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'मेरा मुंह मत खुलवाइए...' रामायण पर फिर भड़के मुकेश खन्ना, रणवीर सिंह से लेकर जंतर-मंतर प्रोटेस्ट पर क्या बोले? पढ़ें एक्सक्लूसिव इंटरव्यू

मुकेश खन्ना ने जी न्यूज के साथ एक इंटरव्यू में अपकमिंग 'रामायण' फिल्म, VFX, 'आदिपुरुष' के डायलॉग्स, OTT सेंसरशिप, NEET आंदोलन और 'शक्तिमान' फिल्म की कास्टिंग पर खुलकर बेबाक बयान दिए हैं.

'मेरा मुंह मत खुलवाइए...' रामायण पर फिर भड़के मुकेश खन्ना, रणवीर सिंह से लेकर जंतर-मंतर प्रोटेस्ट पर क्या बोले? पढ़ें एक्सक्लूसिव इंटरव्यू
Image Credit: mukesh khanna interview

Mukesh Khanna Interview: बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता मुकेश खन्ना अपने बेबाक और कड़े बयानों के लिए जाने जाते हैं. हाल ही में जी न्यूज को दिए एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने भारतीय सिनेमा, पौराणिक ग्रंथों के साथ हो रहे खिलवाड़, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, NEET छात्र आंदोलन और अपनी आइकॉनिक फ्रेंचाइजी 'शक्तिमान' पर कई हैरान कर देने वाले खुलासे किए हैं. जी न्यूज से बातचीत के दौरान मुकेश खन्ना से जब आगामी 'रामायण' फिल्म और उसमें इस्तेमाल हो रहे AI व स्पेशल इफेक्ट्स के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने नाराजगी जताई. मुकेश खन्ना ने कहा कि 'महाभारत' और 'रामायण' जैसे धारावाहिक संवादों और अभिनय के दम पर चले थे, न कि स्पेशल इफेक्ट्स के बल पर. उन्होंने याद दिलाया कि 'महाभारत' में अगर डॉ. राही मासूम रजा के लिखे संवाद नहीं होते, तो भीष्म पितामह का किरदार इतना अमर नहीं बनता.

रिपोर्टर: रामायण पर आधारित ऐसी कोई फिल्म, जो अभी हाल ही में आने वाली है, आपने उसका ट्रेलर देखा है. आपके इस बारे में क्या विचार हैं?

मुकेश खन्ना: नहीं, आने वाली फिल्म पर मेरा मुंह मत खुलवाइए.

रिपोर्टर: उसमें एआई और स्पेशल इफेक्ट्स का इस्तेमाल किया गया है. आपका क्या कहना है?

मुकेश खन्ना: देखिए, महाभारत संवादों और अभिनय के दम पर चली थी. अगर महाभारत में डॉ. राही मासूम रजा साहब नहीं होते, तो मुकेश खन्ना भीष्म पितामह नहीं बनता. तारीफ उनकी है. साहब, उसमें कोई स्पेशल इफेक्ट्स नहीं थे, बस नीले पर्दे थे. रामायण में तो तीर ऐसे आते थे, रुकते थे और आपस में बात करते थे. तब अखबारों में लिखा जाता था कि एक तीर रावण ने छोड़ा, एक राम ने, तीर आकर खड़े हो जाते थे और एक-दूसरे से पूछते थे, "रामानंद सागर ने कितना कमाया?" दूसरा कहता, "मुझे नहीं पता कितना कमाया." मतलब एक मजाक का माहौल होता था.

लेकिन आज रामचंद्र जी पेड़ पर चढ़कर ठक-ठक-ठक तीर चला रहे हैं. जब पहला टीजर आया था, तब मेरे मुंह से निकल गया था कि मैं दुष्ट हूं जो बोल रहा हूं, लेकिन रामचंद्र जी ने कभी पेड़ पर चढ़कर तीर नहीं चलाया. आप क्या दिखाना चाहते हो? वे सिर्फ धनुर्धर नहीं थे, अर्जुन धनुर्धर था.

रामचंद्र जी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं. महाभारत का वो पक्ष दिखाइए. अगर आप सिर्फ स्पेशल इफेक्ट्स पर निर्भर रहेंगे, तो वही हाल होगा जो 'आदिपुरुष' का हुआ था. राम को मूंछ लगा दी थी. हनुमान टपोरी भाषा में डायलॉग बोल रहा है, "तेरे बाप की लंका जलेगी, तो मेरे बाप का ये जलेगा." अरे, क्या भगवान राम का हनुमान ऐसा बोलेंगे? पैसे से रामायण या महाभारत नहीं बनती, कंटेंट से बनती है. और मेरा मानना है कि मूल कंटेंट को मत बदलिए, उसे बरकरार रखकर बनाइए. आप 10 महाभारत बना सकते हैं, लेकिन अगर आप बदलाव करके द्रौपदी को टैटू लगा देंगे, तो मुझे आपत्ति होगी कि यह क्या है? अगर आप रावण जैसे दिखने वाले को राम बनाएंगे, तो नहीं चलेगा. बस यही बात है.

जैसे आपने मूंछ लगा दी, हमारे यहां कभी किसी राम को मूंछ में नहीं दिखाया गया. महर्षि व्यास, वाल्मीकि और तुलसीदास से बड़े बनने की कोशिश मत कीजिए. उनके दायरे में रहकर 100 फिल्में बनाइए, खूब चलेंगी साहब. लेकिन आज लोग क्या कहते हैं? "नहीं साहब, हम तो स्पेशल इफेक्ट्स दिखाएंगे." अब वे सही साबित होते हैं या गलत, मैं नहीं जानता, क्योंकि रामायण पर अभी टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी. हो सकता है उन्होंने अच्छी बनाई हो, और अगर अच्छी बनाई है तो यह अच्छी बात है, क्योंकि यह हमारे देश की आस्था का सवाल है.

रिपोर्टर: आज के दौर में क्या लोग आजादी के मायने बहुत हलके में ले रहे हैं?

मुकेश खन्ना: एक चीज मैं आपको बता दूं, आज के जमाने में दो चीजों की कमी है- एक ईमानदारी और दूसरी देशभक्ति. लोगों के अंदर कहीं न कहीं देशभक्ति की भावना नहीं है, और वह भावना लाना बहुत जरूरी है. उन्हें यह बताना जरूरी है कि देश यूं ही आजाद नहीं हो गया था, उसके लिए कुर्बानियां दी गई थीं. राष्ट्रभक्ति बहुत जरूरी है. एक जमाने में फिल्में बनी थीं, जैसे 'शहीद भगत सिंह', जो आपको बहुत पसंद आई होगी. अमेरिका में जर्मनी के खिलाफ 'गन्स ऑफ नावलोन' से लेकर 'लॉरेंस ऑफ अरेबिया' जैसी जो फिल्में बनती थीं, साहब मैं उन्हें देखकर रोमांचित हो जाता था. लेकिन हमने अपने देश के नायकों पर फिल्में बनाना बंद कर दिया.

रिपोर्टर: शिक्षा प्रणाली भी इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. क्योंकि मुझे याद है, जब मैं चौथी कक्षा में था, तब 'द इंडियन रेवोल्यूशन' पाठ में भगत सिंह जी के बारे में बताया गया था. लेकिन वह बहुत संक्षिप्त था, ऐसा लगता था कि और जानकारी होनी चाहिए थी. इस पर आपका क्या कहना है?

मुकेश खन्ना: पूरे इतिहास में बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब के बारे में पूरे-पूरे अध्याय भरे रहते थे. मदर टेरेसा का पाठ भी बाद में आया, लेकिन झांसी की रानी, चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के बहुत छोटे-छोटे अध्याय होते थे और मुगलों के बड़े-बड़े. यहां तक कि 'मुगल-ए-आजम' बन गई, 'अनारकली' बन गई जो हिस्ट्री में नहीं थी. क्या किसी ने हमारे देश के उन हजारों क्रांतिकारियों पर फिल्म बनाने की कोशिश की? किसी ने महाभारत को बीच में लाया? महाभारत को तो हमने लोकप्रिय बनाया. महाभारत एक ऐसी कहानी है जिस पर आप 100 फिल्में बना सकते हैं. मुझे याद है, उस जमाने में सलीम-जावेद जैसे लेखक लंदन जाकर डीवीडी देखते थे और वहां से कहानियां उठाकर ले आते थे. सर, आप अकेले महाभारत से ही 200 कहानियां निकाल सकते हैं.

रिपोर्टर: आपने महाभारत की बात की, तो जैसे इस गाने में भी हमने देखा है कि एआई का इस्तेमाल किया गया है. क्या एआई के प्रति आपके विचार कुछ बदले हैं?

मुकेश खन्ना: आपने मुझे बिल्कुल सही पकड़ा. मैं बीच में एआई के खिलाफ बहुत बोला था. मैंने कहा था कि इसे बंद करवाओ, नहीं तो यह आप लोगों को बर्बाद कर देगा. लोग कहते थे, "क्या बात करते हैं?" मैंने कहा, "देखिए, आगे क्या होता है." अगर मुझे किसी से पत्र लिखवाना होता, तो मेरा सेक्रेटरी 2 घंटे लगाता था. एआई में बस बोल दो कि आवेदन का पत्र चाहिए, सर 2 मिनट में पत्र बाहर निकाल देता है. किसी ने मुझसे कहा था कि सर, मैंने एआई से शक्तिमान की कहानी मांगी, तो उसने 2 से 5 मिनट में पूरी कहानी निकालकर दे दी, जिसमें एक दृश्य में किलविश और शक्तिमान बैठकर कॉफी पी रहे हैं.

साहब, ओटीटी पर कोई सेंसरशिप नहीं है. क्यों? मैंने यह मुद्दा उठाया था कि हमारी फिल्मों में सेंसर होता है. आज तो 'यू/ए' प्रमाण पत्र मिलते हैं, उनका कोई मतलब ही नहीं रह गया है. हमारे जमाने में सिनेमाघर का गेटकीपर परिवार को देखकर रोकता था, "यह बच्चा कौन है? इसकी उम्र कितनी है?" यह 18 साल का नहीं दिखता, इसे हटाओ." गेटकीपर बच्चे को रोक देता था. लेकिन आज बच्चे को कोई नहीं रोक सकता. सबस्क्रिप्शन लो और अपने कमरे में जाकर बैठ जाओ. न मां-बाप रोक सकते हैं, न कोई और. बच्चे अपने कमरे में बैठकर सब देखते हैं.

रिपोर्टर: जो हमारी आज की पीढ़ी है, उसके बारे में आपका क्या कहना है? क्योंकि उन्होंने भी आवाज उठाई है. हम इंकलाब की बात करते हैं, इंकलाब ये लोग भी लाए हैं. आप इससे कितना सहमत हैं? क्या आपको लगता है कि उनका यह प्रयास सही था?

मुकेश खन्ना: यह इंकलाब पहली बार नहीं हो रहा है, इंकलाब बहुत पहले भी होता रहा है. अन्ना हजारे ने भी किया था, उनके पहले भी कई लोग सड़कों पर आए. चंद्रशेखर आजाद ने भी सड़कों पर उतरकर काम किया था. इसके लिए सही नीयत, ज्ञान और निष्ठा की आवश्यकता होती है. आज अगर आप नीट (NEET) परीक्षा के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं और बात प्रधानमंत्री या धर्मेंद्र प्रधान को हटाने की करने लगते हैं, तो भाई, पेपर लीक से उनका क्या सीधा लेना-देना?

कहीं न कहीं आंदोलन की नीयत पर सवाल उठता है क्योंकि विपक्षी पार्टियां इसका फायदा उठाने आ जाती हैं और ये बच्चे उनके मोहरे बन जाते हैं. छात्रों की समस्या जायज है, लेकिन आंदोलन करने वालों को यह समझ नहीं आता कि उनके कंधों पर रखकर बंदूक चलाई जा रही है. जो असली छात्र हैं, उन्हें यह महसूस होना चाहिए. मेरे मुंह से पहले भी यह बात निकली थी कि इतनी गंदी गालियां एक लड़की बोल रही थी कि मुझे सुनने में शर्म आ रही थी, पर उसे बोलने में शर्म नहीं आई. इतनी कम उम्र में ऐसा बोलना. मुझे लगा कि उन्हें भड़काया गया है, पीछे से पैसे बांटे गए हैं. अब यह धीरे-धीरे साबित भी हो रहा है कि वे नीट के छात्र नहीं थे, बल्कि उपद्रव फैलाने वाले बीच में घुस आए थे. जैसे घर में कॉकरोच आते हैं तो हम उन्हें फेंक देते हैं, वैसे ही ये कॉकरोच कहां से घुस आए? आंदोलन के पीछे ईमानदारी का होना बहुत जरूरी है.

और ये बच्चे, माफ करना, गूगल से देश का इतिहास सीख रहे हैं. इन्होंने असली इतिहास नहीं पढ़ा है. जितने भी नई पीढ़ी हैं, वे बहुत तेज और स्मार्ट हैं और मैं उनका सम्मान करता हूं, क्योंकि वे 1997 में शक्तिमान के समय ही पैदा हुए थे, मैं उनके साथ हूं. मैं उनके सुख-दुख में साथ हूं, लेकिन वास्तविकता से इतनी तेजी से दूर मत भागिए. हालांकि, उनका मुद्दा सही था, पेपर लीक नहीं होना चाहिए. अगर पेपर लीक हुआ है, तो लीक करने वाले को पकड़िए, अधिकारियों को हटाने से कुछ नहीं होगा. जिसने पैसे के लिए पेपर बेचा है, कार्रवाई उस पर होनी चाहिए.

रिपोर्टर: शक्तिमान पर फिल्म बनने वाली थी और काफी समय से इसकी चर्चा चल रही थी. आप इसमें रणवीर सिंह को नहीं देख पा रहे थे. क्या आप दक्षिण भारत या हॉलीवुड से किसी को इस भूमिका के लिए देख रहे हैं, क्योंकि इस पर लंबी चर्चा हुई है?

मुकेश खन्ना: साउथ ही क्यों? बंगाल से क्यों नहीं? भोजपुरी से क्यों नहीं? या कहीं और से क्यों नहीं? सवाल यह नहीं है, सवाल यह है कि शक्तिमान को शक्तिमान जैसा दिखना चाहिए. उसके चेहरे पर वह गंभीरता होनी चाहिए. वह केवल सुपरहीरो नहीं, बल्कि एक सुपर टीचर भी है, जो बच्चों को सिखाता है. अगर मेरा माना जाए, तो पूरे भारत में ऑडिशन करवाए जाने चाहिए. "कौन बनेगा शक्तिमान?" का ऑडिशन करवा दीजिए! इससे बड़ी पब्लिसिटी और कुछ नहीं होगी. और जो नया लड़का चुना जाएगा, वही शक्तिमान दिखेगा. यहां तो सब स्टार हैं, जबकि शक्तिमान के लिए किसी स्टार की जरूरत नहीं है, कंटेंट ही यहां का असली स्टार है. लोग कहते हैं, "साहब, बहुत बड़ा कलाकार है, खिलजी का रोल अच्छा किया था." मैंने कहा, "किया होगा, लेकिन शक्तिमान के लिए मुझे अलग तरह से सोचना होगा."

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About the Author

Alkesh Kushwaha

Alkesh Kushwaha

अल्केश कुशवाहा एक वरिष्ठ डिजिटल पत्रकार हैं, जिन्हें प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 14 वर्षों से अधिक का गहन अनुभव है. वर्तमान में वे जी न्यूज हिंदी में चीफ सब-एडिटर के रूप में बॉलीवुड-वायरल सेक्शन संभाल रहे हैं. अल्केश की मुख्य विशेषज्ञता बॉलीवुड, एंटरटेनमेंट, वायरल सिनेमा ट्रेंड्स और सेलिब्रिटी एक्सक्लूसिव्स में है. साल 2012 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत करने वाले अल्केश ने दैनिक भास्कर, हिन्दुस्तान टाइम्स, राजस्थान पत्रिका और NDTV जैसे देश के अग्रिम मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं. अल्केश ने अपने करियर में अर्जुन रामपाल, ऋचा चड्ढा और राजपाल यादव जैसी कई दिग्गज बॉलीवुड हस्तियों के एक्सक्लूसिव इंटरव्यूज किए हैं. फिल्म रिव्यू, बॉक्स ऑफिस एनालिसिस, सेलिब्रिटी गॉसिप्स और एंटरटेनमेंट ट्रेंड्स का इन-डेप्थ डेटा एनालिसिस करना उनका मजबूत पक्ष है. वे पाठकों तक बॉलीवुड जगत की हर छोटी-बड़ी खबर सटीक, निष्पक्ष और विश्लेषणात्मक तरीके से पहुंचाते हैं. आप अल्केश कुशवाहा से सीधे alkesh.kushwaha@zeemedia.com पर संपर्क कर सकते हैं.
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