दिवाली पर बीकानेर में गूंजती है उर्दू रामायण, हिंदू-मुस्लिम एकता की अनूठी मिसाल बनी यह परंपरा
बीकानेर में दिवाली पर 1935 में लिखी गई उर्दू रामायण का वाचन होता है. महज 9 पन्नों की इस गोल्ड मेडल विजेता नज्म में पूरी रामकथा समाई है, जिसे करीब 30 मिनट में पढ़ा जाता है.
बीकानेर में दिवाली पर उर्दू में लिखी रामायण का वाचन होता है. उर्दू के अल्फाज और रामकथा का भावपूर्ण वर्णन इस आयोजन को खास बनाते हैं. पर्यटन लेखक संघ और महफिले अदब कई वर्षों से हर दिवाली पर इसका वाचन कर रहे हैं. यह प्रस्तुति सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश भी देती है.
1935 में बीकानेर में लिखी गई थी रामायण
इस उर्दू रामायण की रचना वर्ष 1935 में बादशाह हुसैन खां राना ने की थी. उस समय राना बीकानेर में उर्दू के प्रोफेसर थे. वे महाराजा गंगासिंह के उर्दू-फारसी के फरमानों का अनुवाद भी किया करते थे. उनकी लिखी रामायण को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की अखिल भारतीय प्रतियोगिता में पहला स्थान मिला और गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया.
तुलसीदास जयंती पर आयोजित इस प्रतियोगिता में उर्दू में रामायण नज्म लिखकर भेजनी थी. राना साहिब की रचना को देशभर में प्रथम स्थान मिला. इसके बाद बीकानेर के नागरी भंडार में समारोह हुआ. इसमें महाराजा गंगासिंह ने राना साहिब से उर्दू रामायण सुनी. विश्वविद्यालय की ओर से वरिष्ठ उर्दू साहित्यकार सर तेज बहादुर सप्रू ने उन्हें गोल्ड मेडल प्रदान किया.
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नौ पन्नों में समाई पूरी रामकथा
इस रामायण की खासियत इसकी संक्षिप्तता है. यह केवल नौ पृष्ठों की है. छह-छह पंक्तियों वाले छंदों में पूरी रामकथा समेटी गई है. इसे करीब 30 मिनट में पढ़ा जा सकता है.
इसकी मूल प्रति फिलहाल उपलब्ध नहीं है. वाचक डॉ. जिया उल हसन कादरी बताते हैं कि राना साहिब पर लिखी पुस्तक के आधार पर इसका पाठ होता है. डॉ. जिया उल हसन कादरी, जाकिर अदीब और असद अली असद वाचन करते हैं. श्रोता कई पंक्तियां दोबारा सुनाने का आग्रह भी करते हैं.
सीता की पीड़ा और युद्ध का प्रभावशाली वर्णन
रामायण की कुछ पंक्तियां सीता के दुख को उर्दू के अंदाज में सामने रखती हैं. इनमें से एक है-
'रंजो हसरत की घटा सीता के दिल पर छा गई
गोया जूही की कली थी, ओस से मुरझा गई'
युद्ध और लंका के विनाश का वर्णन करती पंक्तियां भी खास हैं-
'थोड़े दिन में जंग के भी साजो सामां हो गए
खून से रंगीन सब कोहो बियाबां हो गए'
आगे हनुमान की भूमिका और सीता की पीड़ा का जिक्र है:
'देखने को जाहिरा हनुमान जी की चल गई
वरना सीता की ये आहें थीं कि लंका जल गई'
नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश
इस उर्दू रामायण का अंग्रेजी अनुवाद दिल्ली के जाकिर हुसैन कॉलेज की प्रोफेसर डॉ. मुकुल चतुर्वेदी ने किया है. आयोजकों का मानना है कि इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है.
इस रचना को लेकर बीकानेर में हर साल उत्सुकता रहती है. इसकी प्रस्तुति आम रामायण पाठ से अलग है, क्योंकि कथा उर्दू नज्म के रूप में कही जाती है. श्रोताओं को इसमें भाषा की मिठास और कथा के भाव सुनने को मिलते हैं. आयोजक इस परंपरा को लगातार आगे बढ़ा रहे हैं. राना साहिब की रचना आज भी साहित्य और साझा विरासत की चर्चा में जगह बनाए हुए है.
बीकानेर में दिवाली पर होने वाला यह वाचन सिर्फ साहित्यिक कार्यक्रम नहीं है. यह बताता है कि रामकथा को अलग-अलग भाषाओं में भी श्रद्धा और संवेदना के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है. उर्दू रामायण साझा संस्कृति, भाषाई एकता और सांप्रदायिक सद्भाव का सुंदर उदाहरण है.
Reporter- Rounak Vyas