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Challenges Faced in Compiling India First Voter List: SIR को लेकर देशभर में इन दिनों बहस चल रही है. इस बहस के बीच यह जानना दिलचस्प है कि आजाद भारत में पहली वोटर लिस्ट कैसे तैयार हुई थी और कितने दिनों में तैयार हुई थी. दरअसल बात 1951-52 की है, जब देश के पहले आम चुनाव के लिए करीब 17.32 करोड़ मतदाताओं की मतदाता सूची तैयार की गई थी. उस समय देश में बड़े पैमाने पर अशिक्षा, विस्थापन और सामाजिक चुनौतियां थीं. ऐसे में पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन की टीम ने घर-घर जाकर मतदाताओं का विवरण जुटाया था.
इससे पहले अंग्रेजों के दौर में भी वोटिंग होती थी लेकिन उस वक्त मत देने का अधिकार सभी नागरिकों को नहीं था. संपत्ति, जमीन, टैक्स, शिक्षा और कुछ विशेष योग्यताओं के आधार पर सीमित लोगों को ही मतदान का अधिकार मिलता था.
जब देश औपनिवेशिक शासन की बेड़ियों को तोड़कर एक संप्रभु गणराज्य बना, तब दुनिया भर के राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें इस बात पर टिकी थीं कि क्या भारत जैसी विशाल विविधता, बड़े पैमाने पर अशिक्षा, गरीबी और विभाजन के दर्द से जूझ रहे देश में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार सफल हो पाएगा या नहीं.
इस चुनौती को स्वीकार करते हुए देश आजाद होने के बाद भारतीय संविधान में प्रावधान करके 1950 के बाद सभी वयस्कों को मताधिकार प्रदान कर दिया गया. पिछले 80 में लोकतंत्र का यह रूप सफलता के नए झंडे गाड़ रहा है. आज हम आपको उसी दौर में वापस लिए चलते हैं और उस वक्त के कई ऐसे दिलचस्प किस्से और तथ्य बताते हैं, जिनके बारे में आप शायद जानते नहीं होंगे.
भारत को 1947 में आज़ादी मिली और संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ. देश में पहला आम चुनाव 1951-52 में होना तय हुआ था. इस विशाल लोकतांत्रिक यज्ञ को पूरा करने के लिए वोटर लिस्ट तैयार करना सबसे पहली और बड़ी चुनौती थी। यह पूरी प्रक्रिया लगभग दो साल यानी 1949 के अंत से लेकर 1951 की शुरुआत तक में पूरी की गई थी.

मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन ने इस मुश्किल काम को अंजाम देने के लिए देश भर में जमीनी स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों और गणनाकर्मियों की एक बड़ी फौज उतारी. उन कर्मियों ने बिना आधुनिक डिजिटल संसाधनों के बैलगाड़ी, घोड़ा तांगा, साइकिल, ट्रेन और पैदल यात्राओं के जरिए सुदूर गांवों, जंगलों और पहाड़ों तक जाकर मतदाताओं का विवरण जुटाया.

आजाद भारत की पहली वोटर लिस्ट में नाम दर्ज करवाने के लिए भारतीय नागरिक, संबंधित क्षेत्र का निवासी न्यूनतम 21 वर्ष की आयु की पात्रता तय की गई थी. इसमें संपत्ति, कर भुगतान या शिक्षा जैसी कुलीन शर्तें लागू नहीं की गईं. देश के हर वयस्क नागरिक को उसकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर समान मताधिकार दिया गया.
पहली मतदाता सूची तैयार करते समय महिलाओं के पंजीकरण में चुनाव आयोग को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. असल में उस वक्त सामाजिक रूढ़ियों की वजह से महिलाएं अपने वास्तविक नाम अजनबियों के आगे बताने से हिचकिचाती थीं. वे फलाने की बहू, बेटी या मां के रूप में पहचान बताती थी. इस समस्या पर सुकुमार सेन ने कड़ा रुख अपनाया. उन्होंने कहा कि इस तरह किसी भी महिला का नाम दर्ज किया जाएगा. इसका असर ये हुआ कि करीब 8 करोड़ महिला मतदाताओं ने अपना नाम बताकर नाम दर्ज करवा लिया. हालांकि, लगभग 28 लाख महिलाओं के नाम लिस्ट में नहीं आ पाए, क्योंकि उनके परिवारों ने नाम बताने से इनकार कर दिया था.
अंग्रेजों के दौर में वोट देने का अधिकार केवल समाज के अत्यंत समृद्ध, कुलीन और प्रभावशाली वर्ग तक सीमित था. इसके लिए संपत्ति का स्वामित्व, भारी भू-राजस्व का भुगतान, आयकरदाता होना या उच्च स्तर की औपचारिक शिक्षा होना अनिवार्य था. देश का गरीब किसान, मजदूर, श्रमिक और अनपढ़ वर्ग इन कठोर शर्तों के कारण मतदान के अधिकार से पूरी तरह वंचित था. ब्रिटिश हुकूमत का मकसद शासन में केवल उन्हीं लोगों को भागीदार बनाना था जो उनके औपनिवेशिक हितों के अनुकूल हों.

1919 का मोंटग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार एक्ट में गुलाम भारत की कुल आबादी के मात्र 3 प्रतिशत हिस्से को ही मतदान का अधिकार मिल पाया था. जबकि 1935 के भारत सरकार अधिनियम में प्रांतीय विधानसभाओं की व्यवस्था में कुछ सुधार किए गए. साथ ही, संपत्ति व कर की सीमाओं को थोड़ा लचीला किया गया. जिससे मतदान का अधिकार बढ़कर कुल वयस्क आबादी के लगभग 10 से 12 प्रतिशत हिस्से तक ही पहुंच गया. हालांकि, देश की लगभग 88% से 90% आबादी पूरी तरह मताधिकार से वंचित रही.
वयस्क मताधिकार व्यवस्था को अपनाना अपने आप में मानव इतिहास का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव था. इसमें एक व्यक्ति, एक वोट के सिद्धांत को अपनाया गया था. राजा-रंक, अमीर-गरीब, साक्षर-निरक्षर सभी इस व्यवस्था में समान थे. जिस विशाल जनसंख्या को सदियों से निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखा गया था, वे रातोरात देश के लोकतांत्रिक भविष्य के निर्माता बन गए. यह बदलाव इस बुनियादी सोच पर आधारित था कि लोकतंत्र की सफलता के लिए जनता की राजनीतिक परिपक्वता से अधिक महत्वपूर्ण उनका जन्मजात नागरिक अधिकार है.
आज जब हम चुनावी सुधारों और SIR जैसी प्रक्रियाओं पर चर्चा कर कर रहे हैं तो 1951-52 की यह ऐतिहासिक यात्रा हमें अहसास कराती है कि हमारे गणतंत्र की जड़ें कितनी गहरी और संघर्षपूर्ण मेहनत से सींची गई हैं. शून्य से शुरुआत करके 17.32 करोड़ मतदाताओं की पहली सूची तैयार करना, घर-घर जाकर नागरिकों को उनका हक दिलाना और महिलाओं के आत्मसम्मान व पहचान के लिए कड़े कदम उठाना. यह सब करके भारतीय लोकतंत्र के उस गौरवशाली इतिहास का निर्माण किया गया. जिस पर आज भारत गर्व करता है.