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What is Chief Election Commissioner Removal Process? केरल विधानसभा ने 12 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया है. यह मांग मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों के बीच उठी है. इससे पहले मार्च 2026 में लोकसभा में ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए नोटिस दिया गया था, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ने उसे स्वीकार नहीं किया था.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केरल विधानसभा में प्रस्ताव पास होने मात्र से मुख्य चुनाव आयुक्त को वास्तव में पद से हटाया जा सकता है. अगर नहीं तो इसके लिए प्रक्रिया क्या है. क्या चुनाव आयुक्तों को भी हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के जजों की तरह कार्रवाई से बचने का विशेषाधिकार मिला होता है. अगर उन्हें पद से हटाना ही हो तो इसके लिए प्रक्रिया क्या होती है. आज इन तमाम सवालों का जवाब हम आपको इस एक्सप्लेनर में देने जा रहे हैं.
1. मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का संवैधानिक प्रावधान क्या है? संविधान का अनुच्छेद 324(5) क्या कहता है?
सबसे पहले आपको बताते हैं कि देश का मुख्य चुनाव आयुक्त एक संवैधानिक पद है और इस पद पर आसीन व्यक्ति को हटाने का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 324(5) में दिया या है. इस अनुच्छेद में कहा गया कि मुख्य चुनाव चुनाव को उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जिस प्रक्रिया से सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने का प्रावधान है. इस अनुच्छेद में मुख्य चुनाव आयुक्त की सेवा शर्तों और उनके पद की सुरक्षा का प्रावधान किया गया है.
2. क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को सामान्य सरकारी अधिकारी की तरह हटाया जा सकता है, या इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने जैसी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को किसी IAS, IPS या अन्य सामान्य सरकारी अधिकारी की तरह कार्यकारी आदेश जारी करके पद से नहीं हटाया जा सकता. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने जैसी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है. उन्हें पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाना पड़ता है. यह प्रक्रिया काफी मुश्किल बनाई गई है, जिससे कोई भी सत्ताधारी दल दुर्भावना से किसी CEC को पद से न हटा सके.
3. मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए किन आधारों की जरूरत होती है? साबित कदाचार और अक्षमता का कानूनी अर्थ क्या है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संविधान में दो आधार निर्धारित किए गए हैं. पहला है, जब किसी CEC पर भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग, पक्षपात या गंभीर कानूनी उल्लंघन का आरोप सिद्ध हो जाए. दूसरा है, जब CEC शारीरिक या मानसिक रूप से अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो जाए. इन आरोपों को सिद्ध करने के लिए केवल राजनीतिक बयानबाजी काफी नहीं होती बल्कि इसके लिए न्यायिक समिति द्वारा बाकायदा जांच करके सबूत प्रस्तुत करने होते हैं.
4. हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए लोकसभा और राज्यसभा में कितने सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं? नोटिस किसे दिया जाता है और उसे स्वीकार करने का अधिकार किसके पास है?
देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाना होता है. यह प्रस्ताव सत्ता पक्ष या विपक्ष कोई भी ला सकता है. उस प्रस्ताव पर लोकसभा के कम से कम 100 सदस्य और राज्य सभा के कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर होने जरूरी होते हैं. यह प्रस्ताव लोकसभा या राज्यसभा में सभापति को दिया जा सकता है.
लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति के पास इस बात का विशेषाधिकार होता है कि वे इस नोटिस को स्वीकार करें या प्रथम दृष्टया आधारहीन मानकर खारिज कर दें.
5. नोटिस स्वीकार होने के बाद जांच कैसे होती है? जांच समिति में कौन-कौन शामिल होते हैं और आरोप साबित करने की प्रक्रिया क्या है?
कानून विशेषज्ञों के मिुताबिक, अगर लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति नोटिस स्वीकार कर लेते हैं, तो आरोपों की जांच के लिए 3-सदस्यीय जांच समिति गठित की जाती है. इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक जज, हाई कोर्ट के एक जज और किसी प्रसिद्ध विधिवेत्ता को शामिल किया जाता है.
यह समिति प्रस्ताव में लगाए गए आरोपों की जांच करती है. इसके लिए वह गवाहों को बुला सकती है और CEC को अपनी सफाई पेश करने का अधिकार देती है. जांच खत्म होने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट संसद के पटल पर रखती है. अगर समिति आरोपों को खारिज कर देती है, तो महाभियोग की प्रक्रिया वहीं खत्म हो जाती है.
6. जांच में आरोप साबित होने पर संसद के दोनों सदनों में कितने मतों से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है? क्या दोनों सदनों में अलग-अलग मतदान होता है?
अगर जांच समिति महाभियोग में लगाए गए आरोपों को सच पाती है तो वह अपनी रिपोर्ट तैयार कर संसद को सौंप देती है. इसके बाद प्रस्ताव पर संसद के दोनों सदनों में बहस और मतदान होता है. वोटिंग के लिए खास प्रक्रिया अपनाई जाती है. जिस दिन वोटिंग हो, उस दिन वहां पर सदन के कम से कम 50 प्रतिशत मौजूद हों. दूसरी बात, वोट डालने वाले दो-दिहाई यानी 66 फीसदी सदस्य उस महाभियोग प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करें.
7. संसद से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति की क्या भूमिका होती है? किस चरण पर मुख्य चुनाव आयुक्त पद से हटाए जाते हैं?
महाभियोग प्रस्ताव पर चर्चा और वोटिंग के लिए संसद के दोनों सदनों की ओर से खास सत्र बुलाया जाता है. इस सत्र में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. राष्ट्रपति संसद की इस अनुशंसा को मानकर CEC को पद से हटाने का औपचारिक आदेश जारी करते हैं. उनके हस्ताक्षर और आदेश जारी होने के साथ ही मुख्य चुनाव आयुक्त अपने पद से मुक्त हो जाते हैं.
8. क्या राज्य विधानसभा मुख्य चुनाव आयुक्त को सीधे हटा सकती है? केरल विधानसभा के प्रस्ताव का वास्तविक कानूनी महत्व क्या है?
संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक यह संभव नहीं है. कोई भी राज्य विधान सभा प्रस्ताव पारित कर मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से नहीं हटा सकती. बिल्कुल नहीं. भारत के संवैधानिक ढांचे में राज्य विधानसभाओं के पास मुख्य चुनाव आयुक्त या केंद्रीय निर्वाचन आयोग के विरुद्ध कोई विधायी या प्रशासनिक अधिकार नहीं है.
ऐसे में केरल विधानसभा में सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्ताव का पारित होना महज राजनीतिक और प्रतीकात्मक संदेश देना है. यह किसी राज्य की ओर से अपनी अहसहमति जताने का एक तरीका है. इस प्रस्ताव से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की संवैधानिक स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ा है.
9. मार्च 2026 में ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए लोकसभा में दिए गए नोटिस को अध्यक्ष ने क्यों स्वीकार नहीं किया? उस फैसले में क्या आधार बताए गए थे?
सीईसी ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए विपक्षी सांसदों ने मार्च 2026 में लोकसभा अध्यक्ष को नोटिस दिया था. लेकिन स्पीकर ओम बिरला ने नोटिस में लगाए आरोपों में कोई दम न पाते हुए उन्हें खारिज कर दिया था. उस फैसले में उन्होंने कहा था कि आरोपों को साबित करने के लिए 'साबित कदाचार' या 'अक्षमता' का आधार सिद्ध नहीं हो रहा था.
10. क्या मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया एक जैसी है? दोनों के संवैधानिक संरक्षण में क्या अंतर है?
नहीं, दोनों को हटाने की प्रक्रिया एक जैसी नहीं है. संविधान में केवल मुख्य चुनाव आयुक्त को ही सुप्रीम कोर्ट के जजों की तरह विशेष संरक्षण दिया गया है. उन्हें हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया तय की गई है. जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को यह सुरक्षा कवच उपलब्ध नहीं है.
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश मिलने पर राष्ट्रपति एक कार्यकारी आदेश जारी कर इन्हें पद से हटा सकते हैं. इसके लिए संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने या वोटिंग की जरूरत नहीं होती है.
कुल मिलाकर, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ केरल विधानसभा का प्रस्ताव महज एक राजनीतिक संदेश भर है. इससे न तो ज्ञानेश कुमार की कुर्सी पर कोई खतरा है और न ही उनकी संवैधानिक स्थिति पर कोई आंच आती है. दिलचस्प बात ये है कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडी गठबंधन ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की है. लेकिन देश का शीर्ष न्यायालय भी सीईसी को पद से हटाने का अधिकार नहीं रखता है.