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नींद की कमी और 36 घंटे की ड्यूटी, कैसे किसी स्वस्थ इंसान के मानसिक संतुलन को तहस-नहस कर देती है ?

जोधपुर एम्स में डॉक्टर की मौत के बाद से वहां का माहौल सुलग रहा है. रेजिडेंट डॉक्टर लगातार बता रहे हैं कि मौत के पीछे कोई बीमारी नहीं,बल्कि संस्थान का वर्क प्रेशर है,सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियोज़ में रेजिडेंट्स का दर्द साफ झलक रहा है,जिसमें 30 से 36 घंटे तक लगातार काम कराये जाना बताया जा रहा है. जिससे एक बहुत बड़ा और बुनियादी सवाल खड़ा होता है, कि क्या वाकई कोई इंसान,वो भी मेडिकल फील्ड जैसे क्रिटिकल पेशे में,लगातार 30-36 घंटे तक काम कर सकता है ? और अगर वो विभाग एनेस्थीसिया का हो,तो ये खतरा कई गुना ज्यादा भयानक हो जाता है.

Written By Pragati Pant Awasthi
Published: Sep 24, 2026, 01:25 PM IST | Updated: Sep 24, 2026, 02:13 PM IST
Image Credit: AI
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किसी भी अस्पताल में सर्जन को ऑपरेशन थिएटर का 'हीरो' माना जाता है,लेकिन उस ऑपरेशन की सफलता की असली नींव एनेस्थीसिया विभाग पर टिकी होती है. सर्जन तब तक चीर-फाड़ नहीं कर सकता जब तक एनेस्थीसिया स्पेशलिस्ट मरीज को सुलाकर उसके वाइटल साइंस (जैसे ब्लड प्रेशर,ऑक्सीजन लेवल और पल्स) को लगातार मॉनिटर न कर रहा हो.

ये विभाग अस्पताल का सबसे नाजुक हिस्सा क्यों है ?
इस डिपार्टमेंट में दवा की एक-एक मिलीग्राम की मात्रा मरीज की उम्र, वजन और मेडिकल हिस्ट्री देखकर तय होती है. अगर दवा थोड़ी भी ज्यादा हो गई,तो मरीज हमेशा के लिए कॉमा में जा सकता है या उसकी सांसें रुक सकती हैं. अगर कम रह गई,तो ऑपरेशन के बीच में ही मरीज को होश आ सकता है या असहनीय दर्द का झटका लग सकता है.ये ही वजह है कि इस विभाग में काम करने वाले डॉक्टर के लिए हर एक सेकंड सतर्क रहने का होता है. लेकिन ज़रा सोचिए,जिस डॉक्टर के हाथ में किसी की सांसों की डोर हो,वो खुद अगर पिछले 30 या 36 घंटे से सोया न हो, तो उसके शरीर और दिमाग पर क्या गुजरती होगी ?

साइंस क्या कहती है ? 
नींद की कमी और लगातार काम के प्रभावों को लेकर CDC (अमेरिकन सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्वेंशन) और NIOSH की रिसर्च में कई चौंकाने वाली बाते सामने आई हैं कि जैसे-जैसे काम के घंटे बढ़ते हैं, शरीर का सिस्टम  जवाब देने लगता है.

लगातार 10 घंटे काम करने के बाद 
मानक 8 घंटे की सीमा पार करने के बाद ही शरीर में मानसिक थकान शुरू हो जाती है. इस चरण में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम होने लगती है,आंखों में भारीपन महसूस होता है और रिएक्शन टाइम थोड़ा धीमा पड़ जाता है. हालांकि, थोड़ी नींद इस थकान को दूर कर सकती है.

लगातार 20 घंटे काम करने के बाद 
न्यूरोलॉजिकल रिसर्च बताती है कि 17 से 20 घंटे लगातार जागने से इंसान के दिमाग को ठीक वैसी ही स्थिति में ले आता है, जैसे उसने शराब पी रखी हो (लगभग 0.05% से 0.08% ब्लड अल्कोहल कंसंट्रेशन) इसको ब्रेन फॉग' भी कहा जाता है. यानी किसी एक बात पर फोकस करना मुश्किल हो जाता है.शरीर में तनाव वाले हॉर्मोन्स (कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन) बाढ़ की तरह आ जाते हैं, जिससे ब्लड प्रेशर और दिल की धड़कन तेज हो सकती हैं. इस दौरान 'माइक्रो-स्लीप' यानी की ना चाहते हुए भी कुछ सेकंड के लिए झपकी आ सकती है.

लगातार 30 घंटे काम करने के बाद 
मेडिकल जनरल्स और स्लीप स्टडीज के मुताबिक, 24 से 30 घंटे तक बिल्कुल नहीं सोने से मस्तिष्क की बाहरी संकेतों को समझने की ताकत (कॉर्टिकल रिस्पॉन्सिवनेस) जवाब दे जाती है. डॉक्टर या कोई भी पेशेवर इंसान इस हालत में सिर्फ एक मशीन की तरह हरकत करता है,उसकी सोचने-समझने की क्षमता ही खत्म हो जाती है.शरीर का टेम्परेचर और ब्लड सर्कुलेशन कंट्रोल करने वाला सिस्टम गड़बड़ा जाता है.अत्यधिक थकान के चलते सिरदर्द, अत्यधिक चिड़चिड़ापन और कई बार ऐसी चीजें दिखने या महसूस होने लगती हैं जो वास्तव में होती ही नहीं हैं.

यानी कि 30 या 36 घंटे की लगातार ड्यूटी किसी इंसान को शारीरिक रूप से तोड़ने के साथ-साथ उसके नर्वस सिस्टम को अंदर से खोखला कर देती है. जोधपुर एम्स की ये घटना सिर्फ एक मौत नहीं है,बल्कि उस सड़े हुए सिस्टम पर करारा तमाचा है, जो डॉक्टरों को इंसान नहीं समझकर रोबोट समझता है. 

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About the Author

मीडिया की दुनिया में 18 साल का सफर... एंकरिंग से लेकर डिजिटल की स्क्रीन तक, हर नया बदलाव दिल से अपनाया, जो सोचती हूं, वही कहती हूं, बातों को घुमाना मेरी आदत नहीं, दिल की बात जुबां पर रखना पहचान है. फिलहाल 'ज़ी राजस्थान डिजिटल' के साथ सफर जारी है और हर दिन कुछ नया सीखने की ललक बरकरार है और रहेगी. Pragati.Pant@india.com ईमेल के जरिए आप संपर्क कर सकते हैं.
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