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इराक में अमेरिकी सेना के आखिरी ठिकानों से भी सैनिकों की वापसी बुधवार तक हो जाएगी. दो दशक से ज्यादा समय तक चले इस युद्ध में करीब 4,500 अमेरिकी सैनिक मारे गए. अब अमेरिकी सैनिकों की विदाई को ईरान और उसके सहयोगी अपनी बड़ी जीत मान रहे हैं. अमेरिका और इराक के बीच 2024 में सैनिकों की वापसी को लेकर समझौता हुआ था. यह प्रक्रिया अब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के दौरान पूरी हो रही है. खास बात यह है कि इसी दौरान अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध भी चल रहा है.
इराक के सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी से ईरान समर्थित संगठनों को देश में अपना प्रभाव बढ़ाने का ज्यादा मौका मिल सकता है. साथ ही इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठन भी कमजोर सुरक्षा व्यवस्था का फायदा उठाकर फिर सक्रिय हो सकते हैं. अमेरिका ने इसके पहले अफगानिस्तान को लेकर भी कुछ ऐसी ही तानाशाही दिखाई थी. हालांकि अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी के बाद तालिबान ने वहां बीते 5 सालों से धीरे-धीरे विकास की ओर बढ़ रहा है.
इराकी सुरक्षा विश्लेषक जसीम अल-बहादली के मुताबिक, अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी लंबे समय से इराक में ईरान के प्रभाव के खिलाफ एक संतुलन का काम करती रही है. अब अमेरिकी सैनिकों के हटने से ईरान को इस बात का रणनीतिक फायदा मिल सकता है. अल बहादली का कहना है कि ईरान समर्थित मिलिशिया इस वापसी को अपनी जीत के तौर पर पेश कर सकते हैं और सुरक्षा तथा राजनीतिक फैसलों में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं.
ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों के संगठन इस्लामिक रेजिस्टेंस इन इराक के कमांडर अबू मोजतबा अल-यासिरी ने अमेरिकी वापसी को ऐतिहासिक जीत बताया है. उनके मुताबिक, 30 सितंबर को इराक के इतिहास के एक काले अध्याय के खत्म होने का जश्न मनाया जाएगा. उन्होंने कहा कि इराक की संप्रभुता विदेशी सेनाओं से नहीं, बल्कि प्रतिरोध और इराकी जनता की इच्छा से सुरक्षित होनी चाहिए.
इराक में अमेरिकी सैनिकों की वापसी को लेकर आम तौर पर समर्थन है, लेकिन कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों और स्थानीय नेताओं को लगता है कि देश अभी पूरी तरह तैयार नहीं है. फल्लूजा के सुन्नी आदिवासी नेता अब्दुलरहमान अल-जुबाई ने कहा कि इराक अभी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी संभालने की स्थिति में नहीं है. उनके मुताबिक, हर इराकी पूरी संप्रभुता चाहता है, लेकिन अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन की इस तरह की विदाई से सुरक्षा में खालीपन पैदा होने का डर है.
अमेरिकी सेना ने 2003 में सद्दाम हुसैन की सरकार को हटाने के लिए इराक पर हमला किया था. इसके बाद अमेरिकी सैनिकों ने देश में लंबे समय तक अभियान चलाया और विद्रोही गुटों से लड़ाई की. 2011 के आखिर में अमेरिकी सैनिक इराक से वापस चले गए थे. लेकिन तीन साल से भी कम समय बाद उन्हें फिर लौटना पड़ा. इस बार मकसद इस्लामिक स्टेट के खिलाफ इराकी सुरक्षा बलों की मदद करना था.
2014 से 2017 के बीच इस्लामिक स्टेट के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान में अमेरिकी सेना ने अहम भूमिका निभाई. इराक पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और ईरान दोनों के साथ करीबी राजनीतिक और सैन्य संबंध रखने वाला प्रमुख देश रहा है. कई मौकों पर दोनों देशों के बीच तनाव का असर इराक की जमीन पर भी दिखाई दिया. 2020 में अमेरिका ने बगदाद एयरपोर्ट के पास ईरानी कमांडर कासिम सुलेमानी को ड्रोन हमले में मार दिया था. इसके बाद ईरान समर्थित गुटों ने इराक में अमेरिकी ठिकानों पर कई हमले किए.
ईरान लंबे समय से चाहता रहा है कि अमेरिकी सैनिक मध्य पूर्व से पूरी तरह बाहर जाएं. तेहरान इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी को अपने सहयोगी सशस्त्र गुटों के लिए बड़ी कामयाबी के तौर पर देख रहा है. ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के उपाध्यक्ष अमीर हयात मोकद्दम ने कहा कि अमेरिकी सैनिकों और क्षेत्र से उनकी मौजूदगी खत्म होने के बाद इराक में स्थायी सुरक्षा कायम हो सकती है. ईरान ने अमेरिकी सैनिकों की वापसी का स्वागत किया है. उसका कहना है कि क्षेत्र में सक्रिय प्रतिरोधी गुट अमेरिकी सेना के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं. अमेरिका का आरोप है कि ईरान समर्थित इराकी मिलिशिया क्षेत्रीय संघर्ष में शामिल रहे हैं. वॉशिंगटन के मुताबिक, इन गुटों ने ईरान के निर्देश पर पड़ोसी देशों को भी निशाना बनाया है. दूसरी तरफ बगदाद सरकार इन संगठनों के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश की बात कहती रही है.
अमेरिकी सैनिकों की वापसी को लेकर सबसे बड़ी सुरक्षा चिंताओं में से एक इस्लामिक स्टेट को लेकर है. इराकी सरकार और उत्तरी इराक के कुर्द क्षेत्र के कुछ सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि अमेरिकी खुफिया जानकारी, लॉजिस्टिक मदद और ड्रोन की कमी से इस्लामिक स्टेट के बचे हुए नेटवर्क को दोबारा सक्रिय होने का मौका मिल सकता है. करीब एक दशक पहले इस्लामिक स्टेट ने इराक के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था. संगठन ने हजारों लोगों की हत्या की थी. बाद में अमेरिकी समर्थन वाली सेनाओं के अभियान में उसका क्षेत्रीय नियंत्रण खत्म कर दिया गया. कुर्द कमांडर सिरवान बरजानी ने दावा किया कि गठबंधन की वापसी की खबर सामने आने के बाद से इस्लामिक स्टेट की स्लीपर सेल्स की गतिविधियों में हलचल देखी गई है. उनके मुताबिक, इससे संगठन के लड़ाकों का मनोबल बढ़ा है.
अमेरिका ने तालिबान को सत्ता से हटाने के लिए अक्टूबर 2001 में अफगानिस्तान पर हमला किया था. अमेरिका का आरोप था कि तालिबान ओसामा बिन लादेन और अल-कायदा के दूसरे लोगों को पनाह दे रहा है. अमेरिका ने इन्हीं लोगों को सितंबर 2001 में हुए आतंकी हमले के लिए जिम्मेदार माना था. युद्ध के दौरान अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या एक समय 1 लाख 10 हजार तक पहुंच गई थी. हालांकि, दिसंबर 2020 तक वहां अमेरिकी सैनिकों की संख्या घटकर करीब 4 हजार रह गई थी.
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, अक्टूबर 2001 से सितंबर 2019 के बीच अफगानिस्तान युद्ध पर करीब 778 अरब डॉलर खर्च हुए. अमेरिकी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2001 से 2019 के बीच अफगानिस्तान पर अमेरिका का कुल खर्च करीब 822 अरब डॉलर रहा. इस लंबे युद्ध में अमेरिका को अपने सैनिकों की भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. 2001 में युद्ध शुरू होने के बाद से 2300 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में मारे गए. वहीं, करीब 20,660 अमेरिकी सैनिक लड़ाई में घायल हुए.
इराकी सुरक्षा बलों के मुताबिक, इस्लामिक स्टेट से जुड़ा एक संदिग्ध सेल अमेरिकी सैनिकों की वापसी के दौरान आत्मघाती हमले की तैयारी कर रहा था. इराकी सुरक्षा और सेना के अधिकारियों का कहना है कि यह घटना बताती है कि कई सैन्य हार के बावजूद इस्लामिक स्टेट अब भी सुरक्षा व्यवस्था में मौजूद कमजोरियों का फायदा उठा सकता है. किर्कुक के वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी कर्नल खालिद अल-बयाती के मुताबिक, संगठन यह संदेश देना चाहता है कि वह अभी भी हमले करने की क्षमता रखता है. अमेरिकी सैनिकों की विदाई के बाद इराक को अपनी सुरक्षा व्यवस्था संभालने की पूरी जिम्मेदारी उठानी होगी. आने वाले समय में यह देखा जाएगा कि देश ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों के प्रभाव और इस्लामिक स्टेट के बचे नेटवर्क के बीच सुरक्षा संतुलन किस तरह कायम करता है.