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सैकड़ों हैकर्स और अरबों डॉलर की लूट! किम जोंग उन का वो 'सीक्रेट वेपन' जो बन गई दुनिया की सबसे बड़ी साइबर थ्रेट

किस तरह से उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन का सीक्रेट 'लाजरस ग्रुप' दुनिया भर के क्रिप्टो एक्सचेंजों और बैंकों से अरबों डॉलर चुरा रहा है. इस खतरनाक साइबर थ्रेट और ग्लोबल सिक्योरिटी के लिए इसके बढ़ते खतरे की पूरी इनसाइड स्टोरी.

सैकड़ों हैकर्स और अरबों डॉलर की लूट! किम जोंग उन का वो 'सीक्रेट वेपन' जो बन गई दुनिया की सबसे बड़ी साइबर थ्रेट
Image Credit: किम जोंग उन का वो 'सीक्रेट वेपन' जिससे कांप उठी ग्लोबल क्रिप्टो दुनिया

दुनियाभर में साइबर अपराध और डिजिटल संपत्तियों की चोरी की घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा रखी है. हाल ही में हुए $6.3 बिलियन के बिनांस  हैक के पीछे जब जांच एजेंसियों ने तार जोड़ने शुरू किए, तो निशान सीधे उत्तर कोरिया की ओर गए. अमेरिकी जांच एजेंसी FBI और क्रिप्टो प्लेटफॉर्म बिनांस दोनों ने ही इस हमले का जिम्मेदार उत्तर कोरियाई हैकिंग ग्रुप ‘ट्रेडरट्रेटर’ को ठहराया है. हालांकि, उत्तर कोरिया हमेशा की तरह इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करता रहा है और इन्हें अमेरिका की सियासत बताता रहा है.

लेकिन सवाल यह उठता है कि एक आर्थिक रूप से अलग-थलग पड़ा देश इतनी खतरनाक और आधुनिक साइबर सेना आखिर तैयार कैसे कर लेता है? मीडिया रिपोर्टों, जानकारों और उत्तर कोरिया से भागे शरणार्थियों (Defectors) के बयानों से जो बातें सामने आई हैं, वे हैरान कर देने वाली हैं.

बचपन से ही तलाश और चयन: 11 साल की उम्र में शुरू हो जाता है हैकर बनने का सफर. उत्तर कोरिया में हैकर्स बनाने का काम किसी अल्पकालिक योजना का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक दशकों पुरानी व्यवस्थित और रणनीतिक प्रक्रिया है.

प्रतिभा की पहचान: देश भर के स्कूलों से हर साल 150 से 200 उन बच्चों को चुना जाता है जो मैथ और कंप्यूटर साइंस में असाधारण प्रतिभा दिखाते हैं. इनमें से कई बच्चों की उम्र महज 11 या 12 साल होती है.

कठोर प्रशिक्षण: चुने गए इन बच्चों को विशेष कंप्यूटर संस्थानों में भेजा जाता है. 17 साल की उम्र में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले छात्रों को देश की शीर्ष यूनिवर्सिटीज में दाखिला मिलता है.

सैन्य बल का हिस्सा: विश्वविद्यालय की पढ़ाई और सख्त स्क्रीनिंग के बाद, सबसे होनहार युवाओं को सेना की साइबर यूनिट में शामिल कर लिया जाता है.

उत्तर कोरिया से भागकर दक्षिण कोरिया में बसे किम ह्युंग-ग्वांग (जो खुद कभी इन हैकर्स को प्रशिक्षण देते थे) का कहना है कि यह किम जोंग उन का एक ‘गुप्त हथियार’ है. उनका मानना है कि दुनिया में कोई भी अन्य देश इस तरह बच्चों की मर्जी पूछे बिना उन्हें सिर्फ सरकारी साइबर एजेंट बनाने के लिए इतनी गहराई से तैयार नहीं करता.

इन छात्रों को अपडेटेड मैथ, विदेशी भाषाएं, क्रिप्टोकरेंसी सिस्टम और विदेशी सॉफ्टवेयर/हार्डवेयर को रिवर्स-इंजीनियर (तोड़ने और समझने) की ट्रेनिंग दी जाती है. जो छात्र मुख्य हैकिंग टीम में जगह नहीं बना पाते, उन्हें पश्चिमी कंपनियों के लिए रिमोट कंट्रोल सॉफ्टवेयर डेवलपर के रूप में काम करने भेजा जाता है, ताकि वे देश के लिए विदेशी मुद्रा कमा सकें.

जुए से अरबों डॉलर की क्रिप्टोकरंसी की हैकिंग तक

उत्तर कोरिया ने अपनी पहली साइबर यूनिट 1998 में स्थापित की थी. लेकिन 2011 में किम जोंग उन के सत्ता में आने के बाद इस विभाग की अहमियत तेजी से बढ़ी. 2013 में किम जोंग उन ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि परमाणु हथियारों और मिसाइलों की तरह ही साइबर युद्ध भी उनकी सेना की चौतरफा हमला करने वाली तलवार है. शुरुआती दौर में ये हैकर्स केवल अवैध सट्टेबाजी और जुए की वेबसाइट्स चलाकर पैसे जुटाते थे. लेकिन जैसे-जैसे उनकी क्षमताएं बढ़ीं, उनके निशाने भी बड़े होते चले गए.

लजारस ग्रुप और रोनिन नेटवर्क: FBI के मुताबिक, ‘ट्रेडरट्रेटर’ असल में उत्तर कोरिया के चर्चित ‘लजारस ग्रुप’ (Lazarus Group / APT38) से ही जुड़ा एक हिस्सा है. इस ग्रुप पर 2022 में रोनिन ब्लॉकचेन नेटवर्क से सैकड़ों मिलियन डॉलर चुराने का आरोप लगा था.

बिनांस हमला: हालिया बिनांस हैक में हैकर्स ने बेहद चालाकी भरा रास्ता अपनाया. उन्होंने कंपनी के कर्मचारियों को फर्जी जॉब इंटरव्यू और विज्ञापनों में छिपे घातक सॉफ्टवेयर के जरिए जाल में फंसाया. इसके बाद उन्होंने आंतरिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल का फायदा उठाकर पूरे सिस्टम पर कब्जा कर लिया. दक्षिण कोरियाई खुफिया एजेंसी NIS के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर कोरिया के साइबर युद्ध नेटवर्क में इस समय लगभग 8,400 लोग काम कर रहे हैं.

सफलता पर मिलता है ये इनाम

एक ओर जहां उत्तर कोरिया में आम नागरिकों का जीवन कठिन माना जाता है, वहीं सफल हैकर्स को सरकार की ओर से शाही सुविधाएं और अधिकार दिए जाते हैं. देश के लिए पैसा जुटाने वाले हैकर्स को मिलने वाले मुख्य इनाम इस प्रकार हैं:

मोटी रकम और हिस्सा: पूर्व ट्रेनर किम ह्युंग-ग्वांग के अनुसार, अगर कोई हैकिंग मिशन सफल होता है, तो चुराए गए धन का 30% तक हिस्सा उस हैकर की सैन्य यूनिट को अमेरिकी डॉलर में दिया जा सकता है.

राजधानी में बड़ा घर: सफल हैकर्स को राजधानी प्योंगयांग में 132 वर्ग मीटर (लगभग 1,400 वर्ग फुट) तक के बड़े और आधुनिक अपार्टमेंट दिए जाते हैं, जहां वे अपने माता-पिता के साथ रह सकते हैं.

सामाजिक प्रतिष्ठा: सफल ऑपरेशन्स के बाद हैकर्स को देश की सत्ताधारी पार्टी की सदस्यता दी जाती है और संभ्रांत या प्रभावशाली परिवारों में शादी करने के अवसर मिलते हैं.

विदेश यात्रा का मौका: इन्हें चीन जैसे सहयोगी देशों में यात्रा करने और रहने का विशेष अधिकार भी मिलता है.

एक्सपर्ट के मुताबिक जहां दक्षिण कोरिया या अन्य देशों में प्रतिभाशाली छात्र डॉक्टर, इंजीनियर या बिजनेसमैन बनने का सपना देखते हैं, वहीं उत्तर कोरिया में सबसे होनहार दिमागों को केवल परमाणु और साइबर कार्यक्रमों में झोंक दिया जाता है और बदले में उनके शानदार भविष्य की गारंटी दी जाती है.

हैकर्स का नया हथियार: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)

उत्तर कोरिया के साइबर एजेंट अब केवल पारंपरिक कोडिंग तक सीमित नहीं हैं; वे अत्याधुनिक AI टूल्स का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं. विदेशी कंपनियों में रिमोट काम करने वाले उत्तर कोरियाई आईटी वर्कर्स पर नजर रखने वाले शोधकर्ताओं और यूट्यूबर्स का कहना है कि ये लोग बेहद अनुशासित और सैन्य माहौल में काम करते हैं. इनके दैनिक जीवन में सख्त समय-सारणी, जूतों की सफाई और लगातार निगरानी शामिल होती है.

AI का भारी इस्तेमाल: इन वर्कर्स के काम का मुख्य आधार AI बन चुका है.

अपडेटेड टूल्स: यह सामने आया है कि ये हैकर्स ChatGPT (पेड अकाउंट्स), Claude Code और Cursor जैसे एडवांस्ड AI टूल्स का इस्तेमाल करते हैं.

फर्जी पहचान पत्र: संयुक्त राष्ट्र (UN) की 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, हैकर्स AI का उपयोग फर्जी रिज्यूमे बनाने, कोड लिखने, दस्तावेजों में हेरफेर करने और झूठी डिजिटल पहचान तैयार करने के लिए कर रहे हैं, ताकि वे पश्चिमी कंपनियों में आसानी से नौकरियां पा सकें.

इनाम के पीछे का कड़वा सच: अत्यधिक दबाव और निगरानी

बाहर से देखने पर हैकर्स को मिलने वाले इनाम और आलीशान घर जितने आकर्षक लगते हैं, उनके अंदरूनी काम करने की स्थितियां उतनी ही भयानक और तनावपूर्ण हैं. मानव अधिकार संगठनों और पूर्व आईटी कर्मचारियों के अनुसार:

लंबे कामकाजी घंटे: हैकर्स को बिना रुके कई-कई घंटों तक काम करना पड़ता है.

कड़े फाइनेंशियल टारगेट: हर वर्कर या टीम को हर महीने सरकार को एक निश्चित राशि कमाकर देनी होती है.

मानसिक और शारीरिक तनाव: गैर-सरकारी संगठन PSCORE के अनुसार, पैसे कमाने का यह दबाव इतना ज्यादा होता है कि कई लोग बहुत कम उम्र में ही गंभीर मानसिक और शारीरिक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं.

सजा और अपमान: जो कर्मचारी अपने महीने का लक्ष्य पूरा करने में नाकाम रहते हैं, उन्हें सार्वजनिक अपमान और कड़ी सजा का सामना करना पड़ता है.

‘बिग गेम हंटिंग’: आगे क्या है खतरा?

बिनांस जैसे बड़े क्रिप्टो एक्सचेंज पर हुए सफल हमले के बाद सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर कोरियाई हैकर्स के हौसले और बुलंद हो गए हैं. अब वे छोटे-मोटे हमलों के बजाय सीधे बड़े संगठनों को निशाना बना रहे हैं, जिसे साइबर सुरक्षा की भाषा में ‘बिग गेम हंटिंग’ कहा जाता है. साइबर विश्लेषकों का कहना है कि सामान्य अपराधियों के लिए पकड़े जाने का डर होता है, लेकिन उत्तर कोरियाई हैकर्स के पीछे पूरी सरकार और राज्य का समर्थन खड़ा है.

अगर वे किसी प्रयास में असफल भी हो जाते हैं, तब भी उन्हें रोकने वाला कोई नहीं होता और वे तुरंत अगले बड़े हमले की तैयारी में जुट जाते हैं. अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबावों के बावजूद, उत्तर कोरिया का यह अनुशासित और AI-संचालित साइबर नेटवर्क आज वैश्विक वित्तीय प्रणालियों और डिजिटल संपत्तियों के लिए सबसे बड़ा और सबसे जटिल खतरा बन चुका है.

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About the Author

Ravindra Pratap Singh

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रवींद्र प्रताप सिंह ने साल 2015 में जागरण.कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा मौजूदा समय वो ज़ी न्यूज डिजिटल में चीफ सब एडिटर हैं. अगस्त 2025 में उन्होंने ज़ी न्यूज ज्वाइन किया है. रवींद्र देश और दुनिया की खबरों के अलावा खेलों में क्रिकेट जगत और क्राइम की खबरों पर बेहतरीन पकड़ रखते हैं. इसके पहले रवींद्र रिपब्लिक भारत में इवनिंग शिफ्ट के इंचार्ज रहे और शाम की शिफ्ट संभालते हुए होम पेज की जिम्मेदारी रवींद्र के ऊपर थी. उससे पहले रवींद्र ने जनसत्ता और न्यूज नेशन में भी शाम की शिफ्ट और होम पेज की जिम्मेदारी बखूबी निभाई. इसके पहले रवींद्र ने 5 सालों तक पी7 और लाइव इंडिया जैसे न्यूज चैनलों में काम किया था. रवींद्र आकाशवाणी में काम करने का अनुभव रखते. अवध यूनिवर्सिटी से मॉस कम्युनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएट रवींद्र पिछले डेढ़ दशक से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं. आप रवींद्र से जुड़ने के लिए Ravindra.Singh@India.com पर मेल कर सकते हैं या फिर फेसबुक पर संपर्क करने के लिए https://www.facebook.com/pintu.singh.397 और एक्स पर https://x.com/rs66533 रवींद्र से संपर्क किया जा सकता है. 
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