DNA: सरकारी अस्पतालों में 'फ्री जांच' का सच! मशीनें धूल फांक रहीं, डॉक्टर कमीशन के खेल में मरीजों को क्यों भेज रहे बाहर?
सरकारी अस्पतालों में 'फ्री मेडिकल जांच' का क्या है कड़वा सच? मशीनें बंद पड़ी हैं और डॉक्टर मरीजों को प्राइवेट सेंटर्स भेज रहे है.। जानिए कमीशन के इस पूरे खेल का डीएनए टेस्ट.
DNA मित्रो, आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती है..और आज का पहला विश्लेषण हम गांधी जी के एक कथन से शुरू करना चाहते हैं. उन्होंने कहा था, किसी भी टैक्स-व्यवस्था के सही होने के लिए जरूरी है कि टैक्स देने वाले को बदले में जरूरी सेवाओं के रूप में 10 गुना फायदा मिले. सुविधाओं में सर्वप्रथम है स्वास्थ्य सेवाएं क्योंकि पहला सुख निरोगी काया कहा जाता है. लेकिन क्या आम आदमी को ये सुविधा मिल पा रही है? आम आदमी के लिए एक सहारा है सरकारी अस्पताल.
लेकिन सरकारी अस्पताल का नाम सुनकर ही न जाने क्यों लोग डर जाते है.. ऐसा क्यों है.. इसकी एक वजह हम आपको 21 सितंबर के DNA संस्करण में दिखा चुके हैं. तब हमने आपको दिखाया था कि सरकारी अस्पतालों के दवाखानों से मरीजों को मिलने वाली जरूरी दवाइयां गायब थीं..उनके हक की दवाएं उन्हें मिल ही नहीं रही और आज हम, सरकारी अस्पतालों में अपनी पड़ताल की दूसरी कड़ी दिखाने वाले हैं.
DNA में अस्पतालों में जांच के नाम पर करप्शन का अल्ट्रासाउंड
आज हम, सरकारी अस्पतालों में जांच के नाम पर चल रहे करप्शन का अल्ट्रासाउंड करेंगे. मित्रो, जब कोई व्यक्ति बीमार पड़ने पर अस्पताल जाता है तो उसकी पहली जरूरत दवा नहीं होती है.. बल्कि ज्यादा जरूरी ये पता करना होता है कि उसे हुआ क्या है.. बीमारी का पता लगाने के लिए डॉक्टर अक्सर जांच करवाने को कहते हैं.. कभी खून की जांच, कभी X-Ray...कभी Ultrasound.. तो कभी CT Scan... ये सभी जांच सरकारी अस्पतालों में नि:शुल्क होते हैं.. लेकिन क्या आम आदमी इसका लाभ उठा पा रहा है?
इस सवाल का पता लगाने ज़ी न्यूज़ की टीम देश के 6 राज्य उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के सरकारी अस्पतालों में गई. हमारी ग्राउंड रिपोर्ट में आपको पता चलेगा कि जांच के नाम पर डॉक्टर. मरीजों को सरकारी जांच केंद्र के बजाय कमीशन के चक्कर में प्राइवेट क्लिनिक में भेज रहे हैं. हमारी ग्राउंड रिपोर्ट में आपको देखना चाहिए कि जांच की मशीन होने के बावजूद सरकारी जांच केंद्र पर ताला क्यों लटका है लेकिन सबसे पहले आपको मुफ्त जांच वाली नीति जाननी चाहिए आप चाहें तो इस जानकारी को नोट भी कर सकते हैं.
2015 में भारत सरकार ने फ्री डायग्नोस्टिक सर्विस इनिशिएटिव यानी FDSI की शुरुआत की थी.. इसका मकसद था सरकारी अस्पतालों में जरूरी जांच मुफ्त उपलब्ध कराना..
FDSI के तहत,
- सब हेल्थ सेंटर यानी आरोग्य मंदिरों में 14 मुफ्त जांच का प्रावधान किया गया.
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र यानी PHC में 63
- सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र यानी CHC में 97
- Sub-District Hospital में 111
- और जिला अस्पताल यानी District Hospital में 134 जांच मुफ्त में करने की व्यवस्था बनाई गई
सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार अलग-अलग स्तर पर जरूरत के हिसाब से कई तरह की जांच शामिल हैं. 2015 में नियम बना 2019 में मुफ्त जांच की संख्या बढ़ाई गई. लेकिन सवाल यही है कि क्या ये योजना ज़मीन पर उतर पाई है..क्या इसका लाभ आम जनता उठा पा रही है.
DNA मित्रो, हमने आज देश के 6 राज्यों में रिएलिटी चेक किया.. बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में हमारे संवाददाता अलग अलग स्वास्थ्य केंद्रों पर गए.. वहां एक्स-रे से लेकर अल्ट्रासाउंड की स्थिति का जायजा लिया..हमने अपनी इस पड़ताल को तीन हिस्सों में बांटा है.
- पहला- क्या सरकारी अस्पताल में मरीज नि:शुल्क जांच का फायदा उठा पा रहे हैं?
- दूसरा- क्या अस्पतालों में जांच के लिए मशीनें और टेक्निशियन मौजूद हैं?
- तीसरा- अस्पतालों में जांच के नाम पर कमिशन वाले खेल का DNA टेस्ट. सबसे पहले आपको ये देखना चाहिए, कि अस्पतालों में मरीजों को जांच की सुविधा मिल रही है या नहीं?
सरकार का संकल्प है, कि सरकारी अस्पतालों में आम लोगों के लिए जरूरी जांच निशुल्क होगी..लेकिन जमीन पर इस संकल्प को पूरा करने के लिए क्या हो रहा है, आपने देखा और भी दूसरे शहरों से आई ग्राउंड रिपोर्ट हम आपको आगे दिखाएंगे..लेकिन पहले आपको बताते हैं कि किस सरकारी अस्पताल में कौन सी निशुल्क जांच की सुविधा का प्रावधान है. ये आपका अधिकार है इसलिए अब जो हम बताने जा रहे हैं, उसे बहुत ध्यान से सुनिएगा.
आयुष्मान आरोग्य मंदिर या उपस्वास्थ्य केंद्र में बुनियादी जांच जैसे खून जांच की सुविधाएं उपलब्ध होती हैं.
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र यानी PHC में कुछ अतिरिक्त खून जांच.. और एक्स-रे जैसे प्राथमिक टेस्ट होते हैं.
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र यानी CHC में विस्तृत लैब जांच और अल्ट्रासाउंड की सुविधा भी उपलब्ध होती है.
वहीं जिला अस्पताल में इन सब के साथ साथ क्रिएटिनिन, लिवर और किडनी से जुड़ी जांच का प्रावधान है. साथ ही CT स्कैन की सुविधा भी उपलब्ध होती है.
क्या कहता है नियम?
नियम ये कहता है कि जिन अस्पतालों में जांच की सुविधा अगर किसी कारणवश नहीं है, तो वो सैंपल लेंगे और उसे बड़ी लैब में भेंजेगे. नियम ये कहता है कि जांच के लिए इन अस्पतालों में प्रशिक्षित कर्मचारी होने चाहिए, मशीनों की देखरेख और उनकी गुणवत्ता की जांच भी समय-समय पर होनी चाहिए. फाइलों में ये नियम दर्ज हैं. लेकिन हमारी शुरुआती पड़ताल में ये साबित हो गया कि इन नियमों का पालन नहीं हो रहा है. अब इसके पीछे की वजह आपको देखनी चाहिए.. मित्रो, किसी अस्पताल में मशीन है तो टेक्निशियन नहीं हैं तो कहीं टेक्निशयन हैं तो मशीन खराब है. ये स्थिति किसी एक राज्य की नहीं है. आज आपको बिहार, झारखंड, यूपी, एमपी और जम्मू कश्मीर से हमारी अगली रिपोर्ट देखनी चाहिए
मित्रो, आचार्य चाणक्य ने कहा था,
जो अधिकारी या सेवक अपने निजी स्वार्थ के लिए जनता के अधिकारों का हनन करता है, वह पूरी व्यवस्था को दीमक की तरह खोखला कर देता है.
ये कथन, उन डॉक्टर्स और लैब टेक्निशियन्स को ध्यान में रखना चाहिए. जो ड्यूटी से नदारद हैं. ये कथन उन अधिकारियों को पता होना चाहिए जिनके ऊपर सरकारी नीतियों को लागू करने की जिम्मेदारी है. क्योंकि इन अस्पतालों को ऊपर से भारी भरकम फंड मिल रहा है. मित्रों, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत सरकारी अस्पतालों में फ्री जांच के लिए सरकार ने
- 2021-22 में 1,547 करोड़ रुपये का फंड दिया
- 2022-23 में ये फंड बढ़कर 1,975 करोड़ रुपए हो गया
- और 2023-24 में फंड को बढ़ाकर 2,000 करोड़ कर दिया गया
राज्यों का अपना फंड इससे अलग है. यानी केंद्र और राज्य- दोनों स्तर पर सरकार फंड दे रही है. पैसा अस्पतालों को मिल रहा है. लेकिन आम नागरिकों तक सुविधा नहीं पहुंच रही है. उन्हें लाभ नहीं मिल रहा है. क्यों..क्योंकि कहीं मशीन खराब है तो कहीं मशीन को चलाने के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं है और जहां दोनों हैं वहां कमीशनखोरी का खेल चल रहा है. आपको ये भी जानना चाहिए कि सरकारी केंद्रों में जांच करने वाले कर्मचारियों की कितनी कमी है. सरकार के द्वारा तय मानकों के मुताबिक़ ग्रामीण PHC में 1 लैब टेक्निशियन होना ज़रूरी है.
42 प्रतिशत ग्रामीण PHC में लैब टेक्नीशियन नहीं
- रूरल हेल्थ स्टैटिस्टिक्स की 2021-22 की रिपोर्ट के मुताबिक़ उस समय देश में कुल 24,935 ग्रामीण PHC थे. इस तरह नियमों के मुताबिक़ 24,935 लैब टेक्निशियन होने चाहिए थे. लेकिन थे कितने, केवल 14,565.... यानी 42% ग्रामीण PHC में लैब टेक्निशियन थे ही नहीं. सोचिए, लगभग आधे ग्रामीण PHC बिना लैब टेक्निशियन के चल रहे थे.
- शहरों में भी स्थिति आदर्श नहीं है. शहरी CHC में लैब टेक्निशियन के 19% और रेडियोग्राफर के 32% स्वीकृत पद खाली हैं. जाहिर सी बात है... जब स्टाफ भी नहीं रहेंगे तो जांच कैसे होगी. यहां तक कि राजधानी दिल्ली में भी हालात बेहतर नहीं हैं. 11 अगस्त को हमने DNA में इसके बारे में बताया भी था. दिल्ली सरकार के अस्पतालों का ऑडिट कराया गया तो पता चला कि 50-60 करोड़ की मशीनें, कर्मचारियों और रख-रखाव में कमी की वजह से धूल फांक रही थीं.
सोचिए, हज़ारों मरीज़ टेस्ट के इंतज़ार में बैठे रहते हैं. लेकिन जिन मशीनों से टेस्ट हो सकता है, जिन्हें करोड़ों खर्च कर ख़रीदा गया, वो ऐसे ही बेकार पड़ी हैं. दूसरी तरफ़ ऐसे अस्पताल भी हैं, जहां कर्मचारी तो हैं, लेकिन वहां टेस्ट के लिए मशीन ही नहीं हैं. CAG की रिपोर्ट से भी इस समस्या के बारे में पता चलता है.
बिहार और पंजाब के अस्पतालों की CAG रिपोर्ट ने खोली पोल
बिहार की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर 2024 की अपनी रिपोर्ट में CAG ने बताया कि उसने जिन अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों की जांच की वहां जांच उपकरणों की कमी 17% से लेकर 100% तक थी. सोचिए, 100% तक. यानी ऐसे भी अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र थे जहां जांच के लिए एक भी मशीन नहीं थी. यानी बिना किसी जांच सुविधा के ही ऐसे केंद्र खोल दिए गए. CAG को कोई भी ऐसा अस्पताल नहीं मिला जहां सभी आवश्यक उपकरण थे. पंजाब के अस्पतालों पर 2024 की CAG रिपोर्ट में पता चला कि अलग-अलग ज़िला अस्पतालों में जांच उपकरणों की कमी 47% से लेकर 68% तक है. 57% मरीजों ने कहा कि डॉक्टर की लिखी सभी पैथोलॉजी जांच अस्पताल में नहीं हुई, वहीं रेडियोलॉजी जांच के मामले में 65% मरीज़ों ने कहा कि सभी जांच अस्पताल में नहीं हुई. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा सितंबर 2024 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार देश के कुल CHC में से 30% में एक्स-रे मशीन की सुविधा नहीं है.
CRM रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा
सरकार ने अपने स्तर पर भी ये जांच करवाई है कि अस्पतालों में जांच ठीक ढंग से हो रही है या नहीं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के कॉमन रिव्यू मिशन यानी CRM की रिपोर्ट बताती है कि जितनी जांच का प्रावधान किया गया है और जितनी जांच हो रही है, दोनों में बहुत बड़ा अंतर है. बिहार के मुंगेर में ज़िला अस्पताल जाकर जब पता लगाया गया तो वहां सिर्फ़ 58 जांच की सुविधा उपलब्ध थी. जबकि ज़िला अस्पताल में 134 जांच होनी चाहिए. इसी तरह नागालैंड के एक ज़िला अस्पताल में 134 जांच की जगह सिर्फ़ 33 जांच की जा रही थी. ये कुछ उदाहरण हैं. यानी सरकार को भी पता है कि सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा है.
DNA मित्रो, यहां मसला सिर्फ मशीन और टेक्निशियन का नहीं है.. बल्कि नीयत का भी है.. क्योंकि हमारी पड़ताल में ये पता चला कि कई अस्पतालों में जांच सेंटर बंद हैं.. और अस्पताल का स्टाफ ही बाहर के किसी खास जांच केंद्र जाने को कह रहा है. हमारी पड़ताल में एक बात ये भी सामने आई कि जिस केंद्र में नि:शुल्क जांच होनी चाहिए थी..वहां मरीजों से पांच पांच सौ रुपये लिए जा रहे थे. ये रिश्वतखोरी है. ये कमीशनखोरी है. हमारी पड़ताल का ये अंश भी अब आपको देखना चाहिए.
गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है
"परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई"
यानी दूसरों की भलाई करने के समान संसार में कोई दूसरा धर्म नहीं है, और दूसरों को कष्ट या दुख पहुंचाने के समान कोई दूसरा नीच कर्म या पाप नहीं है.
DNA मित्रो, सरकारी अस्पतालों में जो लोग कमीशनखोरी कर रहे हैं.. वो महापाप के समान है.. क्योंकि वो किसी गरीब व्यक्ति की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं.. सरकारी अस्पतालों में जांच नहीं होने की वजह से कई लोग जांच करवा भी नहीं पाते हैं। इसका परिणाम क्या होता है..आपको पता है। इसका परिणाम बहुत खतरनाक होता है मित्रों।
75 फीसदी आबादी गंभीर लक्षण दिखने से पहले नहीं करवाती जांच
प्रिवेंटिव हेल्थ केयर पर एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत की लगभग 75% आबादी गंभीर लक्षण दिखने से पहले कभी कोई जांच या टेस्ट नहीं कराती. इसके कारण गंभीर बीमारियां का पता शुरुआती चरण में नहीं चल पाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन और पांचवें नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार भारत में हाइपरटेंशन से पीड़ित 66% पुरुष और 41% महिलाएं अपनी बीमारी से अनजान होते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के मुताबिक़ भारत में 70% से अधिक कैंसर के मामले सीधे स्टेज थ्री या स्टेज फोर में पता चलते हैं. अगर स्टेज वन में कैंसर का पता लग जाए तो बचने की दर 90% से अधिक होती है.
स्वस्थ्य जीवन के लिए लैब टेस्ट कितने जरूरी?
ये तमाम आंकड़े बताते हैं कि स्वस्थ जीवन के लिए लैब टेस्ट कितने ज़रूरी हैं. लेकिन देश के अलग-अलग राज्यों में सरकारी अस्पताल की मौजूदा व्यवस्था सरकार के मिशन को नाकाम कर रहे हैं. अगर ये व्यवस्था दुरुस्त हो जाए तो न केवल लोगों की सेहत ठीक होगी, बल्कि आर्थिक बोझ भी कम होगा. मित्रों, केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक 2022-23 में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर खर्च 6,373 रुपये है. कुल मिलाकर स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाओं पर 2022-23 में 8 लाख 81 हज़ार करोड़ रुपये खर्च हुए. इस खर्च का 43% हिस्सा लोगों ने अपनी जेब से भरा. यानी 3 लाख 82 हज़ार करोड़ रुपये जनता ने अपनी जेब से डॉक्टर, दवा और अस्पताल को दिया और इस 3 लाख 82 हजार करोड़ का करीब 11 प्रतिशत यानी 42 हजार करोड़ रुपये जांच में ही खर्च होते हैं.
तेजी से बढ़ रहा है लैब और जांच का बाजार
देश में लैब और जांच केंद्रों का बाजार कितनी तेजी से बढ़ रहा है इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि साल 2024 में ये बाजार 87 हजार करोड़ का था. लेकिन अनुमान है कि साल 2028 तक ये 1 लाख 140 हजार करोड़ का हो जाएगा. ये पैसा आपकी और हमारी जेब से ही जाएगा.. वो भी तब, जब सरकारी अस्पतालों में नि:शुल्क जांच का प्रावधान है...भारत में हर साल लगभग 35 करोड़ से ज़्यादा लोग डिस्ट्रिक्ट और सब-डिस्ट्रिक्ट अस्पताल में इलाज के लिए जाते हैं. सरकारी अस्पतालों में अगर टेस्ट की सुविधाएं अच्छी हो जाएं तो लोगों की ज़िंदगी आसान हो जाएगी.