एक दिन, दो मुलाकातें: इजरायल से यारी, भारत के साथ सैन्य तैयारी! मिडिल ईस्ट में क्या है UAE का 'पावर प्लान'?
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 27 सितंबर 2026 को संयुक्त अरब अमीरात की एक गोपनीय यात्रा की. उन्होंने अबू धाबी में यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात की. उसी दौरान भारतीय फौज का हाईलेवल डेलिगेशन कुछ दूर मौजूद था? क्या है इन मुलाकातों के मायने, समझते हैं इस एक्सप्लेनर में.
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने रविवार को अबू धाबी का दौरा करके यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात की है. चार घंटे के सीक्रेट दौरे में हुई इस अप्रत्याशित मुलाकात ने मिडिल ईस्ट में नई हलचल मचा दी है. नेतन्याहू के प्रधानमंत्री कार्यालय और UAE के विदेश मंत्रालय की ओर से इस डेवलपमेंट पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. नेतन्याहू और नाहयान की इस मुलाकात के बीच भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी यूएई में किसी और कार्यक्रम में शामिल होने अबूधाबी में मौजूद थे. भारतीय सेना का ये डेलिगेशन 27 सितंबर 2026 को '5वीं भारत-यूएई आर्मी टू आर्मी स्टाफ टॉक्स' में शामिल होने पहुंचा था. इस दौरान अधिकारियों ने दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय प्रशिक्षण, संयुक्त सैन्य अभ्यास 'डेजर्ट साइक्लोन' और रक्षा सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक नेतन्याहू के इस दौरे की भनक किसी को भी नहीं थी. टाइम्स ऑफ इजरायल ने भी इस मुलाकात को अपनी एक रिपोर्ट में जगह दी है.
UAE की 'रण'नीति
डिप्लोमेसी में अचानक किसी बड़ी घटना का घट जाना किसी एक्शन के रियेक्शन की क्षणिक और तत्कालिक प्रतिक्रिया हो सकती है या किसी अन्य वजह से उसे रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मूवमेंट माना जाता है. जबकि नीतियों को प्रभावित करने वाले किसी बड़े फैसले की तैयारियां सालों पहले शुरू हो जाती हैं. अब नेतन्याहू के दौरे और भारत के सैन्य अधिकारियों की यूएई में मौजूदगी के दोनों घटनाक्रमों को एक साथ मिलाकर फ्लैशबैक में देखें तो बीते 10 सालों में यूएई ने सिर्फ भारत के साथ कारोबार ही नहीं बल्कि सुरक्षा समेत कई क्षेत्रों पर साथ काम करने हुए भारच-यूएई के रिश्तों को मजबूती देते हुए नए मुकाम पर पहुंचाया है.
27 सितंबर के भारतीय सैन्य अधिकारियों के अबूधाबी दौरे से पहले 5 से 6 जनवरी 2026 तक तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने यूएई का दो दिवसीय आधिकारिक दौरा किया था, जहां उन्होंने यूएई सशस्त्र बलों के शीर्ष सैन्य नेतृत्व से मुलाकात की थी.
भारत और यूएई के बीच मजबूत होते रक्षा समझौतों की बात करें तो दिसंबर 2020 में भारत के तत्कालनीन सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने संयुक्त अरब अमीरात का दौरा किया था. उसी दौरान यूएई अब्राहम अकॉर्ड के जरिए इजरायल के नजदीक आया. यानी भारत-यूएई के रिश्तों में नए युग की शुरुआती बहुत पहले हो गई थी.
पहले भी मिल चुके नेतन्याहू और नाहयान
मिडिल ईस्ट की कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ महीने पहले भी नेतन्याहू और नाहयान की सीक्रेट मुलाकात हुई थी. माना जा रहा है कि 'मक्का समझौते' की पेचीदगियों और अरब जगत में मची अंदरूनी खींचतान और वर्चस्व की लड़ाई के बीच कथित 'इस्लामिक नाटो' के मसौदे को 'कभी हां-कभी ना' के भंवर में फंसा देख संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई ने अपनी सुरक्षा मजबूत करने के लिए अलग रास्ते पर दौड़ना शुरू कर दिया है.
28 फरवरी को शुरू हुए ईरान युद्ध के दौरान हमलों का शिकार होने के बाद से, UAE ने अमेरिका और इजरायल के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है. इजरायल के साथ उसके संबंधों की शुरुआत साल 2020 के अब्राहम अकॉर्ड के परिणामस्वरूप हुई थी. इजरायल के साथ संबंध UAE को क्षेत्रीय प्रभाव के लिए एक जरिया बनाने के साथ वाशिंगटन तक उसकी पहुंच और पैठ को मजबूत बनाने के लिए एक पुल का काम करते हैं.
नेतन्याहू का ये हाईप्रोफाइल दौरा उस समय हुआ है जब इसी महीने में इजरायली अखबार 'हारेट्ज' ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था कि शेख मोहम्मद ने 7 अक्टूबर, 2023 से करीब 10 दिन पहले नेतन्याहू को चेतावनी दी थी कि ईरान का प्रॉक्सी हमास, इजरायल के खिलाफ एक बड़े ऑपरेशन/हमले की तैयारी कर रहा है.
हारेट्ज की रिपोर्ट के मुताबिक, यह चेतावनी इजरायली खुफिया एजेंसियों यानी मोसाद और इजरायल डिफेंस फोर्स यानी सेना तक नहीं पहुंचाई गई थी. इस खबर के बाद मीडिया हाउस पर भड़के नेतन्याहू ने उसे कोर्ट में घसीटा है. नेतन्याहू का कहना है कि इस रिपोर्ट की वजह से उन्हें चुनाव प्रचार में मुश्किलों का सामना करना पड़ा रहा है.
नए विकल्प की तलाश
जिस समय खाड़ी देशों में व्यापार के सारे रास्ते (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और बाब अल-मंदेब) एक-एक करके पुरानी व्यवस्था से निकलकर नए नियंत्रण में जाते दिख रहे हैं. ऐसे में यूएआई अब गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल यानी 'खाड़ी सहयोग परिषद' का इकलौता देश है जो इजरायल और भारत के साथ मिलकर सुरक्षित भविष्य की रास्ता बनाने के लिए तेजी से तालमेल बढ़ा रहा है. अब इजरायल ने खुद की सुरक्षा के लिए तकनीकि के उस्ताद इजरायल और मिलिट्री मास्टर भारत से हाथ मिलाकर सुरक्षित अमीरात की दिशा में कदम बढ़ा दिया है.
टेक मास्टर इजरायल के रक्षा उत्पादों का कोई सानी नहीं है. नेतन्याहू अभी संयुक्त राष्ट्र के मंच से पेजर और स्टारलिंक की डिवाइस दिखाकर खुद को मिडिल ईस्ट का सबसे अहम खिलाड़ी बता चुके हैं. इजरायल अपनी सॉफ्टवेयर पावर के दम पर मोबाइल फोन से लेकर किसी भी इलेक्ट्रानिक डिवाइस में सेंध लगाकर उसका अपने मनमाफिक इस्तेमाल करने में सक्षम है. ऐसे में उनकी अबूधाबी यात्रा को इजरायल और यूएई के मजबूत हो रहे संबंधों का अगला पड़ाव माना जा रहा है.
ईरान युद्ध से सबक!
ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों के बीच तेहरान ने खाड़ी में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर अनगिनत हमले किए. एक अकेला ओमान है जो ईरान की मार से बचा रहा. क्योंकि ओमान ने अपनी तटस्थ और मध्यस्थता की नीति के कारण 28 फरवरी 2026 में मिडिल ईस्ट के भयानक सैन्य संघर्ष के दौरान ईरान के हमलों से खुद को पूरी तरह बचाए रखा.
ओमान ने अमेरिकी हमले की निंदा करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा में हॉर्मुज की सुरक्षा और अमेरिका-ईरान के बीच राजनीतिक समाधान की वकालत की जबकि दूसरी ओर कतर ने पाकिस्तान के साथ मिलकर ईरान और अमेरिका के बीच कूटनीति और मध्यस्थता में खुलकर सक्रिय भूमिका निभाई. ईरान ने वैसे तो कई देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, लेकिन उसकी मार का सबसे ज्यादा बुरा असर यूएई की साख पर पड़ा, क्योंकि दुबई समेत कई हिस्सों में ईरानी मिसाइल और रॉकेट के हमलों से बुर्ज खलीफा समेत कई अहम प्रतिष्ठानों में बैठे लोगों को बारूदी धुएं का अहसास हुआ.
अबूधाबी में भारतीय सैन्य अधिकारियों और नेतन्याहू की मौजूदगी को एक साथ जोड़ कर देंखे तो ऐसा लगता है कि यूएई नई राह चुनते हुए इजरायल और भारत दोनों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सुरक्षित 'अमीरात' बनाने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है.
अरब जगत में बदलाव की बयार?
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को भी 2026 की विस्फोटक चुनौतियों का अंदाजा काफी पहले लग गया होगा. उसी समय से वह सऊदी किंगडम की ऑयल बेस्ड इकोनॉमी को मल्टी सेक्टर शिफ्ट करने के लिए काम कर रहे थे, इसके लिए उन्होंने कुछ ऐसे फैसले लिए, जो सऊदी ने पहले कभी नहीं लिए थे. जैसे विदेशी धनकुबेरों के लिए सऊदी के कड़े नियमों में ढील देना. सऊदी महिलाओं को पहले से अधिकार देना, ताकि पुरानी परंपराओं का हवाला देकर वहां किसी तरह के निवेश आने से रोका न जा सके.
हूतियों ने मौके का फायदा उठाकर माहौल खराब किया है. हूती नेताओं का दावा है कि उन्होंने लाल सागर पर सऊदी की पकड़ और अकड़ ढीली कर दी है. ईरान के प्रॉक्सी हूती खुद को इंटरनेशनल युद्ध लड़ने में सक्षम बता रहे हैं. ऐसे में लगता है कि सऊदी अरब की मक्का पैक्ट जैसी कोशिशों से ज्यादा यूएई ने खुद को आर्थिक और सामरिक दोनों रूपों से सुरक्षित करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है.
मिडिल-ईस्ट के बाकी देश मानो अब भी 'मुस्लिम ब्रदरहुड' जैसी पुरानी लकीर पर चल रहे हैं. वहीं GCC, OPEC के बाद ISLAMIC NATO के जन्म की कहानी तक की घटनाओं पर गहराई से नजर डालें तो हूतियों की हरकतों पर अमेरिका की 'वेट एंड वॉच' पॉलिसी ने उन अटकलों को हवा दी, कि कहीं मिडिल-ईस्ट की सत्ता का संतुलन बदल तो नहीं रहा? जिसके बाद यूएई ने इजरायल और भारत के साथ कदमताल बढ़ाकर ईरान या किसी अन्य खतरे से खुद को बचाने का 'पावरप्लान' बना लिया है.