Alwar Nikay Chunav : ना भाजपा ना कांग्रेस, निर्दलीयों के हाथ सत्ता की चाबी, जानें कैसे ?
Alwar Nikay Chunav : अलवर के नगर निकाय चुनाव परिणामों ने भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही प्रमुख दलों को बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है. जिले के 12 निकायों में भाजपा को केवल नौगांवा और खेड़ली में स्पष्ट बहुमत मिल सका, जबकि बाकी निकायों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने दोनों दलों के समीकरण बिगाड़ते हुए सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखी है. सबसे बड़ा उलटफेर राजगढ़ में देखने को मिला, जहां 40 वार्डों में से 31 पर निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की. भाजपा महज 6 और कांग्रेस 3 सीटों पर सिमट गई.
Alwar Nikay Chunav : अलवर में राजगढ़, थानागाजी और कठूमर पुरानी नगर पालिकाएं हैं, जबकि मालाखेड़ा, नौगांवा, रामगढ़, बड़ौदामेव, गोविंदगढ़, लक्ष्मणगढ़ सहित अन्य निकायों में पहली बार चुनाव हुए हैं. वहीं, अलवर नगर निगम के गठन के बाद यह पहला नगर निगम चुनाव था. नतीजों ने साफ कर दिया कि स्थानीय निकाय चुनाव में मतदाताओं ने कई जगह पार्टी के बजाय प्रत्याशी और स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी.
राजगढ़ में केंद्रीय विद्यालय का मुद्दा भाजपा-कांग्रेस पर भारी
राजगढ़ में केंद्रीय विद्यालय का मुद्दा चुनाव में सबसे प्रभावी रहा. केंद्रीय विद्यालय की मांग को लेकर करीब नौ महीने से आंदोलन चल रहा है. आवाज मंच से जुड़े लोगों ने घर-घर और प्रतिष्ठानों पर ‘केंद्रीय विद्यालय नहीं तो वोट नहीं’ के पोस्टर लगाए. 15 अगस्त की तिरंगा रैली में भी यही नारा प्रमुखता से दिखाई दिया. चुनाव में इसका सीधा असर भाजपा और कांग्रेस दोनों पर पड़ा. हालत ये रही कि भाजपा को कई वार्डों में टिकट लेने के लिए भी पूरे दावेदार नहीं मिले. राजगढ़ के लिए स्वीकृत केंद्रीय विद्यालय को रैणी के दलालपुरा में खोले जाने का विरोध आंदोलन का मुख्य आधार बना.
नौगांवा में भाजपा की रणनीति सफल
नौगांवा भाजपा के लिए जिले में सबसे मजबूत प्रदर्शन वाला निकाय रहा. पार्टी ने टिकट वितरण में स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखा. वार्ड 17 और 19 को एससी के लिए आरक्षित किए जाने का विरोध भी हुआ, क्योंकि इन वार्डों में एससी मतदाताओं की संख्या नहीं थी. इसके बावजूद भाजपा ने यहां बेहतर प्रदर्शन किया. वार्ड 19 से भाजपा प्रत्याशी राजेश सिंह पहले ही निर्विरोध निर्वाचित हो चुके थे. परिणामस्वरूप नौगांवा में भाजपा स्पष्ट बहुमत हासिल करने में सफल रही.
रामगढ़ में टिकट वितरण का असंतोष पड़ा भारी
रामगढ़ में भाजपा ने 35 में से 28 वार्डों में ही प्रत्याशी उतारे. इनमें से 13 प्रत्याशी जीतने में सफल रहे. टिकट वितरण को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं में असंतोष रहा और कई बागी प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतर गए. इनमें से अधिकांश बागियों ने जीत दर्ज कर पार्टी के समीकरण बिगाड़ दिए. कांग्रेस ने भी संभावित विरोध से बचने के लिए केवल 20 वार्डों में प्रत्याशी उतारे. कुछ पुराने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ने के बजाय निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान संभाला.
मालाखेड़ा में कांग्रेस का गढ़ भी नहीं बचा सका पार्टी को
मालाखेड़ा लंबे समय से कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन इस चुनाव में निर्दलीयों का दबदबा देखने को मिला. भाजपा के पास मजबूत स्थानीय नेतृत्व और प्रभावशाली चेहरों की कमी का असर टिकट वितरण में भी दिखाई दिया. कांग्रेस के लिए सबसे शर्मनाक स्थिति वार्ड 9 में रही, जहां उसके प्रत्याशी नरेश जोशी को एक भी वोट नहीं मिला. परिणामों ने कांग्रेस के परंपरागत प्रभाव वाले क्षेत्र में भी बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत दिया.
बहादुरपुर में कांग्रेस की गुटबाजी ने बिगाड़ा गणित
बहादुरपुर में कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी और बागियों ने पार्टी का समीकरण बिगाड़ दिया. दूसरी ओर भाजपा ने अपेक्षाकृत मजबूती से चुनाव लड़ा. इसके बावजूद भाजपा बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी। यहां भी निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका निर्णायक बन गई.
लक्ष्मणगढ़ में दोनों दलों से दूर रहे मतदाता
लक्ष्मणगढ़ में भाजपा ने 25 में से केवल 20 वार्डों में प्रत्याशी उतारे, जबकि कांग्रेस महज 13 वार्डों में चुनाव लड़ सकी. दोनों प्रमुख दलों के सीमित प्रत्याशी और कमजोर संगठनात्मक तैयारी का लाभ निर्दलीयों को मिला. यहां 14 निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की. नतीजों से स्पष्ट है कि मतदाताओं ने कई वार्डों में पार्टी के बजाय स्थानीय चेहरों पर भरोसा जताया.
गोविंदगढ़ में सुखवंत की प्रतिष्ठा दांव पर, भाजपा सबसे बड़ी पार्टी
गोविंदगढ़ को रामगढ़ विधायक सुखवंत सिंह का गृहक्षेत्र माना जाता है, इसलिए यहां उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा भी दांव पर थी. भाजपा ने 25 में से 23 वार्डों में प्रत्याशी उतारे और 12 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी. कांग्रेस ने केवल 12 वार्डों में चुनाव लड़ा और उसे सिर्फ 2 सीटें मिलीं. हालांकि भाजपा बहुमत से एक सीट दूर रह गई, ऐसे में निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका निर्णायक होगी.
थानागाजी में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी, लेकिन बहुमत से दो कदम दूर
थानागाजी में पिछले कांग्रेस बोर्ड के दौरान विकास को लेकर लोगों में नाराजगी का असर चुनाव परिणामों में दिखाई दिया. कांग्रेस में टिकट वितरण को लेकर भी फूट रही और पार्टी ने 25 में से 23 वार्डों में ही प्रत्याशी उतारे. भाजपा का टिकट वितरण अपेक्षाकृत बेहतर रहा और उसे 11 सीटें मिलीं कांग्रेस 7 सीटों पर सिमट गई। हालांकि भाजपा बहुमत के लिए जरूरी आंकड़े से दो सीट दूर है, इसलिए निर्दलीय प्रत्याशी यहां भी सत्ता की दिशा तय करेंगे.
बड़ौदामेव में बागियों ने दोनों दलों को दिया झटका
बड़ौदामेव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही टिकट वितरण को लेकर विवादों में रहीं. स्थानीय दावेदारों की जगह दूसरे वार्डों से जुड़े लोगों को टिकट दिए जाने का विरोध हुआ। दोनों दलों के बागी प्रत्याशियों ने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के सामने चुनौती पेश की और चुनावी समीकरणों को प्रभावित किया. परिणामस्वरूप किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका.
कठूमर में विकास का मुद्दा भाजपा पर भारी
कठूमर में विकास के मुद्दे को लेकर भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा. भाजपा केवल 5 सीटों पर जीत दर्ज कर सकी, जबकि कांग्रेस ने 10 सीटें जीतकर बढ़त बनाई. भरतपुर सांसद संजना जाटव की सक्रियता का लाभ कांग्रेस को मिला। कठूमर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.
खेड़ली में भाजपा का गढ़ बरकरार
खेड़ली भाजपा का परंपरागत मजबूत क्षेत्र रहा है और इस चुनाव में भी पार्टी ने अपना दबदबा कायम रखा. पिछले चुनाव में भाजपा को 13 सीटें मिली थीं. इस बार भी पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए बहुमत हासिल किया. स्थानीय स्तर पर खींची परिवार के प्रभाव का असर भी दिखाई दिया. वार्ड 10 और 17 में भाजपा प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हुए. वहीं कांग्रेस का टिकट वितरण पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित हुआ.
छह विधायकों की प्रतिष्ठा भी लगी थी दांव पर
निकाय चुनावों में अलवर जिले के छह विधायकों की राजनीतिक प्रतिष्ठा भी दांव पर थी. पार्टियों ने कई क्षेत्रों में विधायकों को चुनाव संचालन की जिम्मेदारी सौंपी थी. रामगढ़ विधायक सुखवंत सिंह अपने क्षेत्र की रामगढ़, नौगांवा, गोविंदगढ़ और बड़ौदामेव में से केवल नौगांवा में भाजपा को स्पष्ट बहुमत दिला सके. कठूमर विधायक रमेश खींची भी कठूमर और खेड़ली में से केवल खेड़ली में पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिलाने में सफल रहे.
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली अपने प्रभाव वाले मालाखेड़ा और बहादुरपुर, दोनों निकायों में कांग्रेस को बहुमत नहीं दिला सके. राजगढ़-लक्ष्मणगढ़ विधायक मांगेलाल मीणा के क्षेत्र में भी कांग्रेस की स्थिति कमजोर रही. लक्ष्मणगढ़ में कांग्रेस को सिर्फ 4 और राजगढ़ में 3 सीटें मिलीं। थानागाजी विधायक कांति मीणा के क्षेत्र में भाजपा 11 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि कांग्रेस को केवल 7 सीटें मिलीं. अलवर नगर निगम में भी भाजपा स्पष्ट बहुमत से पांच सीट दूर रह गई. ऐसे में वन राज्यमंत्री और अलवर विधायक संजय शर्मा के सामने भी बोर्ड गठन की चुनौती बनी हुई है. कुल मिलाकर निकाय चुनाव के नतीजों ने अलवर की राजनीति में एक अहम संकेत दिया है. मतदाताओं ने कई जगह भाजपा और कांग्रेस के बजाय स्थानीय मुद्दों, प्रत्याशियों और बागियों को तरजीह दी. ये वजह है कि जिले के अधिकांश निकायों में बोर्ड गठन का रास्ता निर्दलीयों के समर्थन से होकर गुजरने वाला है.