदस्यों और जिला परिषद सदस्यों का चुनाव जनता सीधे अपने वोट से करती है. मतदान ईवीएम या बैलेट पेपर के जरिए हो सकता है.

प्रधान और जिला प्रमुख का चुनाव कैसे होता है?
प्रधान और जिला प्रमुख का चुनाव जनता सीधे नहीं करती. इन पदों के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव होता है.

जनता द्वारा चुने गए पंचायत समिति सदस्य चुनाव जीतने के बाद अपनी पहली बैठक में अपने बीच से एक व्यक्ति को प्रधान और दूसरे को उप-प्रधान चुनते हैं. इसी तरह जिला परिषद के लिए जनता द्वारा चुने गए सदस्य अपने बीच से वोटिंग के जरिए जिला प्रमुख और उप-प्रमुख का चुनाव करते हैं. इस तरह जनता सीधे सदस्यों का चुनाव करती है, जबकि प्रधान और जिला प्रमुख का चयन चुने हुए सदस्य करते हैं.

परिसीमन क्या है और इसका क्या असर होता है?
परिसीमन का अर्थ चुनाव के लिए क्षेत्रों और उनकी सीमाओं का निर्धारण करना है. समय के साथ गांवों की आबादी बढ़ती है. ऐसे में चुनाव से पहले जनसंख्या के आधार पर ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद के क्षेत्रों तथा वार्डों का बंटवारा किया जाता है.

इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि हर प्रतिनिधि लगभग समान जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करे. यदि किसी ब्लॉक की आबादी काफी बढ़ जाती है, तो वहां पंचायत समिति के सदस्यों के वार्डों की संख्या बढ़ाई जा सकती है.

इसी प्रक्रिया के तहत बड़ी पंचायतों को विभाजित करके नई ग्राम पंचायतें भी बनाई जा सकती हैं. इसलिए परिसीमन का सीधा असर चुनावी क्षेत्रों और प्रतिनिधित्व की संरचना पर पड़ता है.

SC, ST, OBC और महिलाओं के लिए आरक्षण
पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण के जरिए समाज के अलग-अलग वर्गों को राजनीतिक भागीदारी का अवसर दिया गया है.

पंचायत समिति और जिला परिषद के वार्डों के साथ प्रधान और जिला प्रमुख के पदों पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए उनकी आबादी के अनुपात में सीटें आरक्षित की जाती हैं.

राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत पद आरक्षित हैं. इसका मतलब है कि आधे वार्डों और आधे प्रधान तथा जिला प्रमुख के पदों पर केवल महिलाएं चुनाव लड़ सकती हैं.

कौन सी सीट किस वर्ग के लिए आरक्षित होगी, यह लॉटरी या रोटेशन सिस्टम के जरिए तय होता है. हर चुनाव में यह चक्र बदलता रहता है, जिससे अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न वर्गों को नेतृत्व का अवसर मिल सके.

बहुमत नहीं मिलने पर क्या होता है?
प्रधान या जिला प्रमुख बनने के लिए कुल सदस्यों में 50 प्रतिशत से अधिक का समर्थन जरूरी होता है. यदि किसी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो बहुमत जुटाने के लिए गठबंधन की कोशिश की जाती है.

राजनीतिक दल निर्दलीय या छोटी पार्टियों से जीतकर आए सदस्यों का समर्थन हासिल करने का प्रयास करते हैं. इसी दौरान सदस्यों की बाड़ेबंदी, जिसे आम तौर पर रिसॉर्ट पॉलिटिक्स कहा जाता है, भी देखने को मिलती है. इसका उद्देश्य क्रॉस-वोटिंग की संभावना को रोकना होता है.

बराबर वोट मिलने पर कैसे होता है फैसला?
यदि प्रधान या जिला प्रमुख के चुनाव में दोनों उम्मीदवारों को बराबर वोट मिलते हैं, तो विजेता का फैसला लॉटरी के जरिए किया जाता है. उदाहरण के तौर पर यदि 20 सदस्यों में दोनों उम्मीदवारों को 10-10 वोट मिलते हैं, तो पर्ची निकाली जाती है. जिस उम्मीदवार के नाम की पर्ची निकलती है, उसे विजेता माना जाता है.

पंचायत और शहरी निकाय में क्या अंतर है?
भारत के संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के तहत ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए अलग-अलग स्थानीय शासन व्यवस्थाएं बनाई गईं. 73वें संशोधन के तहत ग्राम पंचायत जैसी ग्रामीण स्थानीय संस्थाओं की व्यवस्था है. इनका संबंध कृषि, ग्रामीण विकास, पशुपालन और गांव की बुनियादी जरूरतों से जुड़े कार्यों से है.

वहीं 74वें संशोधन के तहत नगर पालिका, नगर परिषद और नगर निगम जैसे शहरी निकाय आते हैं. इनका काम शहरी नियोजन, फायर ब्रिगेड, सीवरेज, बड़े पार्क और शहरी ट्रैफिक मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों से जुड़ा है.

दोनों के चुनाव अलग-अलग क्यों होते हैं?
गांव और शहरों की भौगोलिक सीमाएं, वार्ड संरचना और वोटर लिस्ट अलग होती हैं. इसी वजह से पंचायत और शहरी निकायों के चुनावों की व्यवस्थाएं भी अलग रहती हैं. कानूनी ढांचे में भी अंतर है. ग्राम पंचायतें पंचायती राज अधिनियम के तहत काम करती हैं, जबकि शहरी निकाय नगर पालिका अधिनियम के तहत काम करते हैं.

इसके अलावा पूरे प्रदेश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के करोड़ों मतदाताओं का चुनाव एक ही समय पर कराना प्रशासनिक रूप से बेहद जटिल है. पुलिस बल, ईवीएम और प्रशासनिक अधिकारियों की उपलब्धता को देखते हुए दोनों चुनाव अलग-अलग समय पर कराए जाते हैं.

लोकतंत्र की जमीनी नींव है पंचायती राज
पंचायती राज केवल चुनाव कराने की व्यवस्था नहीं है. यह वह व्यवस्था है जिसके जरिए आम आदमी स्थानीय शासन और विकास प्रक्रिया का सीधा हिस्सा बनता है. राजस्थान के नागौर से 2 अक्टूबर 1959 को शुरू हुई त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था गांव से जिले तक लोकतांत्रिक भागीदारी का ढांचा तैयार करती है.

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About the Author

Sandhya Yadav

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लखनऊ यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में मास्टर्स की डिग्री हासिल करने वाली संध्या ने Zee News से पहले Newstrack और ETV Bharat जैसे प्रतिष्ठित डिजिटल न्यूज़ संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं. जमीनी खबरों की गहरी समझ रखने वाली संध्या ने राजस्थान विधानसभा चुनाव, पंचायत चुनाव, गहलोत-पायलट राजनीतिक संकट और कोविड-19 महामारी समेत कई बड़े और जटिल घटनाक्रमों की बेहतरीन कवरेज की है.आप संध्या यादव से सीधे SANDHYA.YADAV@zeemedia.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा राजस्थान की खबरों के रियल-टाइम अपडेट्स के लिए आप उनसे लिंक्डइन (https://in.linkedin.com/in/sandhya-yadav-5734ba144) पर भी कनेक्ट कर सकते हैं.
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