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MMDR संशोधन बिल पर झारखंड में काफी सियासत देखने को मिल रही है. इस मुद्दे पर सत्तापक्ष ने केंद्र सरकार को चुनौती देते हुए बड़ा आंदोलन करने की धमकी दी है. वहीं, विपक्ष इस बिल को झारखंड के हित में बता रही है. इस बिल को लेकर अगर कोई सबसे ज्यादा चिंतित है तो वह प्रदेश के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर हैं. राज्य सरकार को इस बिल से क्यों आपत्ति इसे लेकर हमारे संवाददाता कुमार चंदन ने वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर से खास बातचीत की. इस दौरान में वित्त मंत्री ने सभी सवालों का बड़ी बेबाकी से जवाब दिया.
सवाल- MMDR संशोधन विधेयक आया, उसके बाद से लगातार बैठकें हो रही हैं. राजस्व के स्रोत तलाशे जा रहे हैं. वित्त मंत्री के नाते झारखंड को कैसे अब राजस्व के मामले में आगे ले जाएंगे?
जवाब- 15 नवंबर 2000 को यह राज्य बिहार से अलग हुआ था. उस वक्त जो भी नेतृत्वकर्ता थे, उनका एक ही सपना था कि इस राज्य को आगे बढ़ाना है. जब हम डेवलपमेंट की बात करते हैं, तो उसका अर्थव्यवस्था बहुत मायने रखती है. बिना अर्थव्यवस्था के आप सामाजिक और शहरी क्षेत्र में कोई काम नहीं कर सकते. वित्त मंत्री के नाते मैंने यह महसूस किया है कि भारत सरकार की कुछ नीतियों के कारण झारखंड को प्रत्येक वर्ष लगभग 22 हजार करोड़ रुपये की क्षति हो रही है. मैंने पहले भी बताया है कि जीएसटी रेशनलाइजेशन के नाम पर झारखंड को 4,000 करोड़ का नुकसान हो रहा है. फिर मनरेगा योजना का जो बदलकर वीजी रामजी योजना रखा गया, उस पर 4 हजार करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान है. अब MMDR कानून में जो संशोधन किया गया कि उससे राज्य सेस नहीं लगा सकते. इससे 14 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होगा. यानी कुल 22 हजार करोड़ रुपये का नुकसान झारखंड को सहन करना पड़ेगा. राज्य की चिंता यह है कि ये 22 हजार करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति हम कैसे करेंगे. जीएसटी काउंसिल की बैठक में हम लोगों ने केंद्रीय वित्त मंत्री जी से अपनी बात कही. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप झारखंड में यह काम ना करें, लेकिन झारखंड को होने वाले नुकसान की भरपाई तो आप करें. हमें कंपनसेशन तो दें, यह भी सुनवाई नहीं हुई. प्रदेश की अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए मैंने अपने वाणिज्यिक कर विभाग को खास तौर पर कहा है कि राज्य का जो अपना 46,000 करोड़ रुपया प्रति वर्ष टैक्स है, उन्हें इकट्ठा करें. कमर्शियल टैक्स में यदि कहीं चोरी हो रही हो, इन सब चीजों पर नियंत्रण करिए ताकि दो-चार हजार करोड़ रुपया हम और बढ़ा सकें. जहां तक एमएमडीआर का प्रश्न है, तो यह हेमंत सोरेन की सरकार है. हम गरीबों को आगे बढ़ाना चाहते हैं आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से. यह हम नहीं मान सकते कि झारखंड की धरती के मिनरल्स का आर्थिक लाभ केंद्र ले और उसके जितने भी दुष्प्रभाव हैं, वह हम झेलें. आप कोयला निकालते हैं, सड़कें हमारी खराब होती हैं. उसे बनाने की जिम्मेवारी हमारी होती है. उससे प्रभावित वहां के लोगों को जो स्वास्थ्य की क्षति होती है, वो हम देखते हैं, राज्य की जिम्मेवारी होती है. पर्यावरण प्रदूषित होता है, यह इम्पैक्ट हमारे राज्य पर पड़ता है. जंगलों पर जो असर पड़ता है, वो हम झेलते हैं. तो कुल मिलाकर के कोयला आप ले जाइए, खनिज संपदा आप ले जाइए, और आर्थिक नुकसान झारखंड झेले, यह नहीं हो सकता. हम लोग सेस रोकेंगे नहीं. हम लोग सेस लेंगे, लेकिन अगर जरूरत पड़ा तो हम सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाएंगे.
सवाल- सेस लगाने से यहां के जो उत्पाद हैं, वो महंगे हो जाते हैं. फिर लोग दूसरा ऑप्शन खोजने लगते हैं, लोग महंगा सामान क्यों लेंगे. इससे राज्य को नुकसान झेलना पड़ सकता है.
जवाब- खदानों के ऑक्शन से हमको राजस्व मिलेगा और सेस से भी हमको 14,000 करोड़ रुपया मिलेगा. हम एक को पकड़ कर, एक छोड़ दें क्या? भारतीय जनता पार्टी तो यह भी कह सकती है कि जब आप सेस ले रहे हैं तो एक्साइज डिपार्टमेंट से मिलने वाले राजस्व को रोक दीजिए. लैंड रेवेन्यू से जो मिल रहा है, वो भी रोक दीजिए. यह कोई कोई तार्किक बात नहीं है. एमएमडीआर एक्ट पर जिस तरह झारखंड प्रदेश के भारतीय जनता पार्टी के नेता चिल्लाते हैं, तो यह तो तय हो गया कि वो केंद्र के सामने बौने हैं. ये झारखंड के हित की बात करने की हिम्मत नहीं जुटा सकते हैं. मैं तो साफ शब्दों में कहना चाहता हूं कि केंद्र जो भी निर्णय थोप दे, जिससे झारखंड का नुकसान हो रहा हो, फिर भी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का मुंह नहीं खुलेगा.
सवाल- जब संसद में यह बिल आया, तब कांग्रेस ने विरोध क्यों नहीं किया?
जवाब- संसद में एमएमडीआर एक्ट पर चर्चा करवाए थे क्या? आनन-फानन में तो बिल पास किया गया है. इस बिल से फायदा तो पूंजीपतियों को होगा. जो बड़े कॉर्पोरेट फैमिलीज हैं, उनको होगा. यह सब तो उनके लिए किया जा रहा है.
सवाल- बीजेपी इस मामले को लेकर जनता के बीच जाने की बात कह रही है. वो जनता के बीच जाकर बताने की कोशिश करेंगे कि एमएमडीआर सही है.
जवाब- बता लें, पैमाना क्या होगा? हम जो भी करते हैं, उसका मापदंड तो जनता चुनाव में करती है. हम तो कह रहे हैं कि जनता के बीच जाएं. एमएमडीआर एक्ट में जो संशोधन किया है, उससे झारखंड को नुकसान हो रहा है. गांव का एक-एक व्यक्ति इस बात को समझ गया है. सच्चाई तो यह है कि भारतीय जनता पार्टी गांव में जा नहीं सकती है. लोग घेर लेंगे इनको. पूछेंगे कि बताओ, हमारे धरती के नीचे जो खनिज संपदा है, उसका लाभ आप उठाकर ले जा रहे हैं और हमें बदहाल बनाकर के छोड़ रहे हैं? गरीबी हम झेलें, खेत हमारा बर्बाद हो, पर्यावरण बर्बाद हो और आर्थिक लाभ भारत सरकार ले. लोग को यही पूछेंगे कि आर्थिक लाभ भारत सरकार कमाए, बदले में हमको क्या मिल रहा है?
सवाल- तो आप भी जनता की अदालत में और न्यायालय, दोनों रास्तों का इस्तेमाल करेंगे?
जवाब- हमारे सामने दो आस्पेक्ट हैं, एक- जनता के बीच वो भी जाएं और दूसरा- सुप्रीम कोर्ट में. जनता के बीच हम जा रहे हैं. हम एक डेमोक्रेटिक प्लेटफॉर्म के माध्यम से जनता के बीच जाएंगे. जनता को बहुत कन्विंस करने की जरूरत नहीं है, जनता समझ चुकी है इस बात को. आम-अवाम इस बात को समझ गई है कि प्रधानमंत्री आदरणीय नरेंद्र मोदी जी का जो क्रेज था, वो खत्म हो गया है. शायद भाजपा इस बात को नहीं माने, लेकिन यह चुनाव में उनको पता चलेगा. हमारे पास एक विकल्प और भी है. हम ऑनरेबल सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर करेंगे. दोनों फ्रंट पर हम लड़ाई लड़ेंगे.