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Inside Story: टनल में दबी सांसें! वॉट्सऐप पर नक्शे... नेपाल में 500 इंजीनियर्स का एक ग्रुप कैसे बना देवदूत?

नेपाल में टनल हादसे के दौरान 500 इंजीनियर्स के वॉट्सऐप ग्रुप ने नक्शों की मदद से रचा इतिहास. जानिए जिंदगी बचाने वाले इस जांबाज मिशन की पूरी इनसाइड स्टोरी.

Written ByRavindra Pratap Singh
Published: Sep 04, 2026, 05:11 PM IST|Updated: Sep 04, 2026, 09:41 PM IST
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Inside Story: टनल में दबी सांसें! वॉट्सऐप पर नक्शे... नेपाल में 500 इंजीनियर्स का एक ग्रुप कैसे बना देवदूत?
Image Credit: नेपाल में आई जल-प्रलय के बाद 500 इंजीनियर्स के ग्रुप ने रेस्क्यू ऑपरेशन में की मदद और कई जिंदगियां बचाईं.

About the Author

    Ravindra Pratap Singh

    Ravindra Pratap Singh

    रवींद्र प्रताप सिंह ने साल 2015 में जागरण.कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा मौजूदा समय वो ज़ी न्यूज डिजिटल में चीफ सब एडिटर हैं. अगस्त 2025 में उन्होंने ज़ी न्यूज ज्वाइन किया है. रवींद्र देश और दुनिया की खबरों के अलावा खेलों में क्रिकेट जगत और क्राइम की खबरों पर बेहतरीन पकड़ रखते हैं. इसके पहले रवींद्र रिपब्लिक भारत में इवनिंग शिफ्ट के इंचार्ज रहे और शाम की शिफ्ट संभालते हुए होम पेज की जिम्मेदारी रवींद्र के ऊपर थी. उससे पहले रवींद्र ने जनसत्ता और न्यूज नेशन में भी शाम की शिफ्ट और होम पेज की जिम्मेदारी बखूबी निभाई. इसके पहले रवींद्र ने 5 सालों तक पी7 और लाइव इंडिया जैसे न्यूज चैनलों में काम किया था. रवींद्र आकाशवाणी में काम करने का अनुभव रखते. अवध यूनिवर्सिटी से मॉस कम्युनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएट रवींद्र पिछले डेढ़ दशक से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं. आप रवींद्र से जुड़ने के लिए Ravindra.Singh@India.com पर मेल कर सकते हैं या फिर फेसबुक पर संपर्क करने के लिए https://www.facebook.com/pintu.singh.397 और एक्स पर https://x.com/rs66533 रवींद्र से संपर्क किया जा सकता है. 
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    नेपाल की त्रिशूली घाटी में आई भीषण तबाही के बीच एक WhatsApp ग्रुप अब राहत और बचाव अभियान के लिए किसी लाइफलाइन से कम नहीं रह गया है. आपदा से ठीक पहले इंजीनियरों ने जिस ग्रुप को बनाया था, आज उसी के जरिए सुरंगों के नक्शे, बिजली परियोजनाओं की जानकारी और अंदर के रास्तों से जुड़े जरूरी दस्तावेज बचाव दलों तक पहुंच रहे हैं.

    इस ग्रुप में 500 से ज्यादा लोग जुड़े हुए हैं. इनमें इंजीनियर, जलविद्युत परियोजनाओं में काम कर चुके कर्मचारी, सरकारी अधिकारी और अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल हैं. जब भी बचाव दलों को किसी सुरंग या पावर प्लांट से जुड़ी जानकारी चाहिए होती है, ग्रुप में सवाल पूछा जाता है और कुछ ही देर में उस जगह को करीब से जानने वाला कोई व्यक्ति जवाब देने की कोशिश करता है.

    तबाही के बाद क्यों अहम हो गया WhatsApp ग्रुप?

    26 अगस्त को नेपाल-चीन सीमा के पास ग्लेशियर और पहाड़ का बड़ा हिस्सा ढहने के बाद पानी, मिट्टी, चट्टानों और मलबे की एक विशाल लहर त्रिशूली घाटी की ओर बढ़ी. देखते ही देखते कई इलाके इसकी चपेट में आ गए. जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगें और दूसरे ढांचे भी मलबे में दब गए. रेस्क्यू टीमों के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि उन्हें पता ही नहीं था कि मलबे के नीचे सुरंग किस दिशा में जा रही है और अंदर कौन सा रास्ता किस हिस्से तक पहुंचता है. ऐसे समय में इंजीनियरों का यह ग्रुप बेहद काम आया.

    पिछले सप्ताह जब बचावकर्मी चीन की सीमा के करीब हिमालयी इलाके में मौजूद चिलिमे जलविद्युत परियोजना के मलबे में दबे हिस्सों की तलाश कर रहे थे, तब एक सरकारी अधिकारी ने ग्रुप में मदद मांगी. अधिकारी ने पूछा कि क्या चिलिमे परियोजना का लेआउट और नक्शा उपलब्ध कराया जा सकता है. कुछ ही मिनट बाद ग्रुप के एक सदस्य ने परियोजना के पावरहाउस का नक्शा और वहां तक पहुंचने वाली सुरंगों से जुड़ी जानकारी साझा कर दी.

    सुरंगों के नक्शे से लेकर पुराने कर्मचारियों के अनुभव तक

    यह WhatsApp ग्रुप अब महज बातचीत का माध्यम नहीं रह गया है. यह मौके पर काम कर रहे बचाव दलों और परियोजनाओं को करीब से जानने वाले विशेषज्ञों के बीच एक तरह का रियल टाइम सहायता केंद्र बन गया है. इंजीनियर उन नक्शों और ड्रॉइंग को साझा कर रहे हैं, जिनसे पता चलता है कि सुरंग कहां जाती है, अंदर कौन से चैंबर बने हुए हैं और परियोजना के अलग-अलग हिस्से किस तरह एक-दूसरे से जुड़े हैं. पुराने कर्मचारी भी बचाव कर्मियों की मदद कर रहे हैं. उन्होंने वर्षों तक इन परियोजनाओं के अंदर काम किया है, इसलिए उन्हें उन रास्तों और जगहों की जानकारी है, जो अब मलबे और पानी के कारण बचाव दलों को दिखाई तक नहीं दे रहे.

     

    १० दिनको कठिन संघर्षपछि—दुई जीवनको पुनर्जन्म, आशाको अद्भुत विजय#Trishuli3A सुरुङबाट दुई जनाको जिवितै उद्धार pic.twitter.com/MTnY9UlOG5

    — Nepali Army (@NepaliArmyHQ) September 4, 2026

     

    आपदा के बाद सुरंगों की स्थिति भी पहले जैसी नहीं रही है. पानी और मलबे ने आसपास का पूरा भूगोल बदल दिया है. कई जगह सुरंगों के भीतर मिट्टी, पत्थर और चट्टानें जमा हो गई हैं. नेपाल सेना के प्रवक्ता राजा राम बस्नेत ने Reuters को बताया कि बाढ़ ने सुरंगों के आसपास की जमीन और उनकी संरचना तक बदल दी है. उनका कहना था कि यह सुरंगों का सामान्य तरीके से बंद होना नहीं है.

    लापता कर्मचारियों को खोजने में भी मिल रही मदद

    इंजीनियरों का ग्रुप सिर्फ नक्शों तक सीमित नहीं है. इसके जरिए उन कर्मचारियों की जानकारी भी जुटाई जा रही है, जिनका आपदा के बाद कोई पता नहीं चला. ग्रुप में लापता कर्मचारियों के नाम और मोबाइल नंबर साझा किए जा रहे हैं. इसके बाद अधिकारी इन जानकारियों को दूरसंचार एजेंसियों तक पहुंचा सकते हैं. मोबाइल फोन की आखिरी लोकेशन से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि आपदा के वक्त कर्मचारी किस इलाके में थे. बचाव अभियान में लगी टीमों के लिए यह जानकारी काफी अहम साबित हो सकती है, क्योंकि कई जगह मलबे की मोटी परत के नीचे सुरंगों और कमरों तक पहुंचना बेहद मुश्किल है.

    चिलिमे और रसुवागढ़ी में अब भी जिंदगी की तलाश

    नेपाल के स्वतंत्र बिजली उत्पादक संघ के मुताबिक चिलिमे परियोजना में कम से कम आठ लोगों के फंसे होने की आशंका है. वहीं नेपाल विद्युत प्राधिकरण के एक अधिकारी के अनुसार रसुवागढ़ी जलविद्युत परियोजना में करीब 46 लोग फंसे हो सकते हैं. रसुवागढ़ी में बचाव दल एक सुरंग के अंदर करीब 250 मीटर तक पहुंचने में सफल रहा था, लेकिन इसके बाद रास्ता मलबे से बंद मिला. इसके बावजूद तलाश बंद नहीं की गई है. 

    नेपाल विद्युत प्राधिकरण के बोर्ड सदस्य अम्शु किरण शाही ने कहा कि बचाव दल दोबारा सुरंग के अंदर जाकर लोगों की तलाश करने की कोशिश कर रहा है. उनका मानना है कि फंसे हुए कर्मचारी किसी ऐसे चैंबर में हो सकते हैं, जहां खाने और पानी की सुविधा मौजूद हो. एक अधिकारी के मुताबिक बचाव दलों ने WhatsApp ग्रुप के जरिए परियोजना के पुराने कर्मचारियों से भी सलाह ली. पुराने कर्मचारियों ने सुरंगों और परियोजना के ढांचे से जुड़े जरूरी नक्शे और दूसरी जानकारी उपलब्ध कराई.

     

    #WATCH | Trishuli, Nepal | Rescue workers have rescued two persons from inside the tunnel of the Trishuli 3A hydropower project ten days after the floods struck Nepal on August 26

    According to the rescue team, voices of more than one person were heard from inside the tunnel… pic.twitter.com/7AjhEgzP5I

    — ANI (@ANI) September 4, 2026

    छह दिन बाद खुला रास्ता, फिर सामने आया जिंदगी का सबूत

    अपर त्रिशूली 3ए जलविद्युत परियोजना में बचाव अभियान और भी मुश्किल था. टीमों को मलबे के नीचे दबी सुरंग तक पहुंचने में करीब छह दिन लग गए. बचावकर्मियों ने उन संभावित जगहों पर ऑक्सीजन भी पहुंचाई, जहां कर्मचारियों के फंसे होने की आशंका थी. हर गुजरते घंटे के साथ उम्मीद और चिंता दोनों बढ़ रही थीं. 

    फिर शुक्रवार को बचाव दलों को बड़ी कामयाबी मिली. सुरंग से दो कर्मचारियों को जिंदा बाहर निकाल लिया गया. दोनों ने आपदा के नौ दिन बाद दुनिया की रोशनी देखी. रेस्क्यू किए गए कर्मचारियों की पहचान 30 वर्षीय मैकेनिकल फोरमैन संजय साह और 45 वर्षीय मैकेनिकल सुपरवाइजर कबीर महर्जन के तौर पर हुई. नेपाल के ऊर्जा मंत्री बिराज भक्त श्रेष्ठ ने इस मौके पर कहा कि जब तक सांस है, तब तक उम्मीद बाकी है. उन्होंने बताया कि प्रभावित सुरंगों में बचाव अभियान जारी है और उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई है.

    परिवारों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था बचाव

    दोनों कर्मचारियों के जिंदा मिलने की खबर जैसे ही सामने आई, उनके परिवारों में खुशी की लहर दौड़ गई. नेपाल सेना ने इस बचाव अभियान को उम्मीद की एक असाधारण जीत बताया. कबीर महर्जन के भाई अमीर महर्जन ने AFP से कहा कि वह इस खबर के बाद बेहद खुश हैं और ऐसा लग रहा है जैसे उनके दिल का बोझ कुछ हल्का हो गया हो. कबीर की भाभी बताने वाली लक्ष्मी नैनी अस्पताल के बाहर उनका इंतजार कर रही थीं. उन्हें सोशल मीडिया के जरिए कबीर के जिंदा होने की खबर मिली. पहले तो उन्हें इस पर यकीन ही नहीं हुआ. परिजनों के लिए नौ दिनों तक किसी खबर का इंतजार करना आसान नहीं था. ऐसे में जब सुरंग से दोनों कर्मचारियों के जिंदा बाहर आने की खबर मिली, तो उनके लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था.

    मोबाइल पर भी चल रहा बचाव अभियान

    नेपाल में राहत और बचाव अभियान जमीन पर मशीनों, सुरंगों में ऑक्सीजन पाइप, हेलीकॉप्टर और बचावकर्मियों की मदद से चल रहा है. इसी के साथ मोबाइल फोन पर बना यह इंजीनियरों का WhatsApp ग्रुप भी अपनी भूमिका निभा रहा है. कहीं किसी सुरंग का नक्शा चाहिए, कहीं पुराने कर्मचारी से किसी रास्ते की जानकारी लेनी है और कहीं लापता व्यक्ति की मोबाइल लोकेशन का सुराग तलाशना है. ऐसे हर मौके पर यह ग्रुप बचाव टीमों और विशेषज्ञों के बीच एक पुल का काम कर रहा है.

    नेपाल की त्रासदी में हजारों लोग लापता

    26 अगस्त की इस आपदा ने नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र में भारी तबाही मचाई. चीन-नेपाल सीमा के पास पहाड़ और ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने के बाद पानी, बर्फ, मिट्टी और चट्टानों का विशाल बहाव त्रिशूली घाटी की तरफ आया. नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने इस तबाही की तुलना 'हिमालयी सुनामी' से की थी. नेपाल की आपदा प्राधिकरण के मुताबिक बड़ी संख्या में शव बरामद किए जा चुके हैं और हजारों लोग अब भी लापता हैं. चीन की ओर से भी मौतों और लापता लोगों की जानकारी सामने आई है. दोनों देशों के आंकड़ों को मिलाकर मृतकों की संख्या 1,287 तक पहुंच गई है, जबकि 5,624 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं.

    नेपाल और तिब्बत में लापता लोगों में 34 से ज्यादा देशों के 800 से अधिक विदेशी नागरिक भी शामिल हैं. कई परिवार कई दिनों से अपनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं. कुछ परिवारों ने तो उम्मीद टूटने के बाद प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार तक शुरू कर दिए हैं. लेकिन सुरंग से नौ दिन बाद दो लोगों का जिंदा निकलना बताता है कि इस त्रासदी के बीच उम्मीद की एक छोटी सी किरण अब भी बाकी है.

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